सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी सिविल मुकदमे में सभी मुद्दों पर ट्रायल शुरू हो जाने के बाद अदालत Order XIV Rule 2(2) CPC का इस्तेमाल कर किसी एक मुद्दे को अलग करके प्रारंभिक मुद्दे के रूप में पहले तय नहीं कर सकती। जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पल्ली की बेंच ने कहा कि सभी मुद्दों का पहले से तय हो जाना अपने आप में इस शक्ति को समाप्त नहीं करता, लेकिन जैसे ही अदालत सभी मुद्दों पर संयुक्त ट्रायल शुरू कर देती है, किसी एक मुद्दे को बाद में “पहले ट्रायल” के लिए अलग करने की शक्ति समाप्त हो जाती है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस आधार पर ट्रायल कोर्ट, प्रथम अपीलीय अदालत और केरल हाईकोर्ट के फैसलों को रद्द कर दिया और 2013 में दायर संपत्ति विवाद से जुड़े मुकदमे को मुनसिफ कोर्ट, कोट्टारकारा के समक्ष बहाल कर दिया।
क्या था मामला
विवाद एक संपत्ति की बिक्री से जुड़ा था। टी. ओमन पनिकर ने वर्ष 2013 में मुकदमा दायर कर 25 मई 2005 की सेल डीड को शून्य घोषित करने, संपत्ति पर अपना अधिकार घोषित करने और कब्जा वापस दिलाने की मांग की थी।
पनिकर ने 21 मई 2005 को बीजू जॉन के पक्ष में General Power of Attorney दिया था। उनका मामला था कि GPA के तहत बीजू जॉन को कृषि भूमि का प्रबंधन करने और कुछ परिस्थितियों में आवश्यक दस्तावेज निष्पादित करने का अधिकार दिया गया था, लेकिन उसे स्वतंत्र रूप से बिक्री की शर्तें तय करने और संपत्ति बेचने की शक्ति नहीं दी गई थी।
वादी का आरोप था कि इसके बावजूद संपत्ति जॉन मैथ्यू के पक्ष में 25 मई 2005 की सेल डीड के जरिए बेच दी गई। उन्होंने दावा किया कि यह बिक्री उनकी सहमति के बिना की गई और उन्हें कोई बिक्री रकम भी नहीं मिली।
प्रतिवादियों ने इन आरोपों से इनकार किया। उनका कहना था कि संपत्ति ₹4 लाख के प्रतिफल पर वादी की पूरी जानकारी और सहमति से बेची गई थी और GPA के तहत बिक्री करने का पर्याप्त अधिकार मौजूद था।
प्रतिवादियों ने यह भी कहा कि मुकदमा limitation से बाधित था।
ट्रायल कोर्ट ने 8 जुलाई 2015 को सभी मुद्दे तय कर दिए थे। इनमें यह मुद्दा भी शामिल था कि क्या मुकदमा limitation से बाधित है। इसके बाद मुकदमा साक्ष्य के चरण में चला गया।
वादी अपना पूरा साक्ष्य पेश कर चुका था। प्रतिवादियों ने भी अपना साक्ष्य देना शुरू कर दिया था और उनकी ओर से evidence-in-chief पेश किया जा चुका था। इसी चरण में वर्ष 2018 में limitation के मुद्दे को प्रारंभिक मुद्दे के रूप में पहले तय करने के लिए आवेदन दिया गया।
ट्रायल कोर्ट ने आवेदन स्वीकार करते हुए Limitation Act के Article 59 को लागू किया और मुकदमे को समय-सीमा से बाहर मानते हुए खारिज कर दिया।
प्रथम अपीलीय अदालत ने limitation संबंधी निष्कर्ष को बरकरार रखा, लेकिन आदेश को संशोधित करते हुए plaint को Order VII Rule 11(d) CPC के तहत reject कर दिया।
इसके बाद केरल हाईकोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने limitation के मुद्दे को प्रारंभिक मुद्दे के रूप में तय कर गलती की। हालांकि हाईकोर्ट ने आगे यह भी निष्कर्ष निकाला कि मामले में Limitation Act का Article 65 लागू होगा और मुकदमा limitation के भीतर था।
सुप्रीम कोर्ट में क्या दलीलें दी गईं
जॉन मैथ्यू की ओर से सीनियर एडवोकेट वी. चितंबरश ने दलील दी कि GPA में बिक्री समझौते और सेल डीड निष्पादित करने का स्पष्ट अधिकार दिया गया था।
उनका कहना था कि सेल डीड को शून्य बताने का दावा टिकाऊ नहीं था और वास्तव में मुकदमे का मुख्य उद्देश्य सेल डीड को निरस्त कराना था। इसलिए Limitation Act का Article 59 लागू होगा।
उन्होंने कहा कि वादी ने खुद 22 मई 2009 को सेल डीड की जानकारी होने की बात कही थी, जबकि मुकदमा 10 जून 2013 को दायर किया गया। इसलिए यह तीन वर्ष की limitation अवधि से बाहर था।
दूसरी ओर, वादी के कानूनी उत्तराधिकारियों की ओर से सीनियर एडवोकेट वी. गिरी ने GPA के तहत दिए गए अधिकार की सीमा को विवादित बताया।
उनका कहना था कि वादी ने स्पष्ट रूप से आरोप लगाया था कि बिक्री उसकी सहमति के बिना हुई, उसे कोई बिक्री रकम नहीं मिली और GPA धारक को स्वतंत्र रूप से बिक्री की शर्तें तय करने का अधिकार नहीं था।
उन्होंने दलील दी कि Article 59 या Article 65 में से कौन-सा प्रावधान लागू होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि सेल डीड आखिरकार void पाई जाती है या voidable।
Order XIV Rule 2 कब लागू हो सकता है
सुप्रीम कोर्ट ने Order XIV Rule 2 की योजना का विस्तार से विश्लेषण किया और कहा कि किसी मुद्दे को पहले तय करने के लिए तीन शर्तें पूरी होनी चाहिए।
पहली, वह केवल कानून का मुद्दा होना चाहिए। दूसरी, उसका संबंध अदालत के jurisdiction या कानून द्वारा बनाए गए किसी statutory bar से होना चाहिए। तीसरी, अदालत की राय में उसी मुद्दे के आधार पर मुकदमे या उसके किसी हिस्से का निपटारा संभव होना चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि इन शर्तों के पूरा होने के बावजूद शक्ति विवेकाधीन है क्योंकि प्रावधान में “may try that issue first” शब्दों का इस्तेमाल किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने Ramesh B. Desai v. Bipin Vadilal Mehta और Major S.S. Khanna v. Brig. F.J. Dillon का उल्लेख करते हुए दोहराया कि तथ्य और कानून के मिश्रित प्रश्न को प्रारंभिक मुद्दे के रूप में तय नहीं किया जा सकता, यदि उसका फैसला विवादित तथ्यों के निर्धारण पर निर्भर करता हो।
Nusli Neville Wadia v. Ivory Properties का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने यह भी कहा कि CPC दो अलग-अलग पूर्ण ट्रायल की कल्पना नहीं करता, एक preliminary issue के लिए और दूसरा बाकी मुद्दों के लिए।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि limitation किसी मामले में केवल कानून का प्रश्न हो सकता है और किसी दूसरे मामले में कानून और तथ्य का मिश्रित प्रश्न। निर्णायक बात यह है कि क्या विवादित तथ्यों पर निर्णय किए बिना कानूनी मुद्दे का फैसला किया जा सकता है।
सभी मुद्दे तय हो जाने से ही Order XIV Rule 2 की शक्ति खत्म नहीं होती
सुप्रीम कोर्ट ने किसी issue को frame करने और उस पर trial करने के बीच स्पष्ट अंतर किया।
कोर्ट ने कहा कि Order XIV Rule 2(2) लागू करने के लिए यह जरूरी नहीं है कि बाकी सभी मुद्दे अभी तक तय ही न किए गए हों।
अदालत सभी मुद्दे तय करने के बाद भी किसी योग्य कानूनी मुद्दे को पहले ट्रायल के लिए चुन सकती है। यहां तक कि मुकदमा evidence के लिए सूचीबद्ध हो चुका हो, तब भी यह शक्ति उपलब्ध रह सकती है, बशर्ते सामान्य रूप से सभी मुद्दों पर ट्रायल वास्तव में शुरू न हुआ हो।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“निर्णायक सीमा यह नहीं है कि सभी मुद्दे तय किए जा चुके हैं या नहीं, बल्कि यह है कि सामान्य रूप से उन मुद्दों पर ट्रायल शुरू हो चुका है या नहीं। सभी मुद्दों का तय हो जाना Order XIV Rule 2(2) के तहत विवेकाधिकार को समाप्त नहीं करता, लेकिन उन पर ट्रायल शुरू हो जाना इस शक्ति को समाप्त कर देता है।”
कॉमन ट्रायल शुरू होने के बाद एक मुद्दा अलग नहीं किया जा सकता
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि Order XIV Rule 2 अदालत को ट्रायल का क्रम भविष्य के लिए तय करने की शक्ति देता है। यह पहले से चल रहे संयुक्त ट्रायल को बाद में पुनर्गठित करने का अधिकार नहीं देता।
कोर्ट ने समझाया कि “try that issue first” में “first” शब्द महत्वपूर्ण है। यदि सभी मुद्दे पहले ही एक साथ ट्रायल में आ चुके हैं, तो उनमें से किसी एक को बाद में ऐसा नहीं माना जा सकता कि उसका ट्रायल बाकी मुद्दों से पहले हो रहा है।
इस मामले में जब limitation को preliminary issue बनाने की मांग की गई, तब वादी अपना पूरा साक्ष्य दे चुका था और प्रतिवादी भी साक्ष्य देना शुरू कर चुके थे।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“Rule 2(2) ट्रायल के क्रम को भविष्य के लिए निर्धारित करने की अनुमति देता है। यह अदालत को यह अधिकार नहीं देता कि वह पहले से चल रहे संयुक्त ट्रायल से किसी एक मुद्दे को बाद में अलग करे और उसे ऐसा माने जैसे उसका ट्रायल सबसे पहले हुआ हो।”
कोर्ट ने कहा कि जिस समय 2018 का आवेदन दाखिल किया गया, तब limitation का मुद्दा बाकी मुद्दों के साथ पहले ही ट्रायल का हिस्सा बन चुका था। इसलिए उस समय तक Order XIV Rule 2(2) के तहत उसे “पहले” ट्रायल करने की शक्ति समाप्त हो चुकी थी।
Section 151 CPC का सहारा भी नहीं लिया जा सकता
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आवेदन में Section 151 CPC का उल्लेख करने से स्थिति नहीं बदलती।
कोर्ट ने कहा कि किसी आवेदन को क्या नाम दिया गया है, इससे अदालत की शक्ति का स्रोत, स्वरूप या सीमा तय नहीं होती।
जहां CPC ने किसी मुद्दे को अलग कर पहले ट्रायल करने की प्रक्रिया को Order XIV Rule 2 के तहत स्पष्ट रूप से नियंत्रित किया है, वहां Section 151 की inherent powers का इस्तेमाल उन शर्तों, क्रम या समय-संबंधी सीमाओं को दरकिनार करने के लिए नहीं किया जा सकता।
Prithvi Raj फैसले पर सुप्रीम कोर्ट का स्पष्टीकरण
सुप्रीम कोर्ट ने Himachal Pradesh High Court के Full Bench के Prithvi Raj Jhingta v. Gopal Singh फैसले की भी समीक्षा की।
कोर्ट ने उस फैसले को इस सीमा तक सही माना कि जब सभी मुद्दों पर संयुक्त ट्रायल शुरू हो चुका हो, तब उनमें से किसी एक को बाद में अलग करके पहले तय नहीं किया जा सकता।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने उस व्यापक निष्कर्ष से सहमति नहीं जताई कि Order XIV Rule 2(2) केवल तभी लागू हो सकता है जब शुरुआत में सिर्फ एक कानूनी मुद्दा तय किया गया हो और बाकी मुद्दों को बाद के लिए छोड़ दिया गया हो।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि Rule 2(2) में अन्य मुद्दों को तय करने की प्रक्रिया स्थगित करना अनिवार्य नहीं, बल्कि वैकल्पिक है।
Sathyanath फैसले का भी दायरा स्पष्ट किया
सुप्रीम कोर्ट ने Sathyanath v. Sarojamani के अपने पूर्व फैसले पर भी स्पष्टीकरण दिया।
उस मामले में res judicata के मुद्दे को preliminary issue के रूप में तय करने का सवाल था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वहां res judicata का प्रश्न तथ्य और कानून का मिश्रित प्रश्न था और इसलिए वह Order XIV Rule 2(2) की शर्तों को पूरा नहीं करता था।
मौजूदा फैसले में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि Sathyanath सामान्य नियम को दोहराता है, लेकिन Order XIV Rule 2(2) में मौजूद अपवाद को खत्म नहीं करता।
हाईकोर्ट को limitation के merits पर फैसला नहीं करना चाहिए था
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केरल हाईकोर्ट ने यह सही पाया था कि limitation के मुद्दे को उस चरण में preliminary issue के रूप में तय नहीं किया जा सकता था।
लेकिन कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट को इसके बाद यह तय नहीं करना चाहिए था कि Article 59 लागू होगा या Article 65।
जब यह तय हो गया कि limitation का मुद्दा बाकी मुद्दों से अलग कर प्रारंभिक रूप से नहीं निपटाया जा सकता, तब उचित रास्ता यही था कि उसे बाकी मुद्दों के साथ सामान्य ट्रायल में तय होने दिया जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने इसलिए यह सवाल खुला छोड़ दिया कि Limitation Act का कौन-सा Article लागू होगा, विवादित सेल डीड की कानूनी प्रकृति क्या होगी और limitation के मुद्दे पर अंतिम निष्कर्ष क्या निकलेगा।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इन प्रश्नों पर हाईकोर्ट की टिप्पणियां आगे की कार्यवाही को प्रभावित नहीं करेंगी।
सभी तीन अदालतों के फैसले रद्द, मुकदमा बहाल
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट, प्रथम अपीलीय अदालत और केरल हाईकोर्ट के फैसलों को अस्थिर बताते हुए रद्द कर दिया।
वर्ष 2018 में limitation को preliminary issue के रूप में तय करने के लिए दाखिल आवेदन को भी खारिज कर दिया गया।
O.S. No. 337 of 2013 को मुनसिफ कोर्ट, कोट्टारकारा के समक्ष बहाल करते हुए ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया गया कि वह उसी चरण से आगे की कार्यवाही शुरू करे, जहां 2018 के आवेदन के कारण सामान्य ट्रायल बाधित हुआ था।
कोर्ट ने कहा कि यह मामला उसी समस्या का उदाहरण है, जिसे procedural law रोकना चाहता है। मुकदमा 2013 में दायर हुआ था, सभी मुद्दे 2015 में तय हो गए थे, लेकिन एक preliminary issue के कारण मामला एक दशक से अधिक समय बाद फिर merits पर फैसले के लिए ट्रायल कोर्ट वापस पहुंचा।
इस पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट से judgment की प्रति मिलने के तीन महीने के भीतर मुकदमे का फैसला करने का अनुरोध किया।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि उसके फैसले को किसी भी पक्ष के मामले के merits पर राय नहीं माना जाएगा और ट्रायल कोर्ट को विवाद का फैसला स्वतंत्र रूप से कानून के अनुसार करना होगा।
Case Title: John Mathew v. Santha Paul & Ors.
Case No.: Civil Appeal arising out of SLP (C) No. 34086 of 2025
Bench: Justice K.V. Viswanathan and Justice Arun Palli
Date: September 21, 2026

