प्रोविडेंट फंड और स्टॉक प्लान की कटौती से मेंटेनेंस की रकम कम नहीं की जा सकती: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि प्रोविडेंट फंड (पीएफ) और एम्प्लॉई स्टॉक परचेज प्लान (ईएसपीपी) जैसी स्वैच्छिक कटौतियों को अनिवार्य कटौती नहीं माना जा सकता और न ही इनके आधार पर पति की डिस्पोजेबल आय घटाकर भरण-पोषण (मेंटेनेंस) की राशि कम की जा सकती है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने अपने दो नाबालिग बेटों के लिए भरण-पोषण राशि बढ़ाने और गंभीर बीमारी से जूझ रही पत्नी को अंतरिम व्यक्तिगत मेंटेनेंस देने की मांग वाली याचिका पर यह निर्णय दिया। शीर्ष अदालत ने बच्चों के कुल मासिक भरण-पोषण को 1,25,000 रुपये से बढ़ाकर 1,50,000 रुपये (75,000 रुपये प्रति बच्चा) कर दिया है, जो 1 जनवरी 2025 से लागू होगा। इसके साथ ही, पत्नी के अंतरिम व्यक्तिगत भरण-पोषण को बढ़ाकर 30,000 रुपये प्रति माह कर दिया है।

मामले की पृष्ठभूमि

दंपति का विवाह दिसंबर 2004 में दिल्ली में सिख रीति-रिवाज से संपन्न हुआ था। इस शादी से जनवरी 2011 और जुलाई 2014 में दो बेटों का जन्म हुआ। बाद में वैवाहिक संबंधों में खटास आ गई और जून 2018 में पति अपनी पत्नी और बच्चों को छोड़कर अलग रहने लगा।

इसके बाद पत्नी ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(ia) के तहत तीस हजारी स्थित फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दायर की। इसके साथ ही धारा 24 और 26 के तहत अपने और दोनों नाबालिग बच्चों के लिए 2,00,000 रुपये प्रति माह के अंतरिम भरण-पोषण और मुकदमे के खर्च की मांग की।

फैमिली कोर्ट ने 8 जनवरी 2021 को पत्नी को मेंटेनेंस देने से इनकार कर दिया था, क्योंकि पत्नी की मासिक आय 91,000 रुपये थी और वह फ्लैट की 48,888 रुपये की ईएमआई चुकाते हुए उसी घर में रह रही थी, जबकि पति की शुद्ध आय 2,70,000 रुपये थी। हालांकि, अदालत ने बच्चों के लिए सितंबर 2019 से दिसंबर 2020 तक 37,000 रुपये प्रति बच्चा और जनवरी 2021 से इसे बढ़ाकर 40,000 रुपये प्रति बच्चा प्रति माह कर दिया। दिल्ली हाईकोर्ट ने मार्च 2021 में इस आदेश को बरकरार रखा था।

बाद में दोनों पक्षों ने मुलाक़ात के अधिकार, मेंटेनेंस घटाने और कार स्वामित्व हस्तांतरण जैसी कई अर्जियां लगाईं। अक्टूबर 2022 में पत्नी ने बच्चों के मासिक खर्च 1,66,847 रुपये और बढ़ती फीस का हवाला देकर मेंटेनेंस बढ़ाकर 85,000 रुपये प्रति बच्चा (कुल 1,70,000 रुपये) करने की मांग की। जुलाई 2024 में फैमिली कोर्ट ने अप्रैल 2024 से बच्चों का मेंटेनेंस बढ़ाकर 50,000 रुपये प्रति बच्चा कर दिया।

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पत्नी ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। अपील के दौरान, अगस्त 2024 में पत्नी को एग्रेसिव ब्रेस्ट कैंसर का पता चला। दिसंबर 2024 में हाईकोर्ट ने पति को पत्नी के इलाज के लिए 20,000 रुपये प्रति माह अंतरिम मेंटेनेंस देने का निर्देश दिया। पति द्वारा लगातार आदेश न मानने पर हाईकोर्ट ने उसके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई शुरू की। अगस्त 2025 में हाईकोर्ट ने अपील का निपटारा करते हुए बच्चों का मेंटेनेंस बढ़ाकर कुल 1,25,000 रुपये प्रति माह कर दिया और पति द्वारा बिना शर्त माफी मांगने तथा कार पत्नी के नाम ट्रांसफर करने के आश्वासन के बाद अवमानना मामला बंद कर दिया। इसके बाद पत्नी ने भरण-पोषण की राशि और आदेशों से असंतुष्ट होकर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

अदालत में पक्षों की दलीलें

पत्नी के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के सामने तर्क दिया कि रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों से साफ है कि बच्चों का मासिक खर्च ही 1,66,847 रुपये है। यह भी दलील दी गई कि पति द्वारा अपनी आय से दर्शाई गई कटौतियों में ईएसपीपी जैसी स्वैच्छिक कटौतियां शामिल हैं, जिन्हें मेंटेनेंस तय करते समय आय कम करने के लिए अनिवार्य कटौती नहीं माना जा सकता। इसके अतिरिक्त, गंभीर बीमारी के कारण पत्नी की वित्तीय स्थिति पर भी भारी असर पड़ा था।

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दूसरी ओर, पति ने निचली अदालतों और हाईकोर्ट में दावा किया था कि मांगें बहुत अधिक हैं। हाईकोर्ट के 14 अगस्त 2025 के आदेश में पति की आय के बयान को दर्ज किया गया था:

“दूसरी ओर, व्यक्तिगत रूप से पेश हुए प्रतिवादी का कहना है कि उनके वेतन के अलावा, जो लगभग 4,00,000 रुपये प्रति माह है, उन्हें औसतन 6,00,000 रुपये प्रति वर्ष का बोनस भी मिलता है। इस प्रकार, उनकी मासिक आय लगभग 4,50,000 रुपये अनुमानित है। इस मासिक आय में से आयकर, प्रोविडेंट फंड, प्रोफेशनल टैक्स आदि सहित अनिवार्य कटौतियों के तहत 1,64,856 रुपये काटे जाने आवश्यक हैं। उनके पास हर महीने लगभग 2,80,000 रुपये बचते हैं।”

सुप्रीम कोर्ट का कानूनी विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने पति द्वारा दर्शाई गई वेतन कटौतियों की प्रकृति की जांच की और स्पष्ट किया कि स्वैच्छिक वित्तीय योगदानों को अनिवार्य देनदारियों की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता ताकि भरण-पोषण की राशि को कम किया जा सके।

अनिवार्य करों और स्वैच्छिक योगदानों के बीच अंतर समझाते हुए पीठ ने टिप्पणी की:

“हम पाते हैं कि प्रोविडेंट फंड और ईएसपीपी की कटौतियां आखिरकार ऐसे लाभ हैं जो अंततः प्रतिवादी-पति को ही मिलेंगे। आयकर या प्रोफेशनल टैक्स जैसे अनिवार्य करों के विपरीत, पीएफ और ईएसपीपी स्थायी प्रभार नहीं हैं, बल्कि ये प्रतिवादी-पति के खाते में जमा होते हैं, जिन्हें भविष्य में जमाकर्ता द्वारा निकाला जा सकता है।”

अदालत ने पत्नी के कैंसर के इलाज में हो रहे भारी खर्च और दोनों बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी पर भी ध्यान दिया। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट के अंतिम आदेश में पत्नी के 20,000 रुपये के अंतरिम व्यक्तिगत भरण-पोषण का जिक्र नहीं था, इसलिए उसके चिकित्सीय खर्चों को ध्यान में रखते हुए इस राशि को बढ़ाना आवश्यक माना गया।

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सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट द्वारा तय की गई राशि पर पुनर्विचार की जरूरत है। अदालत ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:

  1. बच्चों का भरण-पोषण: दोनों बच्चों के लिए कुल मासिक भरण-पोषण बढ़ाकर 1,50,000 रुपये (75,000 रुपये प्रति बच्चा) कर दिया गया, जो 1 जनवरी 2025 से लागू होगा। अदालत ने कहा कि परिस्थितियां बदलने पर पत्नी भविष्य में बढ़ोतरी की मांग कर सकती है।
  2. व्यक्तिगत भरण-पोषण: पत्नी के इलाज और चिकित्सीय खर्चों को देखते हुए उनके अंतरिम व्यक्तिगत भरण-पोषण को बढ़ाकर 30,000 रुपये प्रति माह कर दिया गया।
  3. वाहन हस्तांतरण: पति को निर्देश दिया गया कि वह गाड़ी के स्वामित्व हस्तांतरण की प्रक्रिया को तीन महीने के भीतर पूरा करे।

इसके साथ ही सिविल अपीलों का निपटारा कर दिया गया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: हरप्रीत साहनी बनाम पुनीत शर्मा
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या… ऑफ 2026 (विशेष अनुमति याचिका (सिविल) संख्या 31815-31816/2025 से उत्पन्न)
पीठ: जस्टिस संजय करोल, जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह
निर्णय की तिथि: 10 अगस्त 2026

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