इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि चेक बाउंस के मामले में कानूनी नोटिस मिलने के बाद निर्धारित 15 दिन की अवधि समाप्त होने से पहले दाखिल शिकायत कानूनन मान्य नहीं है। कोर्ट ने परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 की धारा 138 के तहत दर्ज एक मामले में आरोपी को जारी समन आदेश रद्द कर दिया।
जस्टिस संदीप जैन की सिंगल बेंच ने आरोपी अरुण गौतम की धारा 482 CrPC के तहत दाखिल याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि निर्धारित अवधि पूरी होने से पहले शिकायत पर संज्ञान लेना ट्रायल कोर्ट की गलती थी।
हालांकि, हाईकोर्ट ने शिकायतकर्ता को नई शिकायत दाखिल करने की अनुमति दी है।
15 दिन पूरे होने से पहले शिकायत पर संज्ञान नहीं लिया जा सकता
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के तीन न्यायाधीशों की बेंच के फैसले Yogendra Pratap Singh vs. Savitri Pandey पर भरोसा किया।
इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था:
“जिस तारीख को चेक जारी करने वाले आरोपी को नोटिस दिया गया है, उससे 15 दिन की अवधि समाप्त होने से पहले दाखिल कोई भी शिकायत कानून की नजर में शिकायत ही नहीं है।”
हाईकोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने Gajanand Burange vs. Laxmi Chand Goyal में भी इसी सिद्धांत का पालन किया था।
इन फैसलों के अनुसार, समय से पहले दाखिल शिकायत के आधार पर कार्यवाही नहीं की जा सकती। हालांकि, शिकायतकर्ता अधिनियम की धारा 142(b) के प्रावधान का लाभ मांगते हुए नई शिकायत दाखिल कर सकता है।
20 अप्रैल को नोटिस, 2 मई को दर्ज कर दी शिकायत
मामले में शिकायतकर्ता अमित कुमार त्रिपाठी का आरोप था कि उन्होंने जुलाई 2014 में अरुण गौतम को कारोबार के लिए बिना ब्याज के 2.5 लाख रुपये उधार दिए थे।
गौतम ने तीन महीने में रकम लौटाने का आश्वासन दिया था।
शिकायत के अनुसार, भुगतान मांगने पर गौतम ने 15 अक्टूबर 2014 का एक लाख रुपये का चेक दिया, लेकिन उसे बैंक में प्रस्तुत नहीं करने को कहा। बाद में चेक की वैधता समाप्त हो गई।
इसके बाद 23 फरवरी 2016 को 1.5 लाख रुपये का दूसरा चेक दिया गया।
यह चेक 26 फरवरी, 11 मार्च और 6 अप्रैल 2016 को तीन बार बैंक से बिना भुगतान लौट आया। हर बार बैंक ने ‘kindly contact drawer’ की टिप्पणी दर्ज की।
शिकायतकर्ता ने 20 अप्रैल 2016 को रजिस्टर्ड डाक से कानूनी नोटिस भेजा, जिसे आरोपी द्वारा स्वीकार करने से इनकार करने का आरोप लगाया गया।
इसके बाद 2 मई 2016 को शिकायत दाखिल कर दी गई।
कानपुर नगर के अतिरिक्त मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट ने 10 मई 2016 को आरोपी को समन जारी कर दिया।
आरोपी ने समय से पहले शिकायत दाखिल करने पर उठाया सवाल
आरोपी की ओर से अधिवक्ता पी.के. सिंह ने दलील दी कि यदि यह भी मान लिया जाए कि आरोपी ने 20 अप्रैल 2016 को ही नोटिस लेने से इनकार कर दिया था, तब भी 15 दिन की वैधानिक अवधि 5 मई 2016 को समाप्त होती।
इसलिए 2 मई को दाखिल शिकायत समय से पहले थी और उस पर संज्ञान नहीं लिया जा सकता था।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के Yogendra Pratap Singh और Gajanand Burange फैसलों का हवाला दिया।
दूसरी ओर, शिकायतकर्ता की ओर से अधिवक्ता छेदा लाल वर्मा ने कहा कि शिकायत दाखिल हुए लगभग दस साल बीत चुके हैं और मुकदमा अब तक पूरा नहीं हुआ है।
उन्होंने तर्क दिया कि इतने लंबे समय बाद कार्यवाही रद्द करके शिकायतकर्ता को दोबारा शिकायत दाखिल करने के लिए कहना उचित नहीं होगा।
6 मई या उसके बाद ही दाखिल हो सकती थी शिकायत
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करते हुए कहा कि नोटिस स्वीकार करने से इनकार करने की तारीख 20 अप्रैल 2016 मानने पर भी शिकायत 6 मई 2016 या उसके बाद ही दाखिल की जा सकती थी।
जस्टिस जैन ने कहा:
“यदि यह मान भी लिया जाए कि 20.04.2016 को नोटिस स्वीकार करने से इनकार किया गया था, तब भी इनकार की तारीख से 15 दिन की अवधि समाप्त होने के बाद, अर्थात 06.05.2016 या उसके बाद ही शिकायत दाखिल की जा सकती थी।”
चूंकि शिकायत 2 मई 2016 को दाखिल की गई थी, इसलिए वह समय से पहले थी।
कोर्ट ने कहा:
“ट्रायल कोर्ट ने निश्चित रूप से 10.05.2016 के विवादित आदेश द्वारा शिकायत पर संज्ञान लेने में गलती की है। यह आदेश टिकाऊ नहीं है और इसे रद्द किया जाना चाहिए।”
नई शिकायत दाखिल करने की अनुमति
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 10 मई 2016 का समन आदेश रद्द करते हुए आरोपी की याचिका स्वीकार कर ली।
साथ ही शिकायतकर्ता को नई शिकायत दाखिल करने की स्वतंत्रता दी गई।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शिकायतकर्ता देरी का पर्याप्त कारण बताकर ट्रायल कोर्ट से अधिनियम की धारा 142(b) के प्रावधान का लाभ मांग सकता है।
यदि शिकायतकर्ता दो महीने के भीतर नई शिकायत दाखिल करता है, तो ट्रायल कोर्ट को छह महीने के भीतर उसका निस्तारण करने का निर्देश दिया गया है।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: Arun Gautam vs. State of UP and Another
केस नंबर: Application U/S 482 No. 39950 of 2017
पीठ: जस्टिस संदीप जैन
फैसले की तारीख: 2 नवंबर 2026
