एक्सपोर्ट कोटा प्रीमियम को धारा 80HHC के तहत वैधानिक निर्यात प्रोत्साहन के समकक्ष नहीं माना जा सकता; सीबीडीटी सर्कुलर अदालतों पर बाध्यकारी नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि एक्सपोर्ट कोटा परमिट की बिक्री से अर्जित प्रीमियम को आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 80HHC के तहत कटौती का दावा करने के लिए धारा 28(iiia) से (iiic) के अंतर्गत आने वाले वैधानिक निर्यात प्रोत्साहनों के समकक्ष नहीं माना जा सकता। जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की पीठ ने गारमेंट निर्यातक कंपनियों ओरिएंट क्राफ्ट्स लिमिटेड और मैसर्स सैमटेक्स फैशन्स लिमिटेड की अपीलों को खारिज करते हुए निर्णय दिया कि केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) द्वारा जारी प्रशासनिक सर्कुलर वैधानिक प्रावधानों के विपरीत जाकर कोई अनुचित कानूनी कल्पना (लीगल फिक्शन) तैयार नहीं कर सकते। इसके साथ ही कार्यपालिका के निर्देश कर कानूनों की व्याख्या करने के मामले में संवैधानिक अदालतों को बाध्य नहीं कर सकते। पीठ ने गलत तरीके से कटौती की अनुमति देने वाले असेसमेंट ऑर्डर्स के खिलाफ इनकम टैक्स कमिश्नर द्वारा धारा 263 के तहत रिवीजनल अधिकार क्षेत्र के इस्तेमाल को भी पूरी तरह सही ठहराया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद रेडीमेड गारमेंट्स के विनिर्माण और निर्यात से जुड़ी कंपनियों के असेसमेंट वर्ष 2000-01 और 2001-02 से संबंधित कार्यवाहियों से उपजा था। ओरिएंट क्राफ्ट्स लिमिटेड ने धारा 80HHC के तहत 13,85,68,402 रुपये की कटौती का दावा किया था, जिसमें एक्सपोर्ट कोटा की बिक्री पर प्राप्त 73,49,341 रुपये का प्रीमियम भी शामिल था। करदाता कंपनी ने इसे व्यावसायिक लाभ के रूप में दर्शाया था। असेसिंग ऑफिसर ने शुरुआत में धारा 143(3) के तहत रिटर्न को स्वीकार कर लिया था। कंपनी ने 23 फरवरी 1998 के सीबीडीटी कार्यालय ज्ञापन (सर्कुलर) पर भरोसा जताते हुए दलील दी कि एक्सपोर्ट कोटा प्रीमियम को वैधानिक रूप से इम्पोर्ट लाइसेंस की बिक्री से हुए मुनाफे, नकद सहायता और ड्यूटी ड्रॉबैक के समान ही माना जाता है।

हालांकि, कमिश्नर ऑफ इनकम टैक्स (दिल्ली-V) ने इस असेसमेंट को राजस्व के हितों के लिए गलत और प्रतिकूल मानते हुए धारा 263 के तहत कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया। कमिश्नर ने पाया कि असेसिंग ऑफिसर धारा 80HHC के एक्सप्लेनेशन (baa) के तहत बिजनेस प्रॉफिट में से कोटा प्रीमियम का 90 प्रतिशत हिस्सा बाहर निकालने में विफल रहे, जिसके कारण कंपनी को 51,23,151 रुपये की अतिरिक्त कटौती मिल गई। कमिश्नर ने असेसमेंट ऑर्डर को रद्द कर दिया और इस प्राप्ति को “अन्य प्राप्तियां” मानकर नए सिरे से असेसमेंट करने का निर्देश दिया।

इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (आईटीएटी) ने कमिश्नर के रिवीजनल निर्देश को दरकिनार करते हुए कंपनी के पक्ष में फैसला सुनाया था, लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के फैसले को पलट दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि एक्सपोर्ट कोटा राइट्स के ट्रांसफर से मिलने वाला पैसा निर्यात से “अर्जित आय” नहीं है, बल्कि यह देश के भीतर किसी तीसरे पक्ष को किया गया ट्रांसफर है। इसलिए यह धारा 28(iv) के तहत एक सामान्य व्यावसायिक लाभ है और धारा 80HHC(3) के प्रोविजो के तहत लाभ पाने का हकदार नहीं है।

मैसर्स सैमटेक्स फैशन्स लिमिटेड के जुड़े हुए मामले में, असेसिंग ऑफिसर ने कोटा बिक्री से मिले 90,43,061 रुपये और मार्जिन मनी डिपॉजिट पर मिले 16,72,286 रुपये के ब्याज पर धारा 80HHC के तहत कटौती की मांग खारिज कर दी थी। सीआईटी (अपील्स) और आईटीएटी ने सीबीडीटी सर्कुलर के आधार पर कंपनी को राहत दी थी, लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने पूर्व निर्णय सीआईटी बनाम नागेश निटवेअर्स प्राइवेट लिमिटेड के आधार पर ट्रिब्यूनल के आदेश को निरस्त कर दिया था।

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पक्षकारों की दलीलें

ओरिएंट क्राफ्ट्स लिमिटेड की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट सलिल अग्रवाल ने दलील दी कि असेसिंग ऑफिसर ने पूरी जांच के बाद धारा 143(3) के तहत असेसमेंट पूरा किया था। उन्होंने कहा कि सीबीडीटी का सर्कुलर असेसिंग ऑफिसर पर पूरी तरह बाध्यकारी था। जब अधिकारी ने विभागीय दिशानिर्देशों का पालन करते हुए एक संभावित और कानूनी रूप से मान्य दृष्टिकोण अपनाया, तो कमिश्नर धारा 263 के तहत दखल नहीं दे सकते थे। उन्होंने सी.आई.टी., लुधियाना बनाम मैक्स इंडिया लिमिटेड, सी.आई.टी. बनाम अमिताभ बच्चन, और मालाबार इंडस्ट्रियल कंपनी लिमिटेड बनाम सीआईटी का हवाला देते हुए कहा कि केवल कमिश्नर की राय अलग होने के आधार पर रिवीजनल शक्तियों का प्रयोग नहीं किया जा सकता।

मैसर्स सैमटेक्स फैशन्स लिमिटेड की ओर से एडवोकेट संतोष कृष्णन ने कहा कि अपैरल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (एईपीसी) द्वारा आवंटित एक्सपोर्ट कोटा ट्रांसफर करने योग्य होता है और सरप्लस कोटा पर मिलने वाला प्रीमियम सीबीडीटी के 23 फरवरी 1998 के ज्ञापन के तहत धारा 80HHC की राहत के लिए पात्र है। उन्होंने के.पी. वर्गीज बनाम आईटीओ, विजय कृष्णास्वामी बनाम डीडीआईटी, और स्टेट ऑफ तमिलनाडु बनाम इंडिया सीमेंट्स लिमिटेड का हवाला देते हुए तर्क दिया कि आयकर विभाग अपने स्वयं के सर्कुलर को नकार नहीं सकता और न ही अपने सर्कुलर का पालन करने वाले आदेशों को चुनौती दे सकता है।

राजस्व विभाग की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट अरिजित प्रसाद ने इन दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि धारा 80HHC को एक्सप्लेनेशन (baa) के साथ पढ़ा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि एक्सपोर्ट कोटा की बिक्री से निर्यात आय या विदेशी मुद्रा प्राप्त नहीं होती, बल्कि यह सिर्फ घरेलू बिक्री से हुई कमाई है। उन्होंने कमिश्नर ऑफ सेंट्रल एक्साइज, बोलपुर बनाम रतन मेल्टिंग एंड वायर इंडस्ट्रीज के संविधान पीठ के फैसले का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि कोई भी प्रशासनिक सर्कुलर संसद द्वारा बनाए गए स्पष्ट वैधानिक प्रावधानों की जगह नहीं ले सकता और न ही अदालतों के हाथ बांध सकता है।

धारा 263 और पूर्व निर्णयों पर सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने धारा 263 के तहत कमिश्नर के रिवीजनल अधिकार क्षेत्र से जुड़े सिद्धांतों की समीक्षा करते हुए पूर्व निर्णयों के प्रमुख बिंदुओं को रेखांकित किया:

  • सी.आई.टी. बनाम मैक्स इंडिया लिमिटेड के अनुसार, कानून में “राजस्व के हित के प्रतिकूल” पद को अनिवार्य रूप से “गलत या त्रुटिपूर्ण” आदेश के साथ जोड़कर पढ़ा जाना चाहिए। केवल इसलिए कि दो दृष्टिकोण संभव थे और अधिकारी ने एक दृष्टिकोण चुना, आदेश को गलत नहीं कहा जा सकता। हालांकि, यदि अधिकारी द्वारा अपनाया गया दृष्टिकोण कानून की नजर में पूरी तरह से टिकने योग्य न हो, तो रिवीजनल अधिकार का इस्तेमाल जायज है।
  • सी.आई.टी. बनाम अमिताभ बच्चन के तहत, रिवीजनल अधिकार क्षेत्र के लिए दो पूर्व-शर्तों का एक साथ होना जरूरी है—आदेश त्रुटिपूर्ण होना चाहिए और राजस्व के हितों के प्रतिकूल होना चाहिए। यदि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किया गया हो और करदाता को रिकॉर्ड पर अपनी बात रखने का मौका दिया गया हो, तो कमिश्नर केवल शुरुआती नोटिस तक ही सीमित रहने के लिए बाध्य नहीं हैं।
  • मालाबार इंडस्ट्रियल कंपनी लिमिटेड बनाम सीआईटी के अनुसार, यदि असेसमेंट ऑर्डर तथ्यों की गलत धारणा पर आधारित हो, कानून के गलत अनुप्रयोग से निकला हो, या बिना दिमाग लगाए पारित किया गया हो, जिससे कानूनी रूप से देय टैक्स का नुकसान हुआ हो, तो ऐसा आदेश त्रुटिपूर्ण और राजस्व के हित के प्रतिकूल माना जाएगा।
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सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि असेसिंग ऑफिसर ने निर्यात प्रोत्साहनों से जुड़े वैधानिक मानदंडों की अनदेखी की थी, जिससे उनका आदेश गलत और राजस्व के लिए नुकसानदेह साबित हुआ। इसलिए हाईकोर्ट द्वारा कमिश्नर के रिवीजनल आदेश को बरकरार रखना पूरी तरह सही था।

सीबीडीटी सर्कुलर और एक्सपोर्ट कोटा प्रीमियम पर सुप्रीम कोर्ट का निष्कर्ष

धारा 28 और धारा 80HHC की पड़ताल करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सीबीडीटी के 23 फरवरी 1998 के ज्ञापन की जांच की, जिसमें कहा गया था कि तकनीकी रूप से एक्सपोर्ट कोटा प्रीमियम की तुलना धारा 28(iiia) और (iiic) की मदों से की जा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस समानता को वैधानिक योजना के विपरीत मानते हुए टिप्पणी की:

“मूल रूप से, सीबीडीटी कार्यालय ज्ञापन अधिनियम, 1961 की धारा 28(iiia) से (iiic) में उल्लिखित मदों के साथ एक्सपोर्ट कोटा प्रीमियम की तुलना करके एक कानूनी कल्पना (लीगल फिक्शन) तैयार करता है। स्पष्ट वैधानिक स्थिति के विपरीत किसी कानूनी कल्पना का अनुप्रयोग कानून में अस्वीकार्य है।”

पीठ ने कानून द्वारा मान्यता प्राप्त निर्यात प्रोत्साहनों और घरेलू कोटा बिक्री के बीच बुनियादी अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा:

“कोटा की बिक्री से प्राप्त राजस्व करदाता के लिए केवल आंतरिक राजस्व उत्पन्न करता है, लेकिन इससे कोई विदेशी मुद्रा अर्जित नहीं होती है। अधिनियम, 1961 की धारा 28(iiia) से (iiic) के अंतर्गत आने वाले किसी भी राजस्व के लिए आवश्यक तत्व कोटा की बिक्री में मौजूद नहीं हैं। इसलिए, धारा 28 के सीधे अर्थ में, कोटा की बिक्री को व्यावसायिक आय नहीं माना जा सकता।”

रतन मेल्टिंग एंड वायर इंडस्ट्रीज के फैसले का उल्लेख करते हुए पीठ ने प्रशासनिक सर्कुलर की सीमाओं पर जोर दिया:

“केंद्रीय उत्पाद और सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीईसी) द्वारा जारी विभागीय सर्कुलर और निर्देश संबंधित कानूनों के तहत काम करने वाले अधीनस्थ अधिकारियों पर बाध्यकारी होते हैं। हालांकि, एक बार जब सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट विचारणीय प्रश्न पर कानून स्पष्ट कर देते हैं, तो किसी भी अदालत या ट्रिब्यूनल के लिए यह अस्वीकार्य है कि वह संवैधानिक अदालत द्वारा व्यक्त किए गए दृष्टिकोण के मुकाबले किसी कार्यकारी सर्कुलर को प्राथमिकता देने का निर्देश दे।”

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि प्रशासनिक सर्कुलर केवल वैधानिक प्रावधानों पर कार्यपालिका की समझ को दर्शाते हैं और वे न्यायिक मंचों को बाध्य नहीं कर सकते। पीठ ने चेतावनी दी:

“यदि किसी अदालत को प्रशासनिक सीबीडीटी सर्कुलर को अपने ऊपर बाध्यकारी मानने के लिए मजबूर किया जाता है, तो यह आयकर देयता को नियंत्रित करने वाले पूरे संवैधानिक और वैधानिक ढांचे को कमजोर कर देगा, जिसमें ‘अर्जित आय’ का मानक, वैध कटौतियों की सख्त व्याख्या और स्वीकार्य खर्चों का वर्गीकरण शामिल है।”

अदालत ने यह भी जोड़ा कि यदि विभाग को अपने स्वयं के सर्कुलर के खिलाफ जाने से रोक दिया जाए, तो इससे उसका अपील करने का कानूनी अधिकार हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा और संवैधानिक अदालतें संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत सही कानूनी व्याख्या कभी तय नहीं कर पाएंगी।

सीआईटी बनाम नागेश निटवेअर्स प्राइवेट लिमिटेड में व्यक्त राय की पुष्टि करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि एईपीसी द्वारा आवंटित कोटा पर मिलने वाला प्रीमियम धारा 28(iv) के तहत एक आकस्मिक व्यावसायिक लाभ है। लिहाजा, यह एक्सप्लेनेशन (baa) के तहत 90 प्रतिशत की कटौती के दायरे में आता है और धारा 80HHC(3) के प्रोविजो के तहत इसे वापस जोड़ने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं मिलता।

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सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसलों में किसी भी तरह के हस्तक्षेप से इनकार करते हुए ओरिएंट क्राफ्ट्स लिमिटेड और मैसर्स सैमटेक्स फैशन्स लिमिटेड की सभी सिविल अपीलों को खारिज कर दिया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: ओरिएंट क्राफ्ट्स लिमिटेड बनाम कमिश्नर ऑफ इनकम टैक्स, नई दिल्ली
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 143-144/2013
पीठ: जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस एन. वी. अंजारिया
निर्णय की तिथि: 18 सितंबर 2026

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