इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने बुधवार को एक सरकारी स्कूल में अव्यवस्थाओं को उजागर करने वाले पत्रकार के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी (एफआईआर) से जुड़ी आगे की सभी कार्यवाहियों पर रोक लगा दी है। मामले की सुनवाई करते हुए पीठ ने टिप्पणी की कि पत्रकार के खिलाफ की गई यह पुलिसिया कार्रवाई प्रथम दृष्टया बदले की भावना से प्रेरित प्रतीत होती है।
जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने पत्रकार अमित यादव की याचिका पर यह अंतरिम आदेश सुनाया। खंडपीठ ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि एक सरकारी स्कूल की कमियों और बदहाली को जनता के सामने लाने पर किसी पत्रकार पर एफआईआर दर्ज करना ‘मैसेंजर को मारने’ (संदेशवाहक को सजा देने) के समान है।
स्कूल की दुर्दशा उजागर करने के चार दिन बाद दर्ज हुई थी एफआईआर
याचिकाकर्ता अमित यादव के वकील ने अदालत के समक्ष पक्ष रखते हुए बताया कि पत्रकार अपनी पेशेवर जिम्मेदारी के तहत गोसाईंगंज स्थित बेगारियामऊ उच्च प्राथमिक विद्यालय पहुंचे थे। वहां पड़ताल के दौरान उन्होंने पाया कि स्कूल के शौचालय बेहद जर्जर हालत में थे और विद्यार्थियों के लिए पीने के पानी तक की कोई व्यवस्था नहीं थी। इसी सिलसिले में उन्होंने विद्यालय के शिक्षकों से भी बातचीत कर उनका पक्ष लिया था।
अदालत को यह भी बताया गया कि पत्रकार की यह खोजी रिपोर्ट प्रकाशित होने के महज चार दिन बाद, यानी 24 अगस्त को, लखनऊ के गोसाईंगंज थाने में उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर ली गई थी। तथ्यों और घटनाक्रम पर गौर करने के बाद अदालत ने माना कि यह एफआईआर प्रथम दृष्टया केवल इसलिए दर्ज की गई दिखती है ताकि स्कूल की खामियां उजागर करने का बदला लिया जा सके।
बेसिक शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव से मांगा व्यक्तिगत हलफनामा
पत्रकार के विरुद्ध एफआईआर से जुड़ी कानूनी प्रक्रिया पर रोक लगाने के साथ ही हाईकोर्ट ने बेसिक शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव को एक व्यक्तिगत हलफनामा प्रस्तुत करने का निर्देश जारी किया है। पीठ ने आदेश दिया है कि इस हलफनामे में संबंधित स्कूल की मौजूदा स्थिति का पूरा ब्योरा दिया जाए और परिसर की हालिया तस्वीरें भी संलग्न की जाएं।

