बैनामा निरस्त होने के बावजूद कानून की उचित प्रक्रिया के बिना स्थापित कब्जे से जबरन बेदखल नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

स्थापित कब्जे (settled possession) की सुरक्षा और कानून के शासन पर महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी संपत्ति का पंजीकृत बैनामा (सेल डीड) सिविल कोर्ट द्वारा निरस्त भी कर दिया गया हो, तब भी वास्तविक मालिक कानून की उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना लंबे समय से काबिज व्यक्ति को बलपूर्वक बेदखल नहीं कर सकता। सिविल जज (सीनियर डिवीजन), रायबरेली के आदेश को दरकिनार करते हुए जस्टिस प्रशांत कुमार की एकल पीठ ने प्रथम अपील आदेश (एफएएफओ) स्वीकार कर लिया और एक विधवा व उनकी नाबालिग बेटी को उनके आवासीय मकान से नियमित वाद के निस्तारण तक बेदखली से सुरक्षा प्रदान करते हुए अस्थायी निषेधाज्ञा (temporary injunction) जारी की।

हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि बैनामा निरस्त करने और आगे निर्माण रोकने की डिक्री मात्र से डिक्री-धारक को यह अधिकार नहीं मिल जाता कि वह सक्षम न्यायालय से बेदखली या कब्जा दिलाने का स्पष्ट आदेश प्राप्त किए बिना काबिज पक्ष को जबरन हटा दे।

मामले की पृष्ठभूमि

विवाद की शुरुआत 2 जून 1987 को हुई, जब आगस्टीन पॉल नामक व्यक्ति के पक्ष में विवादित संपत्ति को बेचने का अधिकार देते हुए एक पंजीकृत पावर ऑफ अटॉर्नी निष्पादित की गई। 18 सितंबर 1987 को इस पावर ऑफ अटॉर्नी को निरस्त करने की बात कही गई। हालांकि, पावर ऑफ अटॉर्नी के निरस्तीकरण का पंजीकरण होने से पहले ही, आगस्टीन पॉल ने 22 सितंबर 1987 को अपीलकर्ता संख्या 1 रेखा सक्सेना की सास (स्वर्गीय सावित्री श्रीवास्तव) के पक्ष में पंजीकृत बैनामा निष्पादित कर दिया। पावर ऑफ अटॉर्नी के निरस्तीकरण का विलेख बाद में 29 सितंबर 1987 को पंजीकृत हुआ। इसके बाद उक्त भूमि पर आवासीय मकान का निर्माण कराया गया, जिसमें अपीलकर्ता लगातार निवास करते रहे।

वर्ष 1991 में, रोमन कैथोलिक डायोसीज ऑफ इलाहाबाद प्राइवेट लिमिटेड ने सिविल जज, रायबरेली के समक्ष मूल वाद संख्या 100/1991 दायर कर 1987 के बैनामे को इस आधार पर निरस्त करने की मांग की कि पावर ऑफ अटॉर्नी पहले ही रद्द की जा चुकी थी। बाद में वाद में संशोधन कर निर्माण हटाने और कब्जा सौंपने की राहत भी मांगी गई। 21 अप्रैल 2001 को निचली अदालत ने एकपक्षीय निर्णय पारित करते हुए 22 सितंबर 1987 के बैनामे को निरस्त कर दिया और प्रतिवादी को विवादित प्लॉट पर आगे निर्माण करने से स्थायी रूप से रोक दिया। हालांकि, अदालत ने कब्जा सौंपने या बेदखली की कोई राहत प्रदान नहीं की।

इस एकपक्षीय निर्णय की डिक्री करीब 22 साल की देरी के बाद, 7 अप्रैल 2023 को तैयार की गई। इस डिक्री के आधार पर विपक्षियों ने निष्पादन कार्यवाही शुरू की और जिला प्रशासन के माध्यम से अपीलकर्ताओं को बेदखल कराने का प्रयास किया।

बेदखली के गंभीर खतरे को देखते हुए, रेखा सक्सेना और उनकी नाबालिग बेटी ने अपने कब्जे की सुरक्षा के लिए सिविल जज (सीनियर डिवीजन), रायबरेली के समक्ष नियमित वाद संख्या 238/2023 दायर किया। साथ ही, सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के आदेश 39 नियम 1 और 2 के तहत अस्थायी निषेधाज्ञा का प्रार्थना पत्र भी दिया। 3 जुलाई 2025 को निचली अदालत ने यह कहते हुए प्रार्थना पत्र खारिज कर दिया कि चूंकि अपीलकर्ताओं का बैनामा निरस्त हो चुका है, इसलिए उनका कोई प्रथम दृष्टया मामला (prima facie case) नहीं बनता। इस आदेश के खिलाफ अपीलकर्ताओं ने हाईकोर्ट का रुख किया।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं के अधिवक्ता श्रीधर अवस्थी ने दलील दी कि अपीलकर्ता और उनके पूर्वज 1987 से विवादित संपत्ति पर लगातार, शांतिपूर्ण और स्थापित कब्जे में हैं। उन्होंने कहा कि जिस दिन बैनामा निष्पादित हुआ, उस समय पावर ऑफ अटॉर्नी के निरस्तीकरण का कोई पंजीकृत दस्तावेज प्रभावी नहीं था। इसके अलावा, निचली अदालत ने 2001 के फैसले में केवल बैनामा निरस्त करने और आगे निर्माण रोकने की राहत दी थी, कब्जा दिलाने या ध्वस्तीकरण की कोई डिक्री नहीं दी थी।

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अपीलकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि निचली अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के नजीरों (जैसे दलपत कुमार बनाम प्रह्लाद सिंह और काशी मठ संस्थान बनाम श्रीमद सुधींद्र तीर्थ स्वामी) में ऐसी पंक्तियों का उल्लेख किया जो मूल निर्णयों में मौजूद ही नहीं हैं। रामे गौड़ा बनाम एम. वरदप्पा नायडू, दलपत कुमार और श्रुति माधव शर्मा बनाम सुमेर सिंह का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि निषेधाज्ञा के मामले में प्रथम दृष्टया मामला किसी अकाट्य मालिकाना हक से नहीं, बल्कि विचारणीय विवाद और स्थापित भौतिक कब्जे से तय होता है।

दूसरी ओर, विपक्षियों के वरिष्ठ अधिवक्ता अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने अपील का विरोध करते हुए कहा कि पंजीकरण अधिनियम, 1908 की धारा 47 के तहत पंजीकृत दस्तावेज अपने निष्पादन की तिथि से प्रभावी होता है, न कि पंजीकरण की तिथि से। सुप्रीम कोर्ट के कर्नाटक राज्य बनाम रागिनी नारायण फैसले का उल्लेख करते हुए उन्होंने तर्क दिया कि चूंकि पावर ऑफ अटॉर्नी 18 सितंबर 1987 को रद्द कर दी गई थी, इसलिए 29 सितंबर को हुआ पंजीकरण पूर्व प्रभावी होकर उसी दिन से लागू माना जाएगा। लिहाजा, 22 सितंबर 1987 को एजेंट के पास बैनामा करने का कोई अधिकार नहीं था।

उन्होंने आगे कहा कि सक्षम सिविल कोर्ट द्वारा 2001 में ही बैनामा निरस्त किए जाने के बाद अपीलकर्ताओं के पक्ष में कोई स्वत्व या प्रथम दृष्टया मामला शेष नहीं रह जाता। इसके प्रत्युत्तर में अपीलकर्ताओं ने बताया कि विपक्षियों ने स्वयं अपनी जवाबी हलफनामे के पैरा 37 और 38 में स्वीकार किया है कि विवादित परिसर में अपीलकर्ता काबिज हैं और उन्हें हटाने के लिए जिलाधिकारी के समक्ष प्रार्थना पत्र दिया गया था।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

जस्टिस प्रशांत कुमार ने सीपीसी की धारा 94(सी) और आदेश 39 नियम 1 व 2 के प्रावधानों का विश्लेषण करते हुए रेखांकित किया कि अंतरिम निषेधाज्ञा का मूल उद्देश्य संपत्ति की स्थिति को सुरक्षित रखना होता है ताकि अंतिम निर्णय आने तक मुकदमा निष्फल न हो जाए। हाउस ऑफ लॉर्ड्स के ऐतिहासिक मामले अमेरिकन सायनामिड कंपनी बनाम एथिकॉन लिमिटेड और सुप्रीम कोर्ट के वांडर लिमिटेड बनाम एंटॉक्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, सीमा अरशद जहीर बनाम म्युनिसिपल कॉरपोरेशन ऑफ ग्रेटर मुंबई तथा ज़ेनिट मेटाप्लास्ट प्राइवेट लिमिटेड बनाम महाराष्ट्र राज्य के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने दोहराया कि अंतरिम राहत विवाद की विषय-वस्तु को संरक्षित करने का माध्यम है।

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प्रथम दृष्टया मामले और मालिकाना हक के बीच के अंतर को स्पष्ट करते हुए कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के दलपत कुमार बनाम प्रह्लाद सिंह निर्णय का उल्लेख किया:

“प्रथम दृष्टया मामले (प्राइमा फेसी केस) को प्रथम दृष्टया स्वत्व (टाइटिल) समझने की भूल नहीं की जानी चाहिए, जिसे मुकदमे के विचारण के दौरान साक्ष्यों के आधार पर साबित किया जाना होता है। प्रथम दृष्टया मामला केवल सद्भावपूर्वक उठाया गया एक सारभूत प्रश्न है, जिसके लिए जांच और गुण-दोष के आधार पर निर्णय की आवश्यकता होती है।”

आदेश 43 नियम 1(आर) के तहत अपीलीय क्षेत्राधिकार की सीमाओं पर चर्चा करते हुए कोर्ट ने प्रिंटर्स (मैसूर) (प्रा.) लिमिटेड बनाम पोथन जोसेफ, नियॉन लैबोरेटरीज लिमिटेड बनाम मेडिकल टेक्नोलॉजीज लिमिटेड, मोहम्मद मेहताब खान बनाम खुशनुमा इब्राहिम खान, श्याम सेल एंड पावर लिमिटेड बनाम श्याम स्टील इंडस्ट्रीज लिमिटेड, मोनसेंटो टेक्नोलॉजी एलएलसी बनाम नुजीविदु सीड्स लिमिटेड और रमाकांत अंबालाल चोकसी बनाम हरीश अंबालाल चोकसी के निर्णयों का संदर्भ दिया। कोर्ट ने कहा कि यदि अधीनस्थ अदालत ने कानूनी सिद्धांतों की अनदेखी कर मनमाने, अतार्किक या विकृत तरीके से अपने विवेकाधिकार का प्रयोग किया है, तो अपीलीय अदालत का हस्तक्षेप पूरी तरह उचित है।

कानूनी लैटिन सूक्ति “पॉसेसियो कॉन्ट्रा ऑम्नेस वैलेट प्रेटर इम कुई युस सित पॉसेसिओनिस” (सच्चे कानूनी हकदार को छोड़कर कब्जा हर किसी के खिलाफ मान्य है) का संदर्भ देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय कानून में वास्तविक मालिक भी स्थापित कब्जे वाले व्यक्ति को ताकत के बल पर बेदखल नहीं कर सकता।

मुंशी राम बनाम दिल्ली प्रशासन, पूरन सिंह बनाम पंजाब राज्य, राम रतन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और रामे गौड़ा बनाम एम. वरदप्पा नायडू के नजीरों को दोहराते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:

“इस प्रकार, इस न्यायालय को यह मानने में कोई हिचकिचाहट नहीं है कि भले ही कोई व्यक्ति लंबे समय से काबिज हो और उस पर अनधिकृत कब्जाधारी (अतिचारी) होने का आरोप हो, फिर भी कानून की संप्रभुता और गरिमा को बाहुबल या जबरन ताकत से प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता। उसकी बेदखली के लिए कानून की उचित प्रक्रिया का पालन किया जाना अनिवार्य है; वास्तविक मालिक का मालिकाना हक चाहे कितना भी मजबूत हो या उसका दावा कितना भी न्यायसंगत क्यों न हो, उसे कानून का सहारा लेना ही होगा और वह कानून को अपने हाथ में नहीं ले सकता। कब्जे में हस्तक्षेप केवल कानून द्वारा स्वीकृत उचित प्रक्रिया, यानी सक्षम न्यायालय के बेदखली या निष्कासन के किसी आदेश अथवा निर्देश के जरिए ही किया जा सकता है।”

सुप्रीम कोर्ट के समीर शोभन सान्याल बनाम ट्रैक्स ट्रेड (प्रा.) लिमिटेड मामले का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा:

“अपीलकर्ता को विवादित संपत्ति से बेदखल करने के उनके गैर-कानूनी आचरण की अनदेखी कर न्यायालय केवल यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश नहीं दे सकता। यदि न्यायालय ऐसी मनमानी और जोर-जबरदस्ती की कार्रवाई को स्वीकार कर लेता है, तो कानून के शासन के प्रति कोई सम्मान नहीं बचेगा; अराजक तत्व कानून की उचित प्रक्रिया को बंधक बना लेंगे और यह अराजकता का खुला खेल बन जाएगा। कानून का पालन करने वाले नागरिकों की नजरों में विधि सम्मत प्रक्रिया उपहास का पात्र बनकर रह जाएगी और कानून का शासन केवल कागजों तक ही सीमित होकर दम तोड़ देगा।”

इन विधिक सिद्धांतों को वर्तमान मामले पर लागू करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि वर्ष 2001 की एकपक्षीय डिक्री केवल बैनामा निरस्त करने और आगे निर्माण रोकने तक सीमित थी; उसमें बेदखली का कोई आदेश नहीं था। ऐसे में विपक्षी उस डिक्री की आड़ में बलपूर्वक कब्जा नहीं ले सकते।

अस्थायी निषेधाज्ञा की तीनों आवश्यक कसौटियों का मूल्यांकन करते हुए कोर्ट ने माना:

  1. प्रथम दृष्टया मामला (Prima Facie Case): अपीलकर्ताओं का 1987 से अनवरत, शांतिपूर्ण और स्थापित कब्जा रहा है, जिसकी पुष्टि स्वयं विपक्षियों के बयानों से भी होती है।
  2. सुविधा का संतुलन और अपूरणीय क्षति (Balance of Convenience & Irreparable Injury): अपीलकर्ता संख्या 1 एक विधवा हैं और अपीलकर्ता संख्या 2 उनकी नाबालिग बेटी हैं, जो पिछले तीन दशकों से अधिक समय से इस आवासीय परिसर में रह रही हैं। यदि वाद के लंबित रहने के दौरान उन्हें जबरन निकाला गया, तो उन्हें ऐसी अपूरणीय क्षति होगी जिसकी भरपाई पैसों से नहीं की जा सकती।
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हाईकोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए निचली अदालत के 3 जुलाई 2025 के आदेश को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने नियमित वाद संख्या 238/2023 के अंतिम निस्तारण तक अपीलकर्ताओं के शांतिपूर्ण कब्जे में किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप पर रोक लगाते हुए उनके पक्ष में अस्थायी निषेधाज्ञा जारी की।

अदालत ने स्पष्ट किया कि ये निष्कर्ष केवल अंतरिम निषेधाज्ञा तय करने की सीमा तक ही सीमित हैं और इन्हें मुख्य वाद के गुण-दोष या पावर ऑफ अटॉर्नी की वैधता पर अदालत की राय न माना जाए। निचली अदालत को साक्ष्यों के आधार पर स्वतंत्र रूप से मूल वाद का निस्तारण करने का निर्देश दिया गया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: रेखा सक्सेना व अन्य बनाम रोमन कैथोलिक डायोसीज, इलाहाबाद प्राइवेट लिमिटेड व अन्य
वाद संख्या: प्रथम अपील आदेश संख्या 354/2025
पीठ: जस्टिस प्रशांत कुमार
निर्णय की तिथि: 23 सितंबर, 2026

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