कोर्ट में रकम जमा करना भुगतान के बराबर नहीं; यदि जमा राशि सशर्त है तो अवॉर्ड-देनदार को देना होगा ब्याज: सुप्रीम कोर्ट

अदालत में जमा की जाने वाली रकम और उस पर ब्याज की देनदारी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अदालत में केवल राशि जमा कर देना भुगतान के समान नहीं माना जा सकता, जब तक कि वह जमा बिना किसी शर्त के न हो और पूरी तरह से अवॉर्ड-धारक के सुपुर्द न कर दी जाए। जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने नेशनल सीड्स कॉर्पोरेशन लिमिटेड की अपील खारिज करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें इस सार्वजनिक उपक्रम को आर्बिट्रल अवॉर्ड पर 12% वार्षिक ब्याज का भुगतान करने का निर्देश दिया गया था। पीठ ने पाया कि अवॉर्ड-देनदार द्वारा की गई जमा राशि सशर्त थी, हर चरण पर उसके आहरण का विरोध किया गया और वह सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (सीपीसी) के ऑर्डर XXI रूल 1 के अनुरूप नहीं थी। इसके साथ ही देश भर की अदालतों में कोर्ट डिपॉजिट को लेकर मौजूद असमानता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय विधि आयोग से अनुरोध किया कि वह रिजर्व बैंक, वित्त मंत्रालय और विधि एवं न्याय मंत्रालय के साथ मिलकर इस विषय पर एक समान कानून बनाने की आवश्यकता की समीक्षा करे।

फैसले की शुरुआत करते हुए पीठ ने टिप्पणी की: “अदालत में रकम जमा करना भुगतान का समानार्थी नहीं है। कर्जदार की अपनी पहुंच से बाहर रखी गई राशि न तो उसकी देनदारी को खत्म करती है और न ही लेनदार के हाथों में पहुंचती है। अदालत में रकम जमा करने और देनदारी के अंतिम निपटारे के बीच कई तरह की संभावनाएं और उतनी ही अनिश्चितताएं मौजूद होती हैं। मध्यस्थता अवॉर्ड के प्रवर्तन के संदर्भ में इसी अनिश्चितता का समाधान इस अपील के केंद्र में है।”

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद 13 जून, 2019 के एक आर्बिट्रल अवॉर्ड से शुरू हुआ था, जो अपीलकर्ता नेशनल सीड्स कॉर्पोरेशन लिमिटेड के खिलाफ और प्रतिवादी नेशनल एग्रो सीड कॉर्पोरेशन (इंडिया) के पक्ष में पारित किया गया था। इसमें 26 अगस्त, 2017 से 12% वार्षिक ब्याज के साथ 1,46,40,005.02 रुपये का भुगतान करने का निर्देश था, जो कुल मिलाकर 1,77,97,434 रुपये बनता था।

अपीलकर्ता ने आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट, 1996 की धारा 34 के तहत दिल्ली हाईकोर्ट में इस अवॉर्ड को चुनौती दी। हाईकोर्ट ने 16 अक्टूबर, 2019 को एकतरफा अंतरिम आदेश जारी करते हुए अवॉर्ड के क्रियान्वयन पर इस शर्त के साथ रोक लगा दी कि अपीलकर्ता छह सप्ताह के भीतर मूल अवॉर्ड राशि का 50% जमा करे। इसके अनुपालन में अपीलकर्ता ने 25 नवंबर, 2019 को डिमांड ड्राफ्ट के माध्यम से 73,20,003 रुपये जमा किए।

हाईकोर्ट ने 5 जनवरी, 2022 को धारा 34 की याचिका खारिज कर दी। इसके बाद प्रतिवादी ने 24 जनवरी, 2022 को निष्पादन याचिका दायर की और 14 फरवरी, 2022 को जमा राशि को जारी करने के लिए आवेदन किया। इस बीच, अपीलकर्ता ने धारा 37(1)(सी) के तहत अपील दायर की, जिसे हाईकोर्ट की खंडपीठ ने 31 मई, 2022 को खारिज कर दिया। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी 26 अगस्त, 2022 को अपीलकर्ता की विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) खारिज कर दी।

निष्पादन कार्यवाही के दौरान, निष्पादन अदालत के निर्देश पर अपीलकर्ता ने 26 अप्रैल, 2022 को शेष 1,53,17,792 रुपये भी जमा कर दिए। हालांकि, अपीलकर्ता ने रकम को प्रतिवादी को सौंपे जाने का लगातार विरोध किया। 7 जुलाई, 2022 को निष्पादन अदालत ने प्रतिवादी को 1 करोड़ रुपये निकालने की अनुमति दी, लेकिन इसके लिए अचल संपत्ति के मालिकाना दस्तावेज (टाइटल डीड) सुरक्षा के रूप में जमा करने की शर्त रखी। वित्तीय संकट से जूझ रहे प्रतिवादी को अपनी संपत्तियों की नीलामी रोकने के लिए इन दस्तावेजों की जरूरत थी, जिसके चलते उसे रकम निकासी का दावा छोड़ना पड़ा और दस्तावेज वापस लेने पड़े।

सुप्रीम कोर्ट से अपीलकर्ता की एसएलपी खारिज होने के बाद, निष्पादन अदालत ने 8 सितंबर, 2022 को माना कि अवॉर्ड अब अंतिम हो चुका है और उसने बिना किसी शर्त के पूरी राशि जारी करने का आदेश दिया, जिसका अपीलकर्ता ने पहली बार कोई विरोध नहीं किया। इसके बाद 5 अगस्त, 2024 को निष्पादन अदालत ने माना कि जमा की गई रकम 8 सितंबर, 2022 से पहले कभी भी डिक्री-धारक के उपयोग के लिए उपलब्ध नहीं थी। अदालत ने अपीलकर्ता को 13 जून, 2019 से 8 सितंबर, 2022 तक की अवधि के लिए 12% प्रति वर्ष की दर से ब्याज देने का निर्देश दिया। इस फैसले के खिलाफ अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

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दोनों पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता की ओर से पेश वकील यशवर्धन ने दलील दी कि अवॉर्ड राशि अदालत में जमा करा देना ही अवॉर्ड की संतुष्टि माना जाता है। उन्होंने हिमाचल प्रदेश हाउसिंग एंड अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी बनाम रंजीत सिंह राणा, यूनियन ऑफ इंडिया बनाम एम.पी. ट्रेडिंग एंड इनवेस्टमेंट आरएसी कॉर्पोरेशन लिमिटेड, और यूनियन ऑफ इंडिया बनाम कंक्रीट प्रोडक्ट्स एंड कंस्ट्रक्शन कंपनी के मामलों पर भरोसा जताया। उन्होंने कहा कि आंशिक जमा की स्थिति में जमा राशि पर ब्याज लगना बंद हो जाता है और अवॉर्ड-धारक केवल फिक्स्ड डिपॉजिट पर अर्जित ब्याज का ही हकदार होता है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि 1996 का अधिनियम एक स्वतंत्र और पूर्ण संहिता है, इसलिए सीपीसी के ऑर्डर XXI रूल 1(1) और (4) के प्रावधान यहां लागू नहीं होते (इसके लिए उन्होंने फर्स्ट डे लॉसन लिमिटेड बनाम जिंदल एक्सपोर्ट्स लिमिटेड, सुंदरम फाइनेंस लिमिटेड बनाम टी. थंकम, सुंदरम फाइनेंस लिमिटेड बनाम अब्दुल समद, और पाम डेवलपमेंट्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम पश्चिम बंगाल राज्य का हवाला दिया)। इसके अलावा, उन्होंने कहा कि 25 नवंबर, 2019 से 14 फरवरी, 2022 के बीच प्रतिवादी ने निकासी के लिए कोई अर्जी नहीं लगाई थी और इस संबंध में के.एल. सुनेजा बनाम डॉ. मनजीत कौर मोंगा का उल्लेख किया।

इसके विपरीत, प्रतिवादी की ओर से पेश वकील आशुतोष कुमार ने दलील दी कि 73,20,003 रुपये की पहली जमा राशि केवल अंतरिम रोक हासिल करने के उद्देश्य से दी गई थी, न कि अवॉर्ड की संतुष्टि के लिए, और न ही इसे प्रतिवादी के अधिकार में सौंपा गया था। उन्होंने कहा कि सीपीसी के ऑर्डर XXI रूल 1 के तहत ब्याज से छूट का लाभ अपीलकर्ता को नहीं मिल सकता क्योंकि उसने हर मोड़ पर रकम जारी करने का कड़ा विरोध किया था। उन्होंने रेखांकित किया कि 7 जुलाई, 2022 को दी गई अनुमति भी संपत्ति के दस्तावेज जमा करने की शर्त पर आधारित थी, जिसे डिक्री की संतुष्टि नहीं माना जा सकता। अपने पक्ष में उन्होंने पी.एस.एल. रामनाथन चेट्टियार बनाम ओ.आर.एम.पी.आर.एम. रामनाथन चेट्टियार, के.एल. सुनेजा, नेपा लिमिटेड बनाम मनोज कुमार अग्रवाल, दिल्ली विकास प्राधिकरण बनाम भाई सरदार सिंह एंड संस, डीएलएफ लिमिटेड बनाम कोंकार जनरेटर्स एंड मोटर्स लिमिटेड और डॉ. टी.के. विश्वनाथन विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट का हवाला दिया।

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सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और विधिक सिद्धांत

कानूनी स्थिति का विश्लेषण करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यद्यपि 1996 का अधिनियम एक पूर्ण संहिता है, लेकिन इसकी धारा 36(1) एक कानूनी कल्पना (लीगल फिक्शन) तैयार करती है, जिसके अनुसार आर्बिट्रल अवॉर्ड को सीपीसी के तहत उसी प्रकार निष्पादित कराया जाता है मानो वह अदालत की कोई डिक्री हो। परमजीत सिंह पाथेजा बनाम आईसीडीएस लिमिटेड और सुंदरम फाइनेंस लिमिटेड बनाम अब्दुल समद का हवाला देते हुए पीठ ने स्पष्ट किया कि अवॉर्ड मूल रूप से अवॉर्ड ही रहता है और वास्तविक डिक्री नहीं बनता, परंतु धारा 36(3) के तहत धन से जुड़े अवॉर्ड पर रोक लगाते समय अदालत को सीपीसी के ऑर्डर XLI के प्रावधानों को ध्यान में रखना अनिवार्य होता है।

सीपीसी के ऑर्डर XXI रूल 1 और गुरप्रीत सिंह बनाम यूनियन ऑफ इंडिया में संविधान पीठ के फैसले तथा पी.एस.एल. रामनाथन चेट्टियार के सिद्धांतों का विश्लेषण करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निम्नलिखित प्रमुख कानूनी सिद्धांत तय किए:

  1. 1996 का अधिनियम एक पूर्ण संहिता है और धारा 36(1) के तहत अवॉर्ड को अदालत की डिक्री की तरह निष्पादित करने का कानूनी प्रावधान है।
  2. धारा 36(3) यह तय करती है कि पैसे से जुड़े अवॉर्ड पर रोक की अर्जी सुनते समय अदालत सीपीसी के धन डिक्री पर रोक संबंधी प्रावधानों का ध्यान रखेगी।
  3. अदालत में रकम जमा कराने का वास्तविक प्रभाव केवल इतना होता है कि वह रकम दोनों पक्षों की पहुंच से बाहर हो जाती है।
  4. ऑर्डर XXI रूल 1 के अनुरूप होने के लिए अदालत में जमा बिना शर्त होना चाहिए और डिक्री-धारक उसे निकालने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र होना चाहिए।
  5. यदि डिक्री-धारक को केवल सुरक्षा (सिक्योरिटी) देने की शर्त पर ही रकम निकालने की छूट दी जाती है, तो इसे डिक्री की संतुष्टि में किया गया भुगतान नहीं माना जाएगा।
  6. यदि जमा राशि ऑर्डर XXI रूल 1 की शर्तों के अनुसार नहीं की गई है, तो जमा करने के बाद भी ब्याज का दायित्व बना रहेगा।
  7. यदि डिक्री-धारक उपलब्ध कराई गई रकम को निकालने के लिए समय पर कदम नहीं उठाता, तो वह ब्याज का दावा नहीं कर सकता; उसकी निष्क्रियता को भुगतान लेने से इनकार माना जाएगा।
  8. जहां जमा रकम को डिक्री-धारक के अपने अनुरोध पर फिक्स्ड डिपॉजिट में बदला जाता है, वहां वह केवल उस फिक्स्ड डिपॉजिट पर मिले ब्याज का ही हकदार होगा।
  9. यदि कुल देनदारी का केवल एक हिस्सा बिना शर्त निकासी के लिए जमा कराया जाता है, तो ब्याज केवल उसी जमा हिस्से की सीमा तक बंद होगा, शेष राशि पर ब्याज लागू रहेगा।

इन सिद्धांतों के आधार पर पीठ ने माना कि अपीलकर्ता द्वारा 73,20,003 रुपये की पहली जमा राशि केवल धारा 34 के तहत रोक हासिल करने के लिए दी गई थी। इसके साथ ऑर्डर XXI रूल 1(2) के तहत कोई नोटिस नहीं दिया गया था और जब भी प्रतिवादी ने उसे निकालने का प्रयास किया, अपीलकर्ता ने लगातार उसका विरोध किया। इसके अलावा, 7 जुलाई, 2022 को दी गई आंशिक निकासी भी संपत्ति के दस्तावेज बंधक रखने की शर्त पर निर्भर थी। इसलिए यह जमा ऑर्डर XXI रूल 1 के तहत वैध भुगतान नहीं था और प्रतिवादी 8 सितंबर, 2022 से पहले इस रकम को बिना शर्त निकालने के लिए स्वतंत्र नहीं था।

अदालत ने अपीलकर्ता द्वारा उद्धृत हिमाचल प्रदेश हाउसिंग एंड अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी के फैसले को इसलिए अलग माना क्योंकि उसमें देनदार ने पूरी अवॉर्ड राशि जमा कर दी थी; कंक्रीट प्रोडक्ट्स का मामला अनुबंध की उन विशेष शर्तों पर आधारित था जो रोकी गई राशि पर ब्याज देने पर रोक लगाती थीं; और एम.पी. ट्रेडिंग में जमा राशि को डिक्री-धारक के अपने अनुरोध पर फिक्स्ड डिपॉजिट में तब्दील किया गया था।

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अदालती जमा प्रणाली में राष्ट्रीय सुधार की जरूरत

व्यापक व्यवस्थागत समस्याओं पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने देश की विभिन्न अदालतों में अदालती जमा (कोर्ट डिपॉजिट) को संभालने के तरीकों में मौजूद भारी भिन्नता पर चिंता जताई। पीठ ने पाया कि दिल्ली हाईकोर्ट और पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट जमा रकम को बैंकों के फिक्स्ड डिपॉजिट में रखते हैं; सुप्रीम कोर्ट स्वयं भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा स्वीकृत खुली निविदा प्रक्रिया के माध्यम से राष्ट्रीयकृत बैंकों में जमा कराता है; जबकि कलकत्ता हाईकोर्ट और मद्रास हाईकोर्ट वादियों के धन को सीधे भारतीय रिजर्व बैंक या निर्धारित सरकारी प्रतिभूतियों में जमा करवाते हैं।

मुद्रा के समय मूल्य (टाइम वैल्यू ऑफ मनी) के आर्थिक सिद्धांत को रेखांकित करते हुए और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्थाओं—विशेष रूप से अमेरिका की कोर्ट रजिस्ट्री इनवेस्टमेंट सिस्टम (सीआरआईएस) तथा कनाडा के सुप्रीम कोर्ट एक्ट, 1985 की धारा 65(1) के तहत कंसोलिडेटेड रेवेन्यू फंड—का हवाला देते हुए पीठ ने कहा: “यह विसंगति और अदालतों द्वारा प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर पारित अलग-अलग आदेश कई चिंताओं को अनसुलझा छोड़ देते हैं… साझा मानकों और एकसमान सिद्धांतों के अभाव में निवेश, नवीनीकरण, मात्रा, लेखांकन और जमा पर मिलने वाले ब्याज जैसे नियमित प्रश्नों पर बार-बार फैसले लेने पड़ते हैं, जिससे अदालतों और ट्रिब्यूनलों पर बोझ बढ़ता है।”

पीठ ने डॉ. टी.के. विश्वनाथन समिति की उन सिफारिशों का भी समर्थन किया जिनमें धारा 36(3) में संशोधन कर 50% राशि जमा करने और केवल बिना शर्त निकासी की स्थिति में ही ब्याज रोके जाने का सुझाव दिया गया था।

अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि अपीलकर्ता सीपीसी के ऑर्डर XXI रूल 1 के प्रावधानों के अनुरूप राशि जमा करने में विफल रहा, इसलिए दिल्ली हाईकोर्ट के 8 सितंबर, 2022 तक 12% वार्षिक ब्याज देने के आदेश में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता। अदालत ने हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी।

अदालत ने यह निष्कर्ष निकाला कि “इस विषय पर एक उपयुक्त कानून बनाना और विकसित करना आवश्यक है”। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय विधि आयोग से आग्रह किया कि वह फैसले में उठाए गए मुद्दों का परीक्षण करे, विदेशी कानूनों का अध्ययन करे और भारतीय रिजर्व बैंक, वित्त मंत्रालय तथा विधि एवं न्याय मंत्रालय के साथ परामर्श करे। सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री को निर्देश दिया गया कि वह इस फैसले की प्रति विधि आयोग के अध्यक्ष, रिजर्व बैंक के गवर्नर और वित्त तथा विधि मंत्रालयों के सचिवों को प्रेषित करे।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: नेशनल सीड्स कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम नेशनल एग्रो सीड कॉर्पोरेशन (इंडिया)
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 2026 (एस.एल.पी. (सिविल) संख्या 5710/2025 से उद्भूत)
पीठ: जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे
निर्णय की तिथि: 18 सितंबर, 2026

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