IPC की धारा 467 के तहत जालसाजी ‘जघन्य अपराध’ नहीं, किशोर पर वयस्क की तरह मुकदमा नहीं चल सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 467 के तहत जालसाजी का अपराध किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के अंतर्गत ‘जघन्य अपराध’ (Heinous Offence) की श्रेणी में नहीं आता, क्योंकि इस धारा में न्यूनतम कारावास की सजा निर्धारित नहीं है। ऐसे मामले में किशोर न्याय बोर्ड किसी किशोर को वयस्क की तरह मुकदमे का सामना करने के लिए चिल्ड्रन्स कोर्ट नहीं भेज सकता।

जस्टिस जय प्रकाश तिवारी ने एक किशोर की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए बुलंदशहर किशोर न्याय बोर्ड और चिल्ड्रन्स कोर्ट के आदेश रद्द कर दिए। हाईकोर्ट ने मामले को ‘गंभीर अपराध’ (Serious Offence) के रूप में जांच के लिए किशोर न्याय बोर्ड को वापस भेज दिया।

क्या था मामला?

30 जून 2016 को अल्तमश प्राइवेट लिमिटेड के मालिक हाजी रफीक ने बुलंदशहर के खुर्जा नगर थाने में अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ 40 लाख रुपये की कथित धोखाधड़ी की FIR दर्ज कराई थी।

जांच के बाद कई आरोपियों के खिलाफ IPC की धारा 419, 420, 467, 468, 471 और 120-B के तहत चार्जशीट दाखिल की गई। इनमें पुनरीक्षण याचिका दाखिल करने वाला किशोर भी शामिल था।

10 मई 2022 को किशोर न्याय बोर्ड ने उसे घटना के समय 16 वर्ष, 9 महीने और 7 दिन का किशोर घोषित किया।

बोर्ड ने अपराध को जघन्य मानते हुए अधिनियम की धारा 15 के तहत प्रारंभिक आकलन किया और 18 मई 2022 को धारा 18(3) के तहत वयस्क की तरह मुकदमा चलाने के लिए मामला चिल्ड्रन्स कोर्ट भेज दिया।

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इसके बाद CrPC की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट में कार्यवाही सहित अन्य कानूनी प्रक्रियाओं के बाद रिकॉर्ड दोबारा बोर्ड के पास पहुंचा।

20 जुलाई 2023 को बोर्ड ने माना कि यह गंभीर अपराध है और मामले की सुनवाई का अधिकार उसी के पास है।

हालांकि, 11 मई 2026 को बोर्ड ने किशोर की उस अर्जी को खारिज कर दिया, जिसमें उसके समक्ष ही कार्यवाही चलाने की मांग की गई थी। बोर्ड ने कहा कि 18 मई 2022 का स्थानांतरण आदेश अब भी वैध और बाध्यकारी है तथा उसे अपने आदेश की समीक्षा करने का अधिकार नहीं है।

चिल्ड्रन्स कोर्ट ने 16 जुलाई 2026 को इसके खिलाफ अपील भी खारिज कर दी।

पक्षों की दलीलें

किशोर की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुशील शुक्ला और अधिवक्ता अंकिता तिवारी ने सुप्रीम कोर्ट के Shilpa Mittal v. State (NCT of Delhi), (2020) 2 SCC 787 के फैसले पर भरोसा किया।

उन्होंने कहा कि IPC की धारा 467 में न्यूनतम सात वर्ष की सजा निर्धारित नहीं है। इसलिए यह जघन्य नहीं, बल्कि गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है।

उनकी दलील थी कि प्रारंभिक आकलन और वयस्क की तरह ट्रायल के लिए मामला स्थानांतरित करने का प्रावधान केवल जघन्य अपराधों पर लागू होता है। इसलिए किशोर को चिल्ड्रन्स कोर्ट भेजना अधिकार क्षेत्र के बिना की गई कार्रवाई थी।

राज्य की ओर से अपर शासकीय अधिवक्ता आशुतोष श्रीवास्तव और विपक्षी संख्या दो की ओर से अधिवक्ता श्याम किशोर यादव ने संबंधित आदेशों का समर्थन किया।

उन्होंने कहा कि 18 मई 2022 के स्थानांतरण आदेश को कभी चुनौती नहीं दी गई और वह अंतिम हो चुका है। उनका तर्क था कि किशोर न्याय बोर्ड सहित आपराधिक अदालतों को अपने आदेशों की समीक्षा या उन्हें वापस लेने का अधिकार नहीं है।

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धारा 467 का अपराध गंभीर श्रेणी में आएगा

हाईकोर्ट ने Shilpa Mittal फैसले को लागू करते हुए कहा कि जिन अपराधों में अधिकतम सजा सात वर्ष से अधिक है, लेकिन न्यूनतम सजा निर्धारित नहीं है, उन्हें संसद द्वारा कानून में संशोधन किए जाने तक गंभीर अपराध माना जाएगा।

कोर्ट ने कहा:

“चूंकि IPC की धारा 467 में कारावास की कोई न्यूनतम सजा निर्धारित नहीं है, इसलिए यह धारा 2(33) के तहत ‘जघन्य अपराध’ की परिभाषा में नहीं आती।”

अधिकार क्षेत्र के बिना दिया गया आदेश शुरुआत से ही अमान्य

हाईकोर्ट ने Kiran Singh v. Chaman Paswan और Vikram Bakshi v. R.P. Khosla के फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि CrPC की धारा 362 का प्रतिबंध प्रक्रियात्मक कारणों से आदेश वापस लेने के वास्तविक आवेदन पर लागू नहीं होता। इसमें ऐसे मामले भी शामिल हैं, जहां अदालत के पास मूल रूप से अधिकार क्षेत्र ही नहीं था।

कोर्ट ने कहा:

“किशोर न्याय बोर्ड के पास धारा 15 लागू करने या धारा 18(3) के तहत स्थानांतरण आदेश पारित करने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं था।”

हाईकोर्ट ने आगे कहा:

“प्रक्रियात्मक बाधाओं या किसी आदेश को वापस लेने में असमर्थता का हवाला देकर वैधानिक अधिकार क्षेत्र न तो बनाया जा सकता है और न ही उसका त्याग किया जा सकता है।”

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कोर्ट ने स्पष्ट किया:

“विषय-वस्तु पर अधिकार क्षेत्र के अभाव में किसी अदालत या बोर्ड द्वारा पारित आदेश शुरुआत से ही अमान्य होता है।”

हाईकोर्ट ने चिल्ड्रन्स कोर्ट द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र को बरकरार रखने को भी गलत पाया।

कोर्ट के अनुसार, चिल्ड्रन्स कोर्ट को अधिनियम की धारा 19(1)(ii) के तहत बोर्ड के रूप में जांच करनी चाहिए थी या धारा 9(2) तथा CrPC की धारा 228(1)(a) (BNSS की धारा 251(1)(a)) के तहत अधिकार क्षेत्र से इनकार करते हुए रिकॉर्ड बोर्ड को वापस भेजना चाहिए था।

हाईकोर्ट का फैसला

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किशोर न्याय बोर्ड का 11 मई 2026 और चिल्ड्रन्स कोर्ट का 16 जुलाई 2026 का आदेश रद्द कर दिया।

कोर्ट ने मामला बुलंदशहर किशोर न्याय बोर्ड को वापस भेजते हुए निर्देश दिया कि अधिनियम की धारा 14 सहपठित धारा 18(1) के तहत गंभीर अपराधों के लिए निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार जांच की जाए।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किशोर पर वयस्क की तरह ट्रायल नहीं चलाया जाएगा। चिल्ड्रन्स कोर्ट को मामले का रिकॉर्ड तत्काल किशोर न्याय बोर्ड भेजने का निर्देश दिया गया।

केस डिटेल्स

केस का नाम: Juvenile – X v. State of U.P. and Another

केस नंबर: Criminal Revision No. 4845 of 2026

पीठ: जस्टिस जय प्रकाश तिवारी

फैसले की तारीख: 27 अक्टूबर 2026

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