इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि एक ही निरंतर घटनाक्रम और समान आरोपों को लेकर अलग-अलग थानों में कई एफआईआर दर्ज करना अदालती प्रक्रिया का दुरुपयोग है। जस्टिस चंद्र धारी सिंह और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने कोऑपरेटिव सोसाइटी में जमा राशि वापस न मिलने से जुड़े मामले में कई एफआईआर का सामना कर रहे एक आरोपी की आपराधिक रिट याचिका स्वीकार करते हुए यह निर्णय दिया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बाद में दर्ज सभी एफआईआर ‘समानता के परीक्षण’ (टेस्ट ऑफ सेमनेस) पर खरी उतरती हैं। अदालत ने सबसे पहले दर्ज एफआईआर को मुख्य एफआईआर मानने और बाद की सभी शिकायतों को दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 161 अथवा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 180 के तहत दर्ज बयान के रूप में शामिल करने का निर्देश दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 18 जुलाई 2024 को ललितपुर जिले के थाना कोतवाली ललितपुर में दर्ज एफआईआर से शुरू हुआ। शिकायतकर्ता यशवंत सिंह की तहरीर पर केस क्राइम संख्या 612/2024 के तहत भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023 की धारा 111, 318, 61(2), 352 और 351(3) में मामला दर्ज किया गया था। शिकायत के अनुसार, ग्राम सतलिंगा के ग्रामीणों की कृषि भूमि भारत बांध परियोजना के लिए अधिग्रहित की गई थी, जिसका उन्हें मुआवजा मिला था। लोनी अर्बन मल्टी-स्टेट क्रेडिट एंड थ्रिफ्ट को-ऑपरेटिव सोसाइटी (एलयूसीसी) का एजेंट बताने वाले कुछ व्यक्तियों ने ग्रामीणों से संपर्क किया और दावा किया कि सोसाइटी में जमा की गई राशि पांच साल की परिपक्वता अवधि पूरी होने पर दोगुनी हो जाएगी।
इस आश्वासन पर भरोसा करते हुए कई जमाकर्ताओं ने 26 मार्च 2019 को सोसाइटी में धनराशि जमा की। पांच साल की अवधि 26 मार्च 2024 को पूरी होने पर जब जमाकर्ताओं ने अपनी रकम वापस मांगी, तो कथित एजेंट टालमटोल करने लगे। शिकायतकर्ता 15 जुलाई 2024 को जब अपना पैसा मांगने गया, तो आरोपियों ने उसके साथ गाली-गलौज की और जान से मारने की धमकी दी। इसके बाद मुख्य एफआईआर दर्ज कराई गई।
इस पहली एफआईआर के बाद ललितपुर जिले के विभिन्न थानों—कोतवाली ललितपुर, जखौरा, महरौनी, तालबेहट और नाराहट—में बीएनएस और आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत कम से कम 13 अन्य एफआईआर दर्ज कर ली गईं। इन सभी मामलों में सोसाइटी के पदाधिकारियों, एजेंटों और याचिकाकर्ता भरत वर्मा सहित साधारण सदस्यों को नामजद किया गया।
लगातार दर्ज हो रही एफआईआर से व्यथित होकर भरत वर्मा ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने एक रिट याचिका दाखिल कर मांग की कि बाद की सभी एफआईआर को पहली एफआईआर (केस क्राइम संख्या 612/2024) के साथ क्लब किया जाए और भविष्य में समान आरोपों पर उनके खिलाफ कोई नई एफआईआर दर्ज न करने का निर्देश दिया जाए।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील अनुराग त्रिपाठी ने दलील दी कि बाद की सभी एफआईआर में लगाए गए आरोप पूरी तरह समान हैं और एक ही विवाद से जुड़े हैं। उन्होंने कहा कि एक ही लेन-देन को लेकर किसी व्यक्ति को अलग-अलग क्षेत्राधिकारों में कई जांचों का सामना करने के लिए विवश करना पुलिस मशीनरी का दुरुपयोग और याचिकाकर्ता का उत्पीड़न है। वकील ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता केवल सोसाइटी का एक साधारण सदस्य था और उसका प्रबंधन या निर्णय लेने में कोई हाथ नहीं था, इसलिए उसे प्रबंध समिति के कार्यों के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
सीआरपीसी की धारा 154, 156 और 173 का हवाला देते हुए उन्होंने तर्क दिया कि केवल पहली सूचना ही आपराधिक कानून को सक्रिय करती है और एक ही घटनाक्रम के लिए बार-बार नई जांच शुरू नहीं की जा सकती। अपनी दलीलों के समर्थन में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का संदर्भ दिया, जिनमें टी.टी. एंटनी बनाम केरल राज्य, बाबूभाई बनाम गुजरात राज्य, अंजू चौधरी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, अमित कात्याल बनाम हरियाणा राज्य और प्रणब ज्योति बर्मन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया शामिल हैं।
दूसरी ओर, राज्य सरकार की ओर से पेश अपर शासकीय अधिवक्ता (एजीए) ने याचिका का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक एफआईआर अलग-अलग शिकायतकर्ताओं द्वारा दर्ज कराई गई है, जो अलग-अलग स्थानों पर रहते हैं। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि सभी घटनाएं एक ही लेन-देन का हिस्सा हैं। राज्य की ओर से यह भी दलील दी गई कि सभी मामलों को एक जगह क्लब करने से शिकायतकर्ताओं को भारी असुविधा होगी, क्योंकि उन्हें मुकदमे के लिए दूसरे क्षेत्राधिकार में जाना पड़ेगा। उन्होंने प्रमोद कुमार सक्सेना बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और अंजू चौधरी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के फैसलों का उल्लेख करते हुए याचिका खारिज करने की मांग की।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने वैधानिक प्रावधानों और न्यायिक दृष्टांतों पर विचार करते हुए दूसरी एफआईआर दर्ज करने के कानूनी मानकों का विश्लेषण किया। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के टी.टी. एंटनी बनाम केरल राज्य फैसले पर प्रमुखता से भरोसा जताया, जिसमें तय किया गया था कि पुलिस की जांच की शक्ति असीमित नहीं है और एक ही संज्ञेय अपराध के लिए बार-बार जांच शुरू करना संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत नागरिकों के मौलिक अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।
दूसरी एफआईआर की वैधता पर टिप्पणी करते हुए अदालत ने कहा:
“उपरोक्त निर्णयों के संयुक्त अवलोकन से यह स्पष्ट हो जाता है कि दूसरी एफआईआर दर्ज करने पर कोई पूर्ण प्रतिबंध नहीं है। साथ ही, यह भी पूरी तरह स्थापित कानून है कि यदि कोई दूसरी एफआईआर उसी लेन-देन या उसी घटना से संबंधित है, तो उसे बरकरार नहीं रखा जा सकता।”
खंडपीठ ने बाबूभाई बनाम गुजरात राज्य और अंजू चौधरी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य का संदर्भ लेते हुए कहा कि मुख्य मानदंड ‘समानता का परीक्षण’ (टेस्ट ऑफ सेमनेस) है—यानी यह देखना आवश्यक है कि क्या बाद की शिकायतें अलग-अलग घटनाओं से संबंधित हैं या वे एक ही निरंतर लेन-देन की कड़ियां हैं। अदालत ने स्टेट (एनसीटी दिल्ली) बनाम खिमजी भाई जडेजा और एस. स्वामीराथनम बनाम मद्रास राज्य का भी उल्लेख किया, जिसमें माना गया था कि एक ही षड्यंत्र या योजना के तहत जनता के साथ की गई ठगी की कई घटनाएं एक ही समग्र लेन-देन का हिस्सा होती हैं। इसके अलावा, अदालत ने अमित कात्याल बनाम हरियाणा राज्य मामले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि संबंधित मामलों को एक साथ जोड़ने से विरोधाभासी फैसलों से बचा जा सकता है और आरोपी को प्रभावी बचाव का अवसर मिलता है।
दर्ज मुकदमों के तुलनात्मक विवरण का परीक्षण करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि वर्तमान मामला इन पांच बिंदुओं को पूरा करता है:
- घटना की एकता: सभी एफआईआर का आधार एक ही मूल शिकायत है।
- कार्रवाई की निरंतरता: आरोप अलग-अलग अपराधों के बजाय घटनाओं की एक अटूट निरंतरता को दर्शाते हैं।
- समय और स्थान की निकटता: सभी शिकायतें आपस में जुड़े समय और नजदीकी भौगोलिक क्षेत्र से संबंधित हैं।
- आरोपों/अपराध की प्रकृति: सभी रिपोर्टों में लगाए गए आरोपों और धाराओं का सार एक जैसा है।
- समान आरोपी व्यक्ति: नामजद व्यक्ति एक ही संस्था की ओर से काम कर रहे थे।
राज्य की इस दलील को खारिज करते हुए कि अलग-अलग थानों का क्षेत्र होने से घटनाएं अलग हो जाती हैं, अदालत ने माना:
“इस अदालत के विचार में, वर्तमान मामले के तथ्य ‘समानता के परीक्षण’ (टेस्ट ऑफ सेमनेस) को पूरा करते हैं, क्योंकि इसमें उद्देश्य और योजना की एकता, समय और स्थान की निकटता और कार्रवाई की निरंतरता मौजूद है।”
हाईकोर्ट का फैसला
हाईकोर्ट ने माना कि सभी मुकदमों को अलग-अलग चलने देने से न्याय प्रशासन पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। अदालत ने कहा:
“सभी एफआईआर को स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ने की अनुमति देना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। यह स्थापित कानूनी स्थिति के भी विपरीत होगा, जिससे कार्यवाहियों की अनावश्यक बहुलता होगी, विरोधाभासी निष्कर्ष निकलेंगे और वर्तमान मामले में याचिकाकर्ता को गंभीर नुकसान पहुंचेगा।”
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने याचिका का निस्तारण करते हुए निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- 18 जुलाई 2024 को थाना कोतवाली ललितपुर में दर्ज एफआईआर (केस क्राइम संख्या 612/2024) को मुख्य एफआईआर माना जाएगा।
- बाद में दर्ज सभी एफआईआर और उनसे जुड़ी कार्यवाहियों को मुख्य एफआईआर के साथ क्लब किया जाए और उनकी सामग्री को सीआरपीसी की धारा 161 (बीएनएसएस की धारा 180) के तहत दर्ज बयान माना जाए।
- जिन मामलों में अभी तक अदालत में चार्जशीट दाखिल नहीं की गई है, उन्हें बिना किसी देरी के तुरंत थाना कोतवाली ललितपुर स्थानांतरित किया जाए ताकि एक संयुक्त जांच पूरी हो सके।
- यदि किसी मामले में किसी सक्षम अदालत ने संज्ञान (कॉग्निजेंस) ले लिया है, तो वे मामले भी मुख्य एफआईआर पर सुनवाई करने वाली क्षेत्राधिकार प्राप्त अदालत को स्थानांतरित और क्लब किए जाएंगे।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: भरत वर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं 14 अन्य
वाद संख्या: क्रिमिनल मिस. रिट पिटीशन संख्या 10787/2026
पीठ: जस्टिस चंद्र धारी सिंह और जस्टिस तरुण सक्सेना
निर्णय की तिथि: 23 सितंबर 2026

