कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक पूर्व पुलिस अधीक्षक (एसपी) के खिलाफ चल रहे आपराधिक मुकदमे को रद्द करने से इनकार कर दिया है। पूर्व एसपी पर आरोप है कि उन्होंने विभागीय खेलकूद गतिविधियों में भाग न लेने पर अपने अधीनस्थ एक पुलिसकर्मी पर पेपरवेट फेंककर वार किया था। अदालत ने 2 सितंबर को फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि शारीरिक हमला और गंभीर चोट पहुंचाना आधिकारिक कर्तव्य के दायरे में नहीं आता।
दूसरी ओर, इसी मामले में सह-आरोपी रहे एक पूर्व पुलिस इंस्पेक्टर को हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। अदालत ने इंस्पेक्टर के खिलाफ कार्यवाही को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी देना और फटकार लगाना बल में अनुशासन बनाए रखने से जुड़ा कदम था, जिसके लिए कानूनी तौर पर पूर्व अभियोजन मंजूरी जरूरी थी।
शारीरिक हिंसा आधिकारिक कर्तव्य का हिस्सा नहीं
दोनों अधिकारियों की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए जस्टिस रवि वी होसमनी ने स्पष्ट किया कि शिकायतकर्ता और आरोपी दोनों ही पुलिस बल के सदस्य हैं, जहां चौबीसों घंटे ड्यूटी और अनुशासन की आवश्यकता होती है। अदालत ने रेखांकित किया कि सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए कानूनी सुरक्षा और मंजूरी की जांच करते समय यह देखना अनिवार्य है कि क्या कथित कृत्य का सरकारी काम से कोई सीधा संबंध था।
अदालत ने पूर्व एसपी के मामले में टिप्पणी की कि अधीनस्थ को कार्यालय में बुलाना, दरवाजे बंद करना और फिर उस पर पेपरवेट फेंकना, जिससे उसकी भौंह पर खून बहने लगा और गंभीर चोट आई, किसी भी तरह से आधिकारिक कर्तव्य से जुड़ा हुआ प्रतीत नहीं होता। पीठ ने कहा कि इस घटना के पीछे कोई उचित कारण था या नहीं, यह मुकदमा चलने के दौरान तय किया जाएगा, इसलिए इसे प्रारंभिक स्तर पर खारिज नहीं किया जा सकता।
इंस्पेक्टर पर लगे आरोप अनुशासन से जुड़े माने गए
सर्कल इंस्पेक्टर पर शिकायतकर्ता के साथ दुर्व्यवहार करने, विभागीय जांच की धमकी देने और वरिष्ठ अधिकारी को उकसाने के आरोप थे। इस पर अदालत ने कहा कि खेलकूद में गैरहाजिरी को लेकर डांटना या चेतावनी देना अनुशासन बनाए रखने के प्रयास का हिस्सा था या ज्यादा से ज्यादा इसे कर्तव्य निर्वहन के दौरान किया गया सामान्य अतिक्रमण माना जा सकता है।
अदालत ने कहा कि चूंकि इंस्पेक्टर के कदम ड्यूटी से जुड़े थे, इसलिए कर्नाटक पुलिस अधिनियम के तहत सरकार की पूर्व मंजूरी के बिना उनके खिलाफ मुकदमा आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। मंजूरी के अभाव के आधार पर इंस्पेक्टर के खिलाफ मामला समाप्त कर दिया गया।
समय-सीमा और कानूनी प्रक्रिया से जुड़े तर्क खारिज
याचिकाकर्ता अधिकारियों की ओर से पेश वकील के बी के स्वामी ने दलील दी थी कि मजिस्ट्रेट ने घटना के तीन साल से अधिक समय बाद 4 जुलाई 2015 को संज्ञान लिया, इसलिए दंड प्रक्रिया संहिता के तहत यह मामला समय-सीमा से बाहर हो चुका है। बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि मजिस्ट्रेट ने पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट को औपचारिक रूप से खारिज किए बिना समन जारी करने में प्रक्रियात्मक त्रुटि की।
हाईकोर्ट ने इन दोनों आपत्तियों को दरकिनार कर दिया। पीठ ने कहा कि शिकायतकर्ता ने घटना के अगले ही दिन यानी 3 जनवरी 2012 को शिकायत दर्ज करा दी थी, इसलिए मामला समय-सीमा से बाधित नहीं है। इसके अलावा, अदालत ने स्पष्ट किया कि यद्यपि बी रिपोर्ट पर प्रक्रिया का पालन होना चाहिए, लेकिन अलग से औपचारिक आदेश पारित न करने से कार्यवाही स्वतः अवैध नहीं हो जाती, बशर्ते मजिस्ट्रेट के आदेश से यह साफ झलके कि उन्होंने उपलब्ध सामग्री पर न्यायिक विवेक का पूरा इस्तेमाल किया है।
साल 2012 से जुड़ा है पूरा घटनाक्रम
यह मामला 2 जनवरी 2012 का है, जब खेलकूद में गैरहाजिर रहने पर शिकायतकर्ता पुलिसकर्मी को एसपी कार्यालय में तलब किया गया था। शिकायत के अनुसार, वहां अधिकारियों ने उसे डांटा और पूर्व एसपी ने कथित तौर पर पेपरवेट फेंक दिया, जिससे उसकी भौंह कट गई। पीड़ित ने यह भी आरोप लगाया था कि बाद में मामले को दबाने की कोशिशें की गईं।
शिकायत के आधार पर 3 सितंबर 2012 को प्राथमिकी दर्ज हुई थी। बाद में पुलिस जांचकर्ताओं ने साक्ष्य के अभाव का हवाला देते हुए मामले को बंद करने के लिए ‘बी’ रिपोर्ट दाखिल कर दी। इसके विरोध में पीड़ित पुलिसकर्मी ने विरोध याचिका दायर की, जिस पर विचार करते हुए मजिस्ट्रेट ने जुलाई 2015 में दोनों वरिष्ठ अधिकारियों को समन जारी कर दिया था। अब हाईकोर्ट के निर्णय के बाद जहां इंस्पेक्टर को राहत मिल गई है, वहीं पूर्व एसपी को निचली अदालत में मुकदमे का सामना करना होगा।

