रोड रेज मामला: सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकार के सोशल मीडिया डेटा पर गाजियाबाद पुलिस से मांगा जवाब

रोड रेज के एक मामले में पत्रकार का डिजिटल फुटप्रिंट मांगे जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने सोमवार को गाजियाबाद पुलिस को निर्देश दिया कि वह एक हलफनामा दाखिल कर साफ करे कि इस जांच के सिलसिले में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) से किस तरह का डेटा मांगा जा रहा है।

सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि पुलिस द्वारा जानकारी साझा किए जाने के बाद उसे अगले आदेश तक सार्वजनिक किया जाएगा। पत्रकार अभिषेक उपाध्याय की याचिका पर सुनवाई करते हुए पीठ ने टिप्पणी की कि आरोपी के निजता के अधिकार और जांच एजेंसी व पीड़ित के निष्पक्ष जांच के अधिकार के बीच संतुलन होना बेहद जरूरी है।

डिजिटल फुटप्रिंट मांगने के औचित्य पर सवाल

सुनवाई के दौरान पीठ ने गाजियाबाद पुलिस के वकील से सीधा सवाल किया कि सड़क पर हुए विवाद से जुड़े मामले में किसी आरोपी के डिजिटल फुटप्रिंट की क्या जरूरत पड़ सकती है। अदालत ने आदेश दिया कि गाजियाबाद पुलिस हलफनामे के जरिए यह स्पष्ट करे कि जांच के लिए ‘एक्स’ से वास्तव में किस तरह का विवरण मांगा गया है। इसके साथ ही पीठ ने यह भी दर्ज किया कि पत्रकार जांच में पूरा सहयोग करेंगे।

पत्रकार अभिषेक उपाध्याय के वरिष्ठ वकील ने अदालत में दलील दी कि किसी आरोपी के निजी सोशल मीडिया डेटा तक पुलिस की पहुंच को नियंत्रित करने के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश तय किए जाने चाहिए। उन्होंने अदालत को बताया कि इस मामले में पुलिस सोशल मीडिया विवरण और फोन के आईएमईआई (IMEI) नंबर जैसी बेहद निजी जानकारियां मांग रही है।

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पुलिस ने पत्रकारिता पर उठाए सवाल

दूसरी ओर, गाजियाबाद पुलिस की पैरवी कर रहे वकील ने जानकारी मांगने का कारण पूछे जाने पर अदालत का ध्यान अयोध्या राम मंदिर निर्माण से जुड़े एक इंजीनियर के खिलाफ उपाध्याय की रिपोर्टिंग की ओर दिलाया। उन्होंने कहा कि पत्रकार ने बहुत व्यापक और गंभीर आरोप लगाए थे। वकील ने सवाल उठाया कि एक तरफ पुलिस पर नियंत्रण की बात हो रही है, लेकिन इस तरह की पत्रकारिता के नियमन का क्या होगा।

पुलिस पक्ष ने दावा किया कि यह रोड रेज केस एक चश्मदीद के बयान पर दर्ज किया गया है और अभी जांच के दायरे में है। उन्होंने कहा कि यदि जांच के अंत में पत्रकार के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिलता है, तो मामले को औपचारिक रूप से बंद कर दिया जाएगा।

एफआईआर रद्द करने और स्वतंत्र जांच की मांग

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पत्रकार अभिषेक उपाध्याय ने गाजियाबाद के इंदिरापुरम थाने में दर्ज इस प्राथमिकी को रद्द करने की अपील की है। अपनी वैकल्पिक मांग में उन्होंने मामले की जांच उत्तर प्रदेश पुलिस से हटाकर किसी स्वतंत्र जांच एजेंसी को सौंपने का अनुरोध किया है।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि राम मंदिर के चंदे में कथित अनियमितताओं और राज्य में भ्रष्टाचार पर की गई उनकी खोजी रिपोर्टिंग के बदले दुर्भावना से यह झूठा मामला दर्ज कराया गया है। याचिकाकर्ता का यह भी आरोप है कि उन्हें एफआईआर की आधिकारिक प्रति तक उपलब्ध नहीं कराई गई और पुलिस ने कथित घटना स्थल के आसपास के दुकानदारों पर उस समय के सीसीटीवी फुटेज मिटाने का दबाव बनाया।

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इससे पहले 25 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने उपाध्याय को मामले में दंडात्मक कार्रवाई से अंतरिम राहत दी थी और गाजियाबाद पुलिस को निर्देश दिया था कि वह पत्रकार को एफआईआर की एक प्रति अनिवार्य रूप से मुहैया कराए।

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