गैर-सहायता प्राप्त प्राइवेट शिक्षण ट्रस्ट द्वारा सेवा समाप्ति के खिलाफ आर्टिकल 226 के तहत रिट याचिका पोषणीय नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सेवा मामलों में संवैधानिक रिट क्षेत्राधिकार की सीमाओं को स्पष्ट करते हुए एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी गैर-सहायता प्राप्त निजी शैक्षणिक ट्रस्ट द्वारा शिक्षक की सेवा समाप्त किए जाने के खिलाफ संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दाखिल रिट याचिका पोषणीय (मेंटेनेबल) नहीं है, बशर्ते विवाद पूरी तरह से सेवा अनुबंध पर आधारित हो और उसमें सार्वजनिक कानून (पब्लिक लॉ) का कोई तत्व शामिल न हो। जस्टिस मंजू रानी चौहान की एकलपीठ ने केवल पोषणीयता के आधार पर इस रिट याचिका को खारिज कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

याची नूतन राय ने एक निजी शैक्षणिक ट्रस्ट के प्रबंधन द्वारा अपनी सेवा समाप्त किए जाने के निर्णय को चुनौती देते हुए संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। सुनवाई के दौरान प्रतिवादी शैक्षणिक संस्थान के वकील ने एक निजी और गैर-सहायता प्राप्त निकाय के खिलाफ रिट याचिका की पोषणीयता पर प्रारंभिक आपत्ति दर्ज कराई। इसके जवाब में याची ने अतिरिक्त हलफनामा (सप्लीमेंट्री एफिडेविट) दाखिल कर संबंधित दस्तावेज रिकॉर्ड पर लाने के लिए समय मांगा, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया था।

याची पक्ष की दलीलें

याची के अधिवक्ता प्रमोद कुमार सिंह पालीवाल ने तर्क दिया कि निजी प्रबंधन के खिलाफ भी रिट याचिका पोषणीय है। अपनी दलील के समर्थन में उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट के मनोज कुमार, प्रिंसिपल (टर्मिनेटेड) बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य (रिट याचिका संख्या 39866/2006) के पैरा 19 पर भरोसा जताया, जिसमें कहा गया था कि अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका सार्वजनिक कर्तव्यों या दायित्वों का निर्वहन करने वाले निजी निकायों और वैधानिक कार्यों को पूरा करने के लिए बाध्य व्यक्तियों या संस्थाओं के खिलाफ भी पोषणीय होती है।

इसके अतिरिक्त, याची की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वीएसटी इंडस्ट्रीज लिमिटेड बनाम वीएसटी इंडस्ट्रीज वर्कर्स यूनियन (2001) और अंडी मुक्ता सद्गुरु श्री मुक्ताजी वंदस स्वामी सुवर्ण जयंती महोत्सव स्मारक ट्रस्ट व अन्य बनाम वी.आर. रुदानी व अन्य (1989) के फैसलों का हवाला देते हुए कहा गया कि किसी निजी ट्रस्ट के खिलाफ भी परमादेश (मैंडमस) जारी किया जा सकता है। साथ ही, इलाहाबाद हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ (फुल बेंच) के फैसले उत्तम चंद रावत बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व 7 अन्य (रिट-ए संख्या 9814/2020) के पैरा 34 का संदर्भ लेते हुए याचिका को सुनवाई योग्य बताया गया।

प्रतिवादी पक्ष की दलीलें

याचिका का विरोध करते हुए प्रतिवादी पक्ष के अधिवक्ताओं ने दलील दी कि अंडी मुक्ता सद्गुरु मामले पर याची का भरोसा गलत है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उस मामले में संबंधित संस्थान को सरकार से वित्तीय सहायता मिल रही थी, जबकि वर्तमान मामले में ट्रस्ट द्वारा संचालित संस्थान पूरी तरह से गैर-सहायता प्राप्त है और उसे सरकार से कोई अनुदान नहीं मिलता। इसके अलावा, अंडी मुक्ता का विवाद बकाए वेतन और सेवानिवृत्ति पर मिलने वाले लाभों से जुड़ा था, न कि सेवा समाप्ति की चुनौती या संविदात्मक दायित्वों को लागू कराने से।

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प्रतिवादी के वकीलों ने मनोज कुमार मामले को भी अलग बताते हुए कहा कि वह संस्थान यूपी इंटरमीडिएट एजुकेशन एक्ट, 1921 के तहत मान्यता प्राप्त था और वहां के शिक्षकों की सेवा शर्तें 10 अगस्त 2001 के सरकारी आदेश द्वारा वैधानिक रूप से नियंत्रित थीं। इसके विपरीत, वर्तमान संस्थान न तो किसी कानून के तहत स्थापित हुआ है और न ही किसी कानून के तहत मान्यता प्राप्त है; यह केवल स्वैच्छिक आधार पर ग्रामीण बच्चों को मुफ्त शिक्षा उपलब्ध कराता है।

प्रतिवादी पक्ष ने उत्तम चंद रावत मामले में दिए गए ‘ट्विन-टेस्ट’ (दोहरे परीक्षण) का उल्लेख किया, जिसके अनुसार किसी निकाय का सार्वजनिक कार्य करना ही काफी नहीं है, बल्कि जिस कार्रवाई को चुनौती दी गई है, वह भी सार्वजनिक कानून के दायरे में आनी चाहिए, न कि निजी अनुबंध के तहत।

इसके अलावा, प्रतिवादी पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के निम्नलिखित फैसलों पर जोर दिया:

  • सेंट मैरी एजुकेशन सोसाइटी व अन्य बनाम राजेंद्र प्रसाद भार्गव व अन्य (2022): जिसमें तय हुआ कि बिना किसी वैधानिक समर्थन वाले साधारण सेवा अनुबंध के तहत लिए गए निर्णयों को अनुच्छेद 226 के तहत चुनौती नहीं दी जा सकती।
  • आर्मी वेलफेयर एजुकेशन सोसाइटी बनाम सुनील कुमार शर्मा (2024): जिसमें स्पष्ट किया गया कि किसी निजी शिक्षण संस्थान और उसके कर्मचारियों के बीच विशुद्ध रूप से निजी सेवा विवाद के लिए रिट याचिका पोषणीय नहीं है।
  • दिलीप कुमार पांडेय बनाम भारत संघ (2025): जिसमें माना गया कि अनुबंध के कथित उल्लंघन में सार्वजनिक कानून का कोई तत्व नहीं होता और शिक्षकों के नियोजन के संबंध में कोई निजी स्कूल किसी सार्वजनिक कर्तव्य का निर्वहन नहीं करता।
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हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

दोनों पक्षों की दलीलों और नजीरों का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि यद्यपि अनुच्छेद 226 का क्षेत्राधिकार केवल सरकारी या वैधानिक संस्थाओं तक ही सीमित नहीं है, फिर भी सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह देखना है कि किस प्रकार के दायित्व को लागू कराने की मांग की जा रही है। जस्टिस मंजू रानी चौहान ने टिप्पणी की:

“इसलिए केवल प्रतिवादी का विधिक स्वरूप ही अपने आप में निर्णायक नहीं है; प्राथमिक महत्व इस बात का है कि किस प्रकार के कर्तव्य को लागू कराने की मांग की जा रही है और अदालत के समक्ष लाए गए विवाद का वास्तविक स्वरूप क्या है।”

अदालत ने कहा कि वीएसटी इंडस्ट्रीज लिमिटेड का निर्णय यह रेखांकित करता है कि किसी गतिविधि में लोक महत्व का तत्व होने मात्र से ही किसी निजी निकाय का प्रत्येक दायित्व सार्वजनिक कर्तव्य में नहीं बदल जाता। अदालत ने स्पष्ट किया:

“इस तथ्य में कोई संदेह नहीं है कि शिक्षा का प्रसार अत्यधिक सार्वजनिक महत्व की गतिविधि है, लेकिन केवल यही बात किसी निजी शिक्षण संस्थान के नियोक्ता और कर्मचारी के बीच के हर संबंध को सार्वजनिक कानून का स्वरूप प्रदान नहीं कर देती। सेवा शर्तों को नियंत्रित करने वाले किसी वैधानिक ढांचे के अभाव में, प्रबंधन और शिक्षण कर्मचारियों के बीच का संबंध आम तौर पर संविदात्मक (कॉन्ट्रैक्टुअल) ही रहता है।”

हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि यह सिद्धांत ऐसे मामलों में और भी दृढ़ता से लागू होता है जहां संस्थान एक निजी ट्रस्ट है, निजी व्यक्तियों द्वारा संचालित होता है, सरकार से कोई सहायता नहीं लेता और जहां कर्मचारियों की सेवा शर्तें किसी वैधानिक प्रावधान से संचालित नहीं होती हैं। अदालत ने कहा:

“वर्तमान मामले में चुनौती याची की सेवा समाप्ति के आदेश को दी गई है। इसलिए यह विवाद मूल रूप से याची और निजी प्रबंधन के बीच कर्मचारी और नियोक्ता की हैसियत से है। यहां किसी वैधानिक अधिकार का उल्लंघन होना नहीं दर्शाया गया है; और न ही प्रतिवादी-ट्रस्ट के किसी ऐसे वैधानिक कर्तव्य का उल्लंघन साबित हुआ है जिसका संबंध सार्वजनिक कानून से हो। यह शिकायत मुख्य रूप से एक संविदात्मक नियुक्ति की समाप्ति की वैधता और औचित्य से संबंधित है। ऐसा विवाद आवश्यक रूप से निजी कानून (प्राइवेट लॉ) के दायरे में आता है, जब तक कि याची यह स्थापित न कर दे कि यह संबंध किसी वैधानिक प्रावधान द्वारा नियंत्रित है या विवादित कार्रवाई अनिवार्य रूप से किसी सार्वजनिक कर्तव्य के निर्वहन से जुड़ी है।”

किसी संस्था के रिट के दायरे में आने और किसी विशिष्ट दावे की पोषणीयता के बीच के अंतर को स्पष्ट करते हुए अदालत ने कहा:

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“इसलिए अंतर इस बात में है कि क्या कोई निजी निकाय रिट क्षेत्राधिकार के दायरे में आ सकता है और क्या उस निकाय के खिलाफ कोई विशिष्ट दावा पोषणीय है। पहला बिंदु तब उत्पन्न हो सकता है जब निजी संस्था किसी सार्वजनिक कर्तव्य का निर्वहन कर रही हो; जबकि दूसरा बिंदु अनिवार्य रूप से इस बात पर निर्भर करता है कि किस अधिकार का दावा किया गया है और किस दायित्व को लागू कराया जाना है। किसी मामले में कोई निजी संस्थान अनुच्छेद 226 के दायरे में आ सकता है, फिर भी सेवा अनुबंध से उत्पन्न होने वाला कोई विशुद्ध व्यक्तिगत विवाद रिट क्षेत्राधिकार से बाहर ही रहेगा।”

अदालत ने आगे निष्कर्ष देते हुए कहा:

“उपरोक्त सिद्धांतों को वर्तमान मामले के तथ्यों पर लागू करते हुए, इस अदालत का यह सुविचारित मत है कि विवादित सेवा समाप्ति में प्रतिवादी-ट्रस्ट की ओर से लागू कराने योग्य किसी सार्वजनिक कानून दायित्व का प्रकटीकरण नहीं होता है। यह विवाद मूलतः संविदात्मक और निजी स्वरूप का है। इसलिए अनुच्छेद 226 के तहत असाधारण क्षेत्राधिकार का उपयोग किसी निजी सेवा विवाद के निपटारे के लिए सामान्य उपचार के विकल्प के तौर पर नहीं किया जा सकता।”

हाईकोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने माना कि यह विवाद याची और प्रतिवादी संस्थान के बीच पूरी तरह से एक निजी संविदात्मक संबंध से उत्पन्न हुआ है, जिसमें सार्वजनिक कानून का कोई तत्व शामिल नहीं है। इसलिए यह रिट याचिका सुनवाई योग्य नहीं है। अदालत ने याचिका को केवल पोषणीयता के आधार पर खारिज कर दिया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: नूतन राय बनाम भारत संघ व 2 अन्य
वाद संख्या: रिट – ए संख्या 10421 वर्ष 2026
पीठ: जस्टिस मंजू रानी चौहान
निर्णय की तिथि: 23 सितंबर 2026

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