बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को मॉडल कॉलेजों में कार्यरत पात्र शिक्षण और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की सेवाएं नियमित करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने आदेश दिया कि इन कर्मचारियों का वेतन उनकी प्रारंभिक नियुक्ति की तारीख से संबंधित विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के लागू वेतनमान के अनुसार निर्धारित किया जाए।
जस्टिस किशोर सी. संत और जस्टिस जितेंद्र जैन की खंडपीठ ने 29 अक्टूबर के आदेश में कहा कि राज्य सरकार ने एक दशक से अधिक समय तक पदों की मंजूरी से जुड़े प्रस्ताव लंबित रखे। इसके कारण कर्मचारी वर्षों तक अस्थायी नियुक्तियों पर काम करने के लिए मजबूर रहे।
हाईकोर्ट ने कहा कि उच्च शिक्षा तक पहुंच बढ़ाने के उद्देश्य से स्थापित इन संस्थानों को वित्तीय और प्रशासनिक सहयोग देने की जिम्मेदारी निभाने में राज्य सरकार विफल रही।
कर्मचारियों को नियमित करने और वेतन निर्धारण का निर्देश
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जिन कर्मचारियों की सेवाएं याचिका दाखिल होने तक समय-समय पर बढ़ाई जाती रही थीं और जो अब भी कार्यरत हैं, वे नियमितीकरण के पात्र होंगे।
कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को संबंधित पदों की मंजूरी और कर्मचारियों की सेवाएं नियमित करने के लिए उचित आदेश जारी करने का निर्देश दिया।
साथ ही, पात्र कर्मचारियों का वेतन समान पदों पर लागू विश्वविद्यालय या UGC के वेतनमान के अनुसार उनकी नियुक्ति की तारीख से निर्धारित करने को कहा।
यह आदेश उन कर्मचारियों की याचिकाओं पर आया, जो लंबे समय से मॉडल कॉलेजों में कार्यरत होने के बावजूद स्थायी नियुक्ति और नियमित विश्वविद्यालय कर्मचारियों को मिलने वाले सेवा लाभों से वंचित थे।
2011 से काम कर रहे कुछ कर्मचारी, लेकिन नियुक्ति अस्थायी
याचिकाकर्ताओं को संबंधित विश्वविद्यालयों ने मॉडल कॉलेजों में नियुक्त किया था। इनमें कुछ कर्मचारियों की नियुक्ति वर्ष 2011 में हुई थी।
नियुक्ति पत्रों में उनकी सेवाओं को अस्थायी बताया गया था। उन्हें निर्धारित एकमुश्त वेतन दिया जाता था और काम संतोषजनक नहीं पाए जाने पर बिना नोटिस सेवा समाप्त करने का प्रावधान भी था।
विश्वविद्यालयों ने समय-समय पर उनकी नियुक्तियां बढ़ाईं, लेकिन उन्हें स्थायी दर्जा या नियमित कर्मचारियों के समान सेवा लाभ नहीं दिए।
दस वर्ष से अधिक समय तक काम करने के बाद कर्मचारियों ने नियमितीकरण के लिए विश्वविद्यालयों को आवेदन दिए। सकारात्मक निर्णय नहीं मिलने पर उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया।
कर्मचारियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एन. बी. खंडारे ने दलील दी कि याचिकाकर्ता नियमित विश्वविद्यालय कर्मचारियों के समान कार्य करते हैं, लेकिन उन्हें काफी कम वेतन मिलता है।
उन्होंने यह भी बताया कि महाराष्ट्र सरकार ने विश्वविद्यालयों को मॉडल कॉलेजों के कर्मचारियों को स्थायी नियुक्ति नहीं देने का निर्देश दिया था। उन्होंने राज्य सरकार और विश्वविद्यालयों के इस रवैये को अनुचित बताया।
संस्थान स्थापित कर उनकी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकती सरकार: हाईकोर्ट
मॉडल कॉलेज योजना तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की घोषणा के बाद UGC की पहल के तहत शुरू की गई थी। इसका उद्देश्य उन जिलों में उच्च शिक्षा के अवसर बढ़ाना था, जहां कॉलेजों की संख्या कम थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि शैक्षणिक संस्थान स्थापित करना ही सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। उनके संचालन के लिए आवश्यक प्रशासनिक सहयोग और संसाधन उपलब्ध कराना भी जरूरी है।
खंडपीठ ने भारतीय पारिवारिक परंपरा का उदाहरण देते हुए कहा कि माता-पिता अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए व्यक्तिगत खर्चों में कटौती करके भी उनकी जरूरतें पूरी करने का प्रयास करते हैं। इसी तरह राज्य सरकार भी अपने स्थापित संस्थानों को आवश्यक सहयोग देने से पीछे नहीं हट सकती।
कोर्ट ने स्पाइडर-मैन की प्रसिद्ध पंक्ति “बड़ी शक्ति के साथ बड़ी जिम्मेदारी भी आती है” का उल्लेख करते हुए राज्य सरकार के रवैये की आलोचना की।
खंडपीठ ने कहा कि सरकार विश्वविद्यालय को दिए गए आश्वासन और हाईकोर्ट के पूर्व निर्देशों का पालन करने में विफल रही। उसका आचरण संवैधानिक जिम्मेदारियों और मॉडल कॉलेज योजना के मूल उद्देश्यों के भी विपरीत था।
शिक्षा की गुणवत्ता और राष्ट्रीय विकास पर जोर
हाईकोर्ट ने कहा कि शिक्षा देश के आर्थिक विकास, राष्ट्र निर्माण और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में भाग लेने वाले जागरूक नागरिक तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
कोर्ट के अनुसार, सरकार की जिम्मेदारी केवल नए शिक्षण संस्थान खोलने तक सीमित नहीं हो सकती। उसे इन संस्थानों का उचित संचालन सुनिश्चित करने और शिक्षा की गुणवत्ता में लगातार सुधार करने की दिशा में भी काम करना चाहिए।
खंडपीठ ने पाया कि याचिकाकर्ता काफी लंबे समय से मॉडल कॉलेजों में सेवाएं दे रहे हैं। इसके बावजूद उनकी नियुक्तियों को नियमित नहीं किया गया।
फैसले के अंत में हाईकोर्ट ने उम्मीद जताई कि अन्य विकसित राज्य भी अपनी व्यवस्थाओं की समीक्षा करेंगे और आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाएंगे।
कोर्ट ने कहा कि मॉडल कॉलेज योजना को तत्कालीन प्रधानमंत्री की उस परिकल्पना को पूरा करना चाहिए, जिसके तहत इन संस्थानों को देश के अन्य कॉलेजों के लिए उदाहरण बनाते हुए आर्थिक विकास और राष्ट्र निर्माण में योगदान देने के उद्देश्य से शुरू किया गया था।
