बच्ची से दुष्कर्म और हत्या के मामले में फांसी की सजा रद्द, हाईकोर्ट ने आरोपी को दी 50 साल की जेल

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने सात साल की मासूम बच्ची के साथ दुष्कर्म और उसकी हत्या के जुर्म में 24 वर्षीय पवन की मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि दोषी को कम से कम 50 साल तक बिना किसी रिहाई के जेल में रहना होगा। इसके साथ ही अदालत ने दोषी पर 73 लाख रुपये का भारी जुर्माना भी लगाया है, जो पीड़िता के परिवार को मुआवजे के रूप में दिया जाएगा।

जस्टिस अनूप चितकारा और जस्टिस रमेश चंदर डिमरी की पीठ ने 11 अगस्त को यह फैसला सुनाया। निचली अदालत द्वारा दी गई फांसी की सजा की पुष्टि के लिए भेजे गए मर्डर रेफरेंस और दोषी की अपील पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने यह निर्णय लिया। अदालत का मानना था कि हर इंसान की जिंदगी कीमती है और राज्य कानून की सख्त प्रक्रिया का पालन किए बिना किसी की जान नहीं ले सकता। अदालत ने टिप्पणी की कि यह सुनिश्चित करने के लिए कि यह अपराधी भविष्य में अन्य बच्चियों के लिए खतरा न बने, उसे अपनी कामवासना के अंत तक जेल की सलाखों के पीछे ही रहना होगा।

सजा में संशोधन और मुआवजा

हाईकोर्ट ने निचली अदालत द्वारा भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 302 (हत्या) और पोक्सो अधिनियम की धारा 6 (गंभीर यौन हमला) के तहत दी गई दो अलग-अलग मौत की सजाओं को निरस्त कर दिया। आईपीसी की धारा 302 के तहत फांसी की सजा को 50 साल के न्यूनतम वास्तविक कारावास और 50 लाख रुपये के जुर्माने में बदल दिया गया। वहीं, पोक्सो कानून की धारा 6 के तहत मौत की सजा को घटाकर 23 साल के कठोर कारावास और 23 लाख रुपये के जुर्माने में तब्दील कर दिया गया।

इसके अलावा, आईपीसी की धारा 365, 366, 376-एबी और 201 के तहत सुनाई गई सजाओं को बरकरार रखा गया है। ये सभी सजाएं एक साथ चलेंगी। दोषी से वसूल की जाने वाली कुल 73 लाख रुपये की जुर्माना राशि मृत बच्ची के जीवित माता-पिता और भाई-बहनों में बराबर-बराबर बांटी जाएगी। मृत्युदंड रद्द होने के साथ ही हाईकोर्ट ने मर्डर रेफरेंस को खारिज कर दिया और दोषी की याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया।

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घटनाक्रम और वैज्ञानिक साक्ष्य

यह दर्दनाक मामला 8 अक्टूबर 2022 का है, जब करीब सात साल और सात महीने की बच्ची खेलते समय अचानक गायब हो गई थी। अगले दिन 9 अक्टूबर को एक सुनसान जगह से उसका आधा जला हुआ शव बरामद हुआ था। जांच के दौरान पुलिस ने पवन को गिरफ्तार किया और निचली अदालत ने उसे दोषी मानते हुए फांसी की सजा सुनाई थी।

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि पुलिस द्वारा पेश की गई सीसीटीवी फुटेज भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी की कानूनी प्रक्रियाओं का पालन न करने के कारण साक्ष्य के रूप में अमान्य थी। हालांकि, अभियोजन पक्ष ने अन्य स्वतंत्र सबूतों के आधार पर अपराध सिद्ध कर दिया। घटना से ठीक पहले एक गवाह ने दोषी को बच्ची के साथ देखा था। इसके अलावा फॉरेंसिक और डीएनए जांच में पीड़िता के कपड़ों से मिले जैविक नमूनों का मिलान पवन के रक्त के नमूने से हो गया, जिससे अपराध में उसकी संलिप्तता पूरी तरह साबित हुई।

सजा कम करने के न्यायिक कारण

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सजा की समीक्षा करते हुए हाईकोर्ट ने आरोपी की मानसिक और सामाजिक रिपोर्ट का अध्ययन किया। रिपोर्ट के अनुसार, पवन का आईक्यू 94 था, वह मानसिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ था और उसमें किसी प्रकार का मानसिक विकार नहीं पाया गया।

अदालत का निष्कर्ष था कि हत्या का अपराध पूर्व-नियोजित साजिश के तहत नहीं किया गया था, बल्कि दुष्कर्म के बाद साक्ष्य मिटाने और पकड़े जाने के डर से घबराहट में अंजाम दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि यह मामला मृत्युदंड के लिए तय ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ कसौटी पर खरा नहीं उतरता। हाईकोर्ट ने कहा कि पीड़ित बच्ची की उम्र और अपराध की गंभीरता को देखते हुए 50 साल का कठोर कारावास ही न्यायसंगत सजा है।

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