सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मध्य प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को एक विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित करने का निर्देश दिया है। यह दल साल 2023 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस प्रत्याशी के ड्राइवर सलमान खान की कथित हत्या के मामले की नए सिरे से जांच करेगा। आरोप है कि राजनीतिक रूप से रसूखदार लोगों के इशारे पर सलमान खान को वाहन से कुचलकर मार दिया गया था। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि न्याय और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए वरिष्ठ अधिकारियों की देखरेख में स्वतंत्र जांच जरूरी है।
यह आदेश मृतक की पत्नी राजिया अली की याचिका पर आया है। याचिकाकर्ता का पक्ष रख रहे वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने कोर्ट में दलील दी कि स्थानीय पुलिस राजनीतिक दबाव के कारण मामले की निष्पक्ष जांच नहीं कर रही है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसका यह निर्देश मामले के गुण-दोष पर किसी भी तरह की टिप्पणी नहीं है।
एसआईटी का ढांचा और जांच के कड़े नियम
अदालत ने मध्य प्रदेश के डीजीपी को दो दिनों के भीतर इस एसआईटी का गठन करने का आदेश दिया है। पांच सदस्यीय इस जांच दल में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) रैंक के तीन आईपीएस अधिकारी और कम से कम उप पुलिस अधीक्षक (डीएसपी) व इंस्पेक्टर रैंक के दो अधिकारी शामिल होंगे। कोर्ट ने साफ किया कि इस एसआईटी का नेतृत्व मध्य प्रदेश कैडर का कोई ऐसा आईपीएस अधिकारी करेगा जो मूल रूप से राज्य से बाहर का निवासी हो। इसके अलावा, जांच दल के सभी सदस्यों का चयन छतरपुर जिला पुलिस के अधिकार क्षेत्र से बाहर से किया जाएगा।
अदालत ने इस विशेष टीम को दो महीने के भीतर अपनी जांच पूरी करने की समय सीमा दी है। निर्देश के मुताबिक, एसआईटी मौजूदा जांच अधिकारी से केस से जुड़े सभी दस्तावेज अपने कब्जे में लेगी और पिछली जांच से प्रभावित हुए बिना पूरी तरह स्वतंत्र रूप से काम करेगी। कोर्ट ने विशेष तौर पर आदेश दिया कि स्थानीय अदालत में अंतिम आरोप पत्र (चार्जशीट) दाखिल करने से पहले सभी चश्मदीदों के बयानों और हलफनामों को दर्ज कर उन पर गंभीरता से विचार किया जाए।
स्थानीय पुलिस पर राजनीतिक दबाव के गंभीर आरोप
राजिया अली ने अपनी याचिका में आरोप लगाया था कि उनके पति सलमान खान की हत्या के पीछे मौजूदा भाजपा विधायक अरविंद पटेरिया से जुड़े लोगों का हाथ है। सलमान चुनाव के दौरान कांग्रेस प्रत्याशी के वाहन चालक के रूप में काम कर रहे थे। याचिकाकर्ता का कहना था कि राजनीतिक प्रभाव के चलते ही स्थानीय पुलिस की जांच पूरी तरह से प्रभावित हुई है।
वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने अदालत को बताया कि इस मामले में 17 नवंबर 2023 को एफआईआर दर्ज की गई थी, लेकिन तब से अब तक जांच में कोई खास प्रगति नहीं हुई है। उन्होंने दलील दी कि पांच लोगों ने लिखित हलफनामा देकर खुद को चश्मदीद बताया था, लेकिन पुलिस ने उनका औपचारिक बयान तक दर्ज नहीं किया। इसके विपरीत, जांच अधिकारियों ने शिकायतकर्ता के परिवार से पूरी तरह से असंबद्ध तीन अज्ञात व्यक्तियों के बयानों को आधार बना लिया, जिन्होंने दावा किया था कि घटना में राजनीतिक प्रत्याशी का वाहन शामिल नहीं था।
गवाहों की सुरक्षा और राज्य का दायित्व
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने गवाहों की सुरक्षा पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि खुली अदालत में चश्मदीदों की पहचान उजागर होने से उन्हें खतरा हो सकता है। चीफ जस्टिस ने वकील प्रशांत भूषण को सुझाव दिया कि वे इन गवाहों के नाम मध्य प्रदेश पुलिस का पक्ष रख रहे एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) एस. वी. राजू को बंद कमरे या निजी तौर पर सौंप दें। पीठ के सदस्य जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में राज्य का पहला कर्तव्य जांच प्रक्रिया में जनता का विश्वास और भरोसा बहाल करना होता है।
दूसरी ओर, राज्य पुलिस का प्रतिनिधित्व कर रहे एएसजी एस. वी. राजू ने पक्षपात के सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने अदालत में दलील दी कि वर्तमान जांच पूरी तरह से निष्पक्ष और स्वतंत्र तरीके से की गई है और यह अब अपने अंतिम चरण में है।

