तेलंगाना के उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक आयुर्वेदिक अस्पताल को निर्देश दिया है कि वह दिवंगत कैंसर मरीज के बुजुर्ग माता-पिता को 63,000 रुपये का भुगतान करे। मरीज की मौत के कारण जो दवाएं और थेरेपी सत्र इस्तेमाल में नहीं आ सके, उनकी फीस वापस न करने पर आयोग ने कड़ा रुख अपनाया। पीठ ने अस्पताल के इस रवैये को गैर-वाजिब मुनाफाखोरी (अनजस्ट एनरिचमेंट) और अनुचित व्यापार व्यवहार (अनफेयर ट्रेड प्रैक्टिस) करार दिया।
आयोग की अध्यक्ष बी. उमा वेंकट सुब्बा लक्ष्मी तथा सदस्य सी. लक्ष्मी प्रसन्ना और बी. राजी रेड्डी की पीठ ने 7 सितंबर को पारित अपने आदेश में कहा कि मरीज की मौत जैसी दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थिति के बावजूद अस्पताल ने रकम रोकने का कोई कानूनी, वैधानिक या संविदात्मक आधार पेश नहीं किया। आयोग ने अस्पताल को निर्देश दिया कि वह अप्रयुक्त दवाओं और न दिए गए थेरेपी सत्रों के एवज में 53,000 रुपये लौटाए, बशर्ते परिवार दवाएं वापस कर दे। इसके साथ ही मानसिक प्रताड़ना और कानूनी खर्च के रूप में 10,000 रुपये का अतिरिक्त मुआवजा देने का भी आदेश दिया गया।
इलाज शुरू होने से पहले ही बिगड़ गई थी मरीज की हालत
मामले के अनुसार, 67 वर्षीय पिता और 64 वर्षीय मां ने अपने बेटे के इलाज के लिए अस्पताल से संपर्क किया था। उनका बेटा कोलोरेक्टल कैंसर से जूझ रहा था और उसकी कीमोथेरेपी चल रही थी। राहतकारी देखभाल (पैलिएटिव केयर) और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के पूरक आयुर्वेदिक उपचार के लिए परिजनों ने क्रॉनिक बीमारियों की इम्यूनोथेरेपी का दावा करने वाले इस आयुर्वेदिक अस्पताल का रुख किया था।
परिजनों ने तीन महीने की दवाओं, चिकित्सीय परामर्श और 10 थेरेपी सत्रों के पैकेज के लिए 17 सितंबर को कुल 58,300 रुपये का भुगतान किया। हालांकि, भुगतान के महज दो दिन बाद ही मरीज को गंभीर उल्टी और आंतों में रुकावट (इंटेस्टाइनल ऑब्स्ट्रक्शन) की शिकायत हुई। हालत बिगड़ने पर उसे तुरंत आपातकालीन अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उसकी सर्जरी हुई और 6 अक्टूबर को उसे छुट्टी मिली। परिजनों ने इस आपातकालीन स्थिति और अस्पताल में भर्ती होने की पूरी जानकारी आयुर्वेदिक केंद्र को तुरंत दे दी थी।
दवाएं वापस करने के बाद भी अस्पताल ने साधी चुप्पी
आयुर्वेदिक अस्पताल ने 16 अक्टूबर को दवाएं पहुंचाईं, लेकिन इसके कुछ ही समय बाद मरीज की तबीयत दोबारा बिगड़ गई और उसे फिर अस्पताल ले जाना पड़ा। वहां 24 अक्टूबर को उसका निधन हो गया।
बेटे के देहांत के बाद माता-पिता ने सीलबंद दवाओं का पूरा सेट अस्पताल को लौटा दिया और अप्रयुक्त सेवाओं के पैसे वापस मांगे। परिवार ने कई ईमेल, व्हाट्सएप संदेश और कानूनी नोटिस भेजे, लेकिन अस्पताल ने कोई जवाब नहीं दिया और न ही रकम लौटाई। परेशान होकर बुजुर्ग दंपती ने उपभोक्ता आयोग की शरण ली।
सुनवाई से नदारद रहा अस्पताल प्रशासन
आयोग ने रिकॉर्ड पर दर्ज पत्राचार, व्हाट्सएप संदेशों और कानूनी नोटिस का अवलोकन करने के बाद पाया कि बार-बार अनुरोध के बावजूद अस्पताल ने सेवाओं और दवाओं का शुल्क अपने पास रोके रखा। कार्यवाही के दौरान अस्पताल की ओर से न तो कोई प्रतिनिधि पेश हुआ और न ही बचाव में कोई साक्ष्य प्रस्तुत किया गया।
पीठ ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि यदि किसी मरीज की मृत्यु के कारण चिकित्सा सेवाएं और दवाएं अप्रयुक्त रह जाती हैं, तो सेवा प्रदाता बिना किसी ठोस कानूनी आधार के वह राशि अपने पास नहीं रख सकता। ऐसा करना कानूनन गलत लाभ कमाना और उपभोक्ता अधिकारों का हनन है।

