साइबर जांच में सहयोग न करने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, गाजियाबाद पुलिस कमिश्नर तलब

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) द्वारा साइबर अपराध की जांच में सहयोग न करने पर कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने गाजियाबाद के पुलिस कमिश्नर को 12 अगस्त को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने का निर्देश दिया है। हाईकोर्ट ने पुलिस कमिश्नर से पूछा है कि जांच में अड़ंगा लगाने वाले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के खिलाफ कार्रवाई करने और उनसे सहयोग सुनिश्चित कराने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं।

जस्टिस अजय भनोट और जस्टिस द्विवेश चन्द्र सामंत की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि भारत में काम करने वाली सभी सोशल मीडिया कंपनियां पूरी तरह से देश के कानूनों और घरेलू जांच एजेंसियों के अधिकार क्षेत्र के अधीन हैं। खंडपीठ ने कहा कि भारतीय कानून का दायरा इतना व्यापक है कि वह किसी भी उल्लंघनकर्ता तक आसानी से पहुंच सकता है और अपराधियों को सजा दिलाने में सक्षम है।

जांच ठप होने और पुलिसिंग की नाकामी पर नाराजगी

हाईकोर्ट का यह आदेश जांच अधिकारी की उस रिपोर्ट के बाद आया है, जिसमें कहा गया था कि ‘एक्स’ द्वारा संबंधित खाते का आईपी एड्रेस और यूआरएल आईडी देने से इनकार करने के कारण जांच पूरी तरह रुक गई है। इस वजह से अधिकारी ने जांच पूरी करने के लिए अदालत से और समय की मांग की थी।

इस स्थिति पर नाराजगी व्यक्त करते हुए हाईकोर्ट ने इसे पहली नजर में “पुलिसिंग की नाकामी” करार दिया। अदालत ने कहा कि ‘एक्स’ के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा जांच में सहयोग न करना बेहद गंभीर है, क्योंकि इस तरह के असहयोग से अपराधी कानून के शिकंजे से बच निकलते हैं। कोर्ट ने गाजियाबाद पुलिस प्रमुख को निर्देश दिया कि वे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के प्रतिनिधियों की जवाबदेही तय करने और कानून का पालन सुनिश्चित कराने के लिए उठाए जा रहे कदमों का ब्यौरा दें।

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क्या है पूरा मामला?

यह कानूनी कार्रवाई मिथिलेश कुमार नाम के एक याचिकाकर्ता की अर्जी पर शुरू हुई है, जिन्होंने हाईकोर्ट से अपनी शिकायत पर निष्पक्ष और त्वरित जांच की मांग की थी। याचिकाकर्ता ने गाजियाबाद के इंदिरापुरम थाने में सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) अधिनियम के तहत एक प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज कराई थी। उनका आरोप था कि किसी अज्ञात व्यक्ति ने ‘एक्स’ पर एक खाते के जरिए उनकी कुछ आपत्तिजनक तस्वीरें और वीडियो साझा कर दिए हैं।

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यूपी के गृह सचिव और डीजीपी को निर्देश

इस मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने 2 जुलाई को जारी अपने इस आदेश की प्रति उत्तर प्रदेश के गृह सचिव और पुलिस महानिदेशक (लखनऊ) को भी भेजने के निर्देश दिए हैं, ताकि वे इन अदालती निर्देशों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करवा सकें।

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