इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आरोपियों को केवल 30 दिनों के लिए अग्रिम जमानत देने के एक आदेश पर कड़ा रुख अपनाते हुए आजमगढ़ की अदालत से जवाब-तलब किया है। हाईकोर्ट ने संबंधित न्यायिक अधिकारी से पूछा है कि उन्होंने किन विशेष परिस्थितियों में राहत की अवधि महज एक महीने तय की। इसके साथ ही पीठ ने यह ब्योरा भी तलब किया है कि संबंधित जज ने अब तक ऐसे कितने मामलों में 20, 30 या 40 दिनों की सीमित मियाद के लिए अग्रिम जमानत मंजूर की है।
आरोपियों के अनावश्यक उत्पीड़न पर जताई चिंता
न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह की पीठ ने इस तरह के आदेशों के औचित्य पर सवाल उठाते हुए कहा कि राहत की सीमित अवधि तय करने से आरोपियों का अनावश्यक उत्पीड़न होता है। अदालत ने पूछा कि 30 दिन की समयसीमा समाप्त होने के बाद आरोपियों से क्या कदम उठाने की उम्मीद की जाती है—क्या उन्हें फिर से ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण कर नई अग्रिम जमानत याचिका दाखिल करनी होगी?
हाईकोर्ट ने कानूनी स्थिति स्पष्ट करते हुए रेखांकित किया कि अदालत के पास दो ही विकल्प होते हैं: या तो वह अपराध की गंभीरता को देखते हुए अग्रिम जमानत अर्जी खारिज कर दे, या फिर जरूरी शर्तें तय करते हुए मुकदमे की सुनवाई पूरी होने तक के लिए सुरक्षा प्रदान करे। बीच का रास्ता निकालकर कुछ दिनों की राहत देना मुकदमेबाजी को बेवजह बढ़ाता है।
आजमगढ़ की अदालत के फैसले को दी गई थी चुनौती
यह निर्देश सुरेश यादव और दो अन्य व्यक्तियों की याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। याचिकाकर्ताओं ने आजमगढ़ के अपर सत्र न्यायाधीश (कोर्ट संख्या 1) द्वारा 23 दिसंबर 2025 को पारित आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पक्ष रखते हुए कहा गया कि राहत पर समयसीमा तय करने का कोई औचित्य नहीं था, क्योंकि जांच प्रक्रिया के दौरान या चार्जशीट दाखिल होने तक पुलिस ने उन्हें कभी गिरफ्तार नहीं किया था।
हाईकोर्ट ने पाया कि मामले में चार्जशीट पहले ही दाखिल हो चुकी है और निचली अदालत अपराध पर संज्ञान भी ले चुकी है। इसके अलावा, जिन धाराओं में मामला दर्ज है, उनमें अधिकतम सजा भी सात साल से कम है। इसके बावजूद, अधीनस्थ अदालत के आदेश में ऐसा कोई ठोस निष्कर्ष या कारण दर्ज नहीं था जिससे यह स्पष्ट हो सके कि अग्रिम जमानत की अवधि केवल 30 दिनों तक क्यों सीमित रखी गई।
हाईकोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 30 सितंबर की तारीख निर्धारित की है।

