वैध बोर्डिंग पास होने के बाद भी एक महिला यात्री को उड़ान भरने से रोकना निजी एयरलाइन को भारी पड़ गया। रायपुर जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने इसे सेवा में गंभीर कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार करार देते हुए संबंधित एयरलाइन को पीड़िता को 35 हजार रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया है। आयोग ने स्पष्ट किया कि जब यात्री निर्धारित समय पर एयरपोर्ट पहुंचकर बोर्डिंग पास ले चुकी थी, तब उसके बोर्डिंग गेट तक न पहुंचने का कोई वाजिब कारण नजर नहीं आता।
आयोग के अध्यक्ष दाकेश्वर प्रसाद शर्मा तथा सदस्य निरुपमा प्रधान और अनिल कुमार अग्निहोत्री की पीठ ने 21 सितंबर को यह फैसला सुनाया। पीठ ने एयरलाइन को निर्देश दिया कि वह मानसिक व आर्थिक प्रताड़ना के एवज में महिला को 25,000 रुपये का हर्जाना और 10,000 रुपये कानूनी खर्च के रूप में अदा करे।
गेट पर सूचना देने के दावों को आयोग ने नकारा
सुनवाई के दौरान एयरलाइन ने अपना बचाव करते हुए दलील दी थी कि यात्री तय समय सीमा के भीतर बोर्डिंग गेट पर उपस्थित नहीं हुई। एयरलाइन के रिकॉर्ड के अनुसार, महिला ने दोपहर 2:42 बजे अपना बोर्डिंग पास लिया था, लेकिन वह 3:45 बजे तब गेट पर पहुंची जब विमान उड़ान भर चुका था। एयरलाइन ने इसी आधार पर उसे ‘नो-शो’ (अनुपस्थित) दर्ज किया और दावा किया कि यात्री को गेट पर आने के लिए कई बार सूचित किया गया था।
उपभोक्ता आयोग ने एयरलाइन के इस तर्क को खारिज कर दिया। आयोग ने पाया कि एयरलाइन द्वारा पेश दस्तावेजों में इस बात का कोई ब्योरा नहीं है कि यात्री को किस माध्यम या तरीके से सूचित किया गया था। रिकॉर्ड में न तो महिला का फोन नंबर दर्ज था और न ही इस बात का कोई प्रमाण मिला कि बोर्डिंग गेट पर बुलाने के लिए उसके नंबर पर कोई कॉल की गई थी। आयोग ने रेखांकित किया कि एयरलाइन यह साबित करने में पूरी तरह नाकाम रही कि उसने यात्री को गेट तक पहुंचने की समुचित जानकारी दी थी।
बेंगलुरु से रायपुर यात्रा के दौरान हुई थी घटना
यह मामला 30 अगस्त 2015 का है। पीड़िता ने एक ऑनलाइन ट्रेवल पोर्टल के माध्यम से 5,929 रुपये का भुगतान कर बेंगलुरु से रायपुर की फ्लाइट बुक की थी। वह तय समय से काफी पहले दोपहर करीब 1:30 बजे बेंगलुरु एयरपोर्ट पहुंच गई थीं।
चेक-इन के बाद उन्हें वैध बोर्डिंग पास जारी किया गया और वह शाम करीब 4:00 बजे तक एयरपोर्ट परिसर में मौजूद रहीं, फिर भी उन्हें विमान में बैठने नहीं दिया गया। पीड़िता का आरोप था कि एयरलाइन कर्मियों ने उनके साथ अनुचित व्यवहार किया और उन्हें रायपुर पहुंचाने के लिए किसी वैकल्पिक उड़ान का प्रबंध भी नहीं किया। इसके चलते वह एक अहम व्यावसायिक बैठक में हिस्सा नहीं ले सकीं। इसके बाद उन्होंने मानसिक व आर्थिक क्षतिपूर्ति के लिए 1 लाख रुपये के मुआवजे की मांग करते हुए उपभोक्ता आयोग की शरण ली थी।
बुकिंग पोर्टल और एयरपोर्ट प्रबंधन को मिली राहत
उपभोक्ता आयोग ने इस मामले में ऑनलाइन टिकट बुकिंग पोर्टल और एयरपोर्ट टर्मिनल मैनेजर को किसी भी तरह की देनदारी से मुक्त कर दिया। बुकिंग पोर्टल का कहना था कि उसकी भूमिका केवल ई-टिकट जारी कराने तक सीमित थी और इसके बाद एयरपोर्ट पर यात्री व एयरलाइन के बीच की प्रक्रियाओं पर उसका कोई नियंत्रण नहीं था। आयोग ने माना कि यात्री को बोर्डिंग से रोकने के फैसले में पोर्टल या एयरपोर्ट प्रबंधन की कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं थी, इसलिए सारा दायित्व एयरलाइन का बनता है।

