आपराधिक न्यायशास्त्र से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदूरकर शामिल थे, ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 376 के तहत दुष्कर्म के दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति को बरी कर दिया। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि जिस गवाही को अपहरण (धारा 366) के आरोप से बरी करने के लिए अविश्वसनीय मानकर खारिज कर दिया गया हो, उसी गवाही को चुनकर दुष्कर्म के अपराध में दोषसिद्धि का आधार नहीं बनाया जा सकता। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट द्वारा बरकरार रखी गई 10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा को रद्द करते हुए पीठ ने टिप्पणी की कि बिना किसी पुख्ता और ठोस सबूत के केवल न्यायाधीश के व्यक्तिगत मूल्य निर्णयों, अटकलों या कथित अनैतिकता के आधार पर आपराधिक दायित्व तय नहीं किया जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
अभियोजन पक्ष के अनुसार, 19 जून 2009 को शाम करीब 7:30 बजे लुधियाना में आठवीं कक्षा की छात्रा (पीड़िता) पड़ोस की दुकान से किराना सामान लेने निकली थी। रास्ते में उसे अपीलकर्ता मिला, जो उसका पूर्व परिचित था और उसकी बेटी पीड़िता की सहेली थी। अपीलकर्ता ने अपनी बेटी से मिलाने की बात कहकर उसे कार में बैठा लिया, जिसमें दो अज्ञात लड़के पहले से बैठे थे जो बाद में उतर गए।
पीड़िता का आरोप था कि अपीलकर्ता उसे लुधियाना स्थित एलआईजी फ्लैट्स ले गया, जहां उसे दो दिन बंधक बनाकर रखा गया और उसके साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाए गए। इसके बाद 22 जून 2009 को वह उसे स्कूटर पर बैठाकर मलेरकोटला स्थित एक बंद पड़ी फैक्ट्री में ले गया। वहां उसे 25 जून तक एक कमरे में बंधक रखा गया और जान से मारने की धमकी देकर दुष्कर्म किया गया। पीड़िता के अनुसार, 25 जून 2009 को जब वे लुधियाना लौटे, तो रेलवे कॉलोनी नंबर 5 के पास पुलिस और पीड़िता के पिता ने उन्हें पकड़ लिया। इस संबंध में लुधियाना के डिवीजन नंबर 5 थाने में प्राथमिकी दर्ज की गई और बाद में पुलिस ने धारा 366 तथा 376 के तहत चार्जशीट दाखिल की।
लुधियाना के सेशन जज ने 1 जून 2012 को दिए फैसले में अपीलकर्ता को धारा 366 (अपहरण) के आरोप से बरी कर दिया। कोर्ट ने रेडियोलॉजिकल जांच (हड्डी परीक्षण) के आधार पर पीड़िता को बालिग (लगभग 19 वर्ष) पाया और माना कि वह बिना किसी विरोध या शोर-शराबे के अपनी मर्जी से साथ गई थी। हालांकि, अदालत ने अपीलकर्ता को धारा 376 के तहत दोषी ठहराते हुए 10 साल के कठोर कारावास और 5,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई। अदालत का तर्क था कि एक महिला किसी पुरुष के साथ जाने और रात बिताने के लिए सहमत हो सकती है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि उसने शारीरिक संबंध बनाने की भी सहमति दी हो। इसके बाद 12 सितंबर 2013 को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने साक्ष्य अधिनियम की धारा 114ए के कानूनी अनुमान का हवाला देते हुए अपील खारिज कर दी। शीर्ष अदालत ने 30 जनवरी 2015 को अपीलकर्ता को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया था, जब वह करीब 6 साल की जेल काट चुका था।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता के वकील राजीव कटारिया ने दलील दी कि उनके मुवक्किल को पूर्व के दीवानी और वित्तीय विवादों के चलते झूठा फंसाया गया है। उन्होंने बताया कि पीड़िता के पिता ने अपीलकर्ता से 1,50,000 रुपये उधार लिए थे और पैसे वापस मांगने पर झूठे मुकदमे में फंसाने की धमकी दी थी। इसके अलावा, अपीलकर्ता और पीड़िता के एक नजदीकी रिश्तेदार के बीच मकान किराए को लेकर भी कानूनी विवाद चल रहा था।
बचाव पक्ष के वकील ने जोर देकर कहा कि सेशन कोर्ट द्वारा अपहरण के आरोप से बरी किए जाने का फैसला अंतिम हो चुका है, क्योंकि न तो राज्य सरकार ने और न ही शिकायतकर्ता ने इसे चुनौती दी थी। उन्होंने तर्क दिया कि पीड़िता पूरी तरह सहमति से साथ गई थी; वह भीड़भाड़ वाले बाजारों, जगमगाते चौराहों और ट्रेन में यात्रा के दौरान साथ रही, लेकिन उसने कभी भागने का प्रयास नहीं किया और न ही कोई शोर मचाया। इसके अतिरिक्त, मेडिकल जांच में पीड़िता के शरीर या नाजुक अंगों पर चोट का कोई निशान नहीं मिला और स्कूटर की डिग्गी से पीड़िता के अतिरिक्त कपड़े बरामद हुए थे, जिससे साबित होता है कि वह घर से पूरी तैयारी के साथ निकली थी।
दूसरी ओर, पंजाब राज्य की ओर से पेश वकील नूपुर कुमार ने सजा का समर्थन करते हुए दलील दी कि पीड़िता ने अपने बयान में स्पष्ट कहा है कि उसके साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाए गए थे। उन्होंने कहा कि स्कूल रिकॉर्ड के अनुसार घटना के समय पीड़िता की आयु लगभग 15 वर्ष थी, इसलिए सहमति का कोई कानूनी महत्व नहीं रह जाता। साथ ही, बचाव पक्ष साक्ष्य अधिनियम की धारा 114ए के तहत मिलने वाले वैधानिक अनुमान को झुठलाने में नाकाम रहा है।
अदालत का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों और 2013 के संशोधन से पहले के प्रासंगिक कानूनी प्रावधानों की पड़ताल की। अदालत ने रेखांकित किया कि ट्रायल कोर्ट का यह निष्कर्ष कि पीड़िता बालिग थी और अपनी इच्छा से साथ गई थी, राज्य द्वारा चुनौती न दिए जाने के कारण अंतिम रूप ले चुका है।
पीड़िता के बयानों की विस्तृत समीक्षा करते हुए पीठ ने गंभीर विरोधाभास पाए। मुख्य परीक्षा में पीड़िता ने कहा था कि वे मलेरकोटला से लुधियाना कार द्वारा लौटे थे, जबकि जिरह (क्रॉस-एग्जामिनेशन) में उसने स्वीकार किया कि वे भीड़भाड़ वाली ट्रेन में बिना टिकट सफर करके आए थे और उसने पास बैठे यात्रियों को घटना की कोई जानकारी नहीं दी। इसके अलावा, लुधियाना से मलेरकोटला तक डेढ़ घंटे के स्कूटर सफर के दौरान कई व्यस्त और रोशनी से भरे चौराहे पार किए गए, लेकिन उसने न तो उतरने की कोशिश की और न ही मदद की गुहार लगाई। ऐसे में कमरे के भीतर चीख-पुकार मचाने का उसका दावा अदालत के गले नहीं उतरा।
फॉरेंसिक साक्ष्यों पर अदालत ने स्पष्ट टिप्पणी की:
“मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए पीड़िता के वेजाइनल स्वाब में केवल शुक्राणुओं की मौजूदगी दुष्कर्म साबित नहीं करती।”
ट्रायल कोर्ट के इस तर्क को भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया कि कुछ महिलाएं पुरुषों के साथ दूर तक यात्रा करती हैं फिर भी यौन संबंध की सहमति नहीं देतीं। अदालत ने टिप्पणी की:
“(हालांकि ‘महिलाओं’ शब्द के आगे ‘साहसी’ विशेषण लगाना पूरी तरह से अनुचित है)”
पीठ ने माना कि सामान्य स्थिति में ऐसा होना संभव हो सकता है, लेकिन इस मामले का संदर्भ पूरी तरह भिन्न है क्योंकि पीड़िता 5-6 दिनों तक घर से गायब रहकर स्वेच्छा से अपीलकर्ता के साथ घूमती और ठहरती रही।
पीड़िता की गवाही के कानूनी मूल्यांकन पर सुप्रीम कोर्ट ने सिद्धांत स्पष्ट करते हुए कहा:
“यद्यपि यह सही है कि पीड़िता की एकमात्र गवाही के आधार पर किसी आरोपी को दुष्कर्म का दोषी ठहराया जा सकता है, लेकिन ऐसी दोषसिद्धि के लिए यह भी आवश्यक है कि पीड़िता का बयान अदालत के विश्वास को जगाए। धारा 366 आईपीसी के लिए पीड़िता के साक्ष्य को आंशिक रूप से खारिज करना और उसी बयान को धारा 376 आईपीसी के आरोप को साबित करने के लिए आंशिक रूप से स्वीकार करना संभव नहीं है। यदि पीड़िता का साक्ष्य बेदाग चरित्र का है, तो उसे पूरी तरह स्वीकार किया जाना चाहिए। पीड़िता के बयान को टुकड़ों में स्वीकार और टुकड़ों में खारिज नहीं किया जा सकता।”
नैतिकता बनाम कानूनी सबूत के अंतर को स्पष्ट करते हुए पीठ ने निर्देश दिया:
“जब विद्वान सेशन जज ने आईपीसी की धारा 366 के आरोप के संबंध में अभियोजन पक्ष की कहानी पर अविश्वास जताया था, तो उसी कहानी को धारा 376 आईपीसी के तहत आरोपी-अपीलकर्ता को दोषी ठहराने के लिए स्वीकार नहीं किया जा सकता था। हालांकि अपीलकर्ता का आचरण अनैतिक और अनुचित हो सकता है, लेकिन केवल यही बात बिना किसी ठोस और पुख्ता सबूत के धारा 376 आईपीसी के तहत दोषसिद्धि को उचित नहीं ठहरा सकती। ऐसा आरोप पीठासीन न्यायाधीश के व्यक्तिगत मूल्य निर्णयों पर आधारित अनुमानों और अटकलों के बजाय ठोस सबूतों के आधार पर साबित होना चाहिए। विश्वसनीय साक्ष्यों के बिना किसी कृत्य की अनैतिकता दोषसिद्धि का आधार नहीं बन सकती।”
निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि सेशन कोर्ट और हाईकोर्ट द्वारा दी गई दोषसिद्धि कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं है। अदालत ने 1 जून 2012 के सेशन जज के फैसले और 12 सितंबर 2013 के हाईकोर्ट के आदेश को निरस्त कर दिया। इसके साथ ही अपीलकर्ता को धारा 376 के आरोप से बरी करते हुए अपील स्वीकार कर ली गई।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: परमजीत सिंह बेदी बनाम पंजाब राज्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 203/2015
पीठ: जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदूरकर
निर्णय की तिथि: 25 सितंबर 2026

