विशाखापत्तनम जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने 43 वर्षीय महिला की ट्यूबेक्टॉमी ऑपरेशन के बाद हुई मौत के मामले में अस्पताल और स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉक्टर को मेडिकल लापरवाही का जिम्मेदार ठहराया है। आयोग ने मृतका के परिवार को कुल ₹37.25 लाख देने का आदेश दिया है, जिसमें मुकदमे का खर्च भी शामिल है।
आयोग की अध्यक्ष गुडला तनुजा और सदस्य वर्री कृष्ण मूर्ति ने 18 सितंबर के आदेश में कहा कि महिला को दी गई चिकित्सा सेवाओं में कमी और लापरवाही रही। महिला की 4 सितंबर 2019 को ऑपरेशन के बाद पैदा हुई जटिलताओं के कारण मौत हो गई थी।
आयोग ने अस्पताल और डॉक्टर को संयुक्त रूप से परिवार को ₹12 लाख देने का निर्देश दिया। इसके अलावा डॉक्टर को महिला की मौत के लिए अलग से ₹25 लाख मुआवजा देने को कहा गया। अस्पताल और डॉक्टर को ₹25,000 मुकदमे के खर्च के रूप में भी देने होंगे।
ट्यूबेक्टॉमी के बाद बिगड़ी हालत
मृतका की मां, भाई और बहन की ओर से दाखिल शिकायत के मुताबिक, महिला 12 अगस्त 2019 को ट्यूबेक्टॉमी ऑपरेशन कराने अस्पताल गई थी।
परिवार का आरोप था कि ऑपरेशन के दौरान लापरवाही से उसकी बड़ी आंत में चोट लग गई। इसके बाद उसे मल संबंधी संक्रमण हुआ, जो आगे चलकर सेप्टिक शॉक और कई अंगों के काम करना बंद करने का कारण बना।
परिवार ने कहा कि इलाज कर रही डॉक्टर समस्या को समय रहते पहचान नहीं सकीं, जिसके कारण महिला को बेहतर इलाज के लिए दूसरे अस्पताल ले जाना पड़ा। वह 31 अगस्त 2019 तक वहां भर्ती रही, लेकिन इलाज का खर्च ज्यादा होने के कारण बाद में उसे सरकारी अस्पताल में शिफ्ट करना पड़ा।
दूसरे अस्पताल में समस्या का पता चलने के बाद परिवार ने 17 अगस्त 2019 को पहले अस्पताल और डॉक्टर के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई। बाद में सरकारी अस्पताल में इलाज के बावजूद महिला को बचाया नहीं जा सका और 4 सितंबर 2019 को उसकी मौत हो गई।
परिवार का कहना था कि उन्होंने बाद में अस्पताल और डॉक्टर से इलाज के खर्च की भरपाई मांगी, लेकिन उन्हें कोई मुआवजा नहीं दिया गया। इसके बाद उन्होंने उपभोक्ता आयोग का रुख किया।
अस्पताल ने जिम्मेदारी से इनकार किया
अस्पताल की ओर से पेश अधिवक्ता ओ. श्रीनिवास ने शिकायत की सुनवाई योग्य होने पर सवाल उठाया। उनका कहना था कि शिकायतकर्ता मृतका के उचित कानूनी वारिस नहीं हैं।
अस्पताल ने यह भी दलील दी कि संबंधित डॉक्टर निजी मेडिकल प्रैक्टिशनर थीं और जरूरत पड़ने पर भुगतान के आधार पर अस्पताल की सुविधाओं का इस्तेमाल करती थीं।
अस्पताल ने खुद को एक चैरिटेबल संस्था बताते हुए कहा कि वह गरीब और जरूरतमंद लोगों के लिए ओपीडी और इनपेशेंट सेवाएं चलाता है तथा मरीजों से केवल न्यूनतम शुल्क लिया जाता है। यह भी कहा गया कि मृतका अस्पताल की मरीज नहीं थी।
डॉक्टर की ओर से पेश अधिवक्ता कंचरला रवि कुमार ने कहा कि ऑपरेशन से पहले महिला की उम्र और मोटापे को ध्यान में रखा गया था और ट्यूबेक्टॉमी करते समय पूरी सावधानी बरती गई।
डॉक्टर की ओर से यह भी कहा गया कि ऑपरेशन के करीब 24 घंटे बाद जटिलताएं सामने आईं और लक्षण किडनी संबंधी बीमारी से भी जुड़े हो सकते थे। बचाव पक्ष ने सरकारी विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि समिति ने डॉक्टर की ओर से मेडिकल लापरवाही नहीं पाई थी।
आयोग ने विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट नहीं मानी
आयोग ने विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट, दूसरे अस्पताल की डिस्चार्ज समरी और डॉक्टर की केस शीट का अध्ययन करने के बाद माना कि महिला की मौत डॉक्टर द्वारा किए गए ऑपरेशन के बाद पैदा हुई जटिलताओं के कारण हुई।
आयोग ने विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट को स्वीकार नहीं किया। उसके मुताबिक समिति डॉक्टर के मौखिक बयानों से प्रभावित हो गई थी।
आयोग ने यह भी नोट किया कि डॉक्टर ने समिति के सामने वह रिकॉर्ड पेश नहीं किया था, जिससे पता चलता कि महिला का सात साल पहले गर्भाशय से संबंधित ऑपरेशन हुआ था। आदेश के अनुसार, इस पुराने ऑपरेशन के कारण ट्यूबेक्टॉमी के दौरान विशेष सावधानी की जरूरत थी और प्रक्रिया के दौरान रेक्टम में चोट लग गई।
आयोग ने अस्पताल की ओर से पेश सरकारी दिशा-निर्देशों का भी जिक्र किया, जिनमें ट्यूबेक्टॉमी के दौरान अपनाई जाने वाली विशेष तकनीकों का उल्लेख था।
आयोग ने पाया कि ऑपरेशन के दौरान रेक्टम को चोट पहुंची और निर्धारित दिशा-निर्देशों का पालन किए बिना घाव बंद कर दिया गया। इसके बाद सेकेंडरी पोस्ट-ऑपरेटिव जटिलताएं पैदा हुईं, जो अंततः महिला की मौत का कारण बनीं।
कंसल्टेंट डॉक्टर बताकर जिम्मेदारी से नहीं बच सकता अस्पताल
आयोग ने अस्पताल की यह दलील भी खारिज कर दी कि डॉक्टर स्वतंत्र प्रैक्टिशनर थीं और अस्पताल ने केवल अपनी सुविधाएं उपलब्ध कराई थीं।
आयोग ने कहा कि जब अस्पताल को सरकार द्वारा तय नियमों और दिशा-निर्देशों की जानकारी थी, तो वह किसी कंसल्टेंट या स्वतंत्र डॉक्टर को उनका उल्लंघन करने की अनुमति नहीं दे सकता था। केवल यह कहकर कि अस्पताल ने सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध कराया था, वह अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता।
आयोग ने इलाज में हुई कमी के लिए डॉक्टर को भी जिम्मेदार ठहराते हुए माना कि मरीज को दी गई सेवाएं लापरवाहीपूर्ण और दोषपूर्ण थीं।
आयोग ने यह भी माना कि मृतका की मां, भाई और बहन उसके कानूनी प्रतिनिधि हैं और उसकी मौत के मामले में मुआवजे की मांग कर सकते हैं।
इसके बाद आयोग ने अस्पताल और डॉक्टर को संयुक्त रूप से ₹12 लाख, डॉक्टर को अलग से ₹25 लाख और मुकदमे के खर्च के रूप में ₹25,000 देने का आदेश दिया।

