मेघालय हाईकोर्ट की दो-टूक: सजा पूरी होने के बाद विदेशी नागरिक को जेल में रखना गैरकानूनी, मांगा रिहाई का प्लान

मेघालय हाईकोर्ट ने छह महीने की सजा पूरी हो जाने के एक साल से अधिक समय बाद भी जेल में बंद एक बांग्लादेशी नागरिक के मामले में कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने चेतावनी दी है कि यदि उसे आगे भी सलाखों के पीछे रखा गया, तो उसे मुआवजा देने पर विचार किया जा सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि नागरिकता के सत्यापन में हो रही देरी किसी व्यक्ति को तय सजा के बाद जेल में कैद रखने का आधार नहीं हो सकती।

मुख्य न्यायाधीश रेवती मोहिते डेरे और न्यायमूर्ति डब्ल्यू डेंगदोह की खंडपीठ ने 8 सितंबर को इस मामले पर सुनवाई करते हुए जेल महानिरीक्षक (आईजी प्रिजन) को 9 सितंबर को अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश दिया। पीठ ने अधिकारी से यह बताने को कहा है कि रिहाई के बाद इस विदेशी नागरिक को कहां रखा जाएगा।

प्रशासनिक औपचारिकताएं जेल में रखने की वजह नहीं हो सकतीं

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सुनवाई के दौरान राज्य के सहायक महाधिवक्ता (एएजी) ने पीठ को बताया कि कैदी अपनी छह महीने की सजा बहुत पहले पूरी कर चुका है, लेकिन बांग्लादेश के सहायक उच्चायुक्त की ओर से नागरिकता का सत्यापन अभी लंबित है। इसी वजह से उसे एक साल से ज्यादा समय से जेल में ही रखा गया है।

हाईकोर्ट ने सरकार की इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया। खंडपीठ ने कहा कि आपराधिक सजा काटना और उसके बाद की प्रशासनिक औपचारिकताएं पूरी होना, दोनों बिल्कुल अलग बातें हैं। अदालत ने कहा कि सजा पूरी होने के बाद उस बांग्लादेशी नागरिक को डिटेंशन सेंटर में रखा जाना चाहिए था या फिर उसे वापस भेजा जाना चाहिए था। अपनी तय अवधि पूरी हो जाने के बाद भी उसे जेल में रखना पूरी तरह से अवैध हिरासत के दायरे में आता है।

विदेशी दूतावास से जवाब में देरी पर अदालत की सख्त टिप्पणी

पीठ ने नाराजगी जताते हुए कहा कि जेल प्रशासन को बांग्लादेशी मिशन से सत्यापन की प्रक्रिया मामला शुरू होते ही शुरू कर देनी चाहिए थी। महज इस बात पर कि उच्चायुक्त की तरफ से कोई जवाब नहीं आया है, किसी व्यक्ति को सजा खत्म होने के बाद जेल में नहीं रखा जा सकता।

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अदालत ने कहा कि विदेशी उच्चायोग से जवाब मिलने में महीनों या कई साल का समय लग सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि सजा पूरी कर चुका कैदी उस पूरी अवधि के दौरान जेल में ही सड़ता रहे। अदालत ने दोहराया कि लगभग एक साल पहले सजा पूरी कर चुके व्यक्ति को इस तरह अनिश्चितकाल तक बंदी बनाए रखना न्यायसंगत नहीं है।

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