भोपाल गैस त्रासदी के कचरे से पारा रिसाव की आशंका पर सुप्रीम कोर्ट ने दखल से किया इनकार, याचिकाकर्ताओं को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट जाने को कहा

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस याचिका में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया जिसमें भोपाल गैस त्रासदी से जुड़े कचरे के निस्तारण के बाद पारा (मरकरी) के संभावित रिसाव से जमीन और भूजल के दूषित होने की आशंका जताई गई थी। अदालत ने ‘भोपाल गैस पीड़ित संघर्ष सहयोग समिति’ को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का रुख करने की सलाह दी, जो पिछले तीन दशकों से इस त्रासदी से जुड़े पुनर्वास और अन्य मुद्दों की निगरानी कर रहा है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची की पीठ ने पीड़ितों के संगठन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद ग्रोवर की दलीलें सुनीं। याचिका में कहा गया था कि यूनियन कार्बाइड कॉरपोरेशन के पूर्व कीटनाशक संयंत्र परिसर से निकले कचरे को जलाने के बाद उसका निस्तारण किया गया है, जिससे उसमें मौजूद पारा जमीन और आसपास के जल स्रोतों में रिस सकता है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि इस मामले से जुड़े मुद्दों की निगरानी पहले से ही मध्य प्रदेश हाईकोर्ट कर रहा है। इसलिए याचिकाकर्ताओं को अपने सभी साक्ष्यों और आशंकाओं के साथ हाईकोर्ट के समक्ष जाना चाहिए, जहां इस विषय पर शीघ्र सुनवाई की जा सकती है।

आनंद ग्रोवर ने अधिकारियों की उस रिपोर्ट पर सवाल उठाए जिसमें कहा गया था कि उपचारित कचरे में पारा नहीं पाया गया। उन्होंने अदालत से कहा कि इतने बड़े स्तर पर कचरे को जलाने के बाद यह दावा करना कि उसमें पारा बिल्कुल नहीं है, गंभीर चिंता का विषय है।

उन्होंने कहा,
“इतनी सारी incineration के बाद अब कहा जा रहा है कि उसमें पारा बिल्कुल नहीं मिला। इसके बाद उसे कंक्रीट ब्लॉक में डाल दिया गया है। अब पारा बाहर रिसेगा। अगर इसे खोलकर जांच का आदेश नहीं दिया गया तो यह पूरी प्रक्रिया बेकार साबित होगी।”

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इस पर न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि निगरानी समिति द्वारा किए गए परीक्षणों में अभी तक किसी तरह के रिसाव के प्रमाण नहीं मिले हैं। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता समिति द्वारा अपनाई गई पद्धति पर सवाल उठा रहे हैं, जिसे संबंधित प्राधिकारियों के समक्ष रखा जाना चाहिए।

न्यायमूर्ति बागची ने यह भी कहा कि अगर भविष्य में किसी प्रकार का रिसाव सामने आता है तो संरचना को और मजबूत कर सील करने के उपाय किए जा सकते हैं। उन्होंने यह भी सावधान किया कि केवल जांच के उद्देश्य से संरचना को खोलना स्वयं प्रदूषण के जोखिम को बढ़ा सकता है।

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने यह भी उल्लेख किया कि याचिकाकर्ता ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) हैदराबाद के डॉ. आसिफ कुरैशी की एक रिपोर्ट पर भरोसा किया है। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि जले हुए कचरे में पारा की मौजूदगी आसपास के क्षेत्र में प्रदूषण का खतरा पैदा कर सकती है।

हालांकि पीठ ने कहा कि उसे 10 दिसंबर 2025 को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच द्वारा पारित आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं दिखता।

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अदालत ने अपने आदेश में कहा,
“याचिकाकर्ता ने आईआईटी हैदराबाद के डॉ. आसिफ कुरैशी की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा है कि incinerated material में पारा की बड़ी मात्रा होने से निस्तारण स्थल के आसपास प्रदूषण का खतरा है। चूंकि सभी आवश्यक सावधानियां बरती गई हैं, इसलिए 10 दिसंबर 2025 के डिवीजन बेंच के आदेश में हस्तक्षेप का कोई कारण नहीं है।”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि भविष्य में किसी प्रकार के रिसाव की आशंका से जुड़े ठोस दस्तावेज या सामग्री उपलब्ध हो तो याचिकाकर्ता हाईकोर्ट में आवेदन दाखिल कर सकते हैं। साथ ही अदालत ने हाईकोर्ट से अनुरोध किया कि वह ऐसे आवेदन पर जनहित को ध्यान में रखते हुए विचार करे और आवश्यक आदेश पारित करे।

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यह मामला 1984 की भोपाल गैस त्रासदी से जुड़ा है, जिसे दुनिया की सबसे भीषण औद्योगिक आपदाओं में गिना जाता है। दिसंबर 1984 में यूनियन कार्बाइड के भोपाल स्थित संयंत्र से लगभग 40 टन मिथाइल आइसोसायनेट गैस का रिसाव हुआ था, जिससे 15,000 से अधिक लोगों की मौत हुई और लाखों लोग जहरीली गैस के संपर्क में आए।

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