बुजुर्ग सास-ससुर के शांति से जीने का अधिकार बहू के रहने के दावे से ऊपर: कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला

कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा है कि अपने ही घर में शांतिपूर्ण ढंग से रहने और उस पर कब्जा पाने से वंचित किए गए बुजुर्ग माता-पिता को सीनियर सिटीजन एक्ट के तहत अपनी बहू को घर से बेदखल करने का पूरा अधिकार है। अदालत ने स्पष्ट किया कि घरेलू हिंसा कानून के तहत बहू का साझा घर में रहने का दावा, बुजुर्गों के इस कानूनी और गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार को खत्म करने का पूर्ण आधार नहीं बन सकता।

जस्टिस सचिन शंकर मगदुम ने श्रीदेवी आर नामक महिला की याचिका को खारिज करते हुए यह आदेश जारी किया। श्रीदेवी ने उस ट्रिब्यूनल के फैसले को चुनौती दी थी, जिसने उन्हें अपनी सास की खुद की कमाई से खरीदी गई संपत्ति को खाली करने का निर्देश दिया था। हाईकोर्ट ने श्रीदेवी को आठ सप्ताह के भीतर परिसर खाली करने का निर्देश दिया है। अदालत ने माना कि बुजुर्ग मालिकों के शांति से रहने के अधिकार को बहू के सीमित और सशर्त निवास के अधिकार से ऊपर प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

यह पूरा मामला 73 वर्षीय अनुसूया सी और उनके 82 वर्षीय पति चंगल रायन से जुड़ा है। अदालत ने पाया कि पारिवारिक विवाद और कलह के चलते इस बुजुर्ग दंपति को साल 2015 में अपना घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था और वे अपने दूसरे बेटे के पास शरण लेने के लिए विवश थे।

बुजुर्गों के सम्मान और शांतिपूर्ण जीवन को प्राथमिकता

अदालत ने 18 जून को दिए अपने आदेश में रेखांकित किया कि माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम (सीनियर सिटीजन एक्ट) केवल वित्तीय मदद के लिए नहीं, बल्कि बुजुर्गों के जीवन के अंतिम पड़ाव में उनके सम्मान, सुरक्षा, स्वायत्तता और स्वतंत्र जीवन को सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया है। जज ने टिप्पणी की कि मालिकाना हक सिर्फ नाम का बनकर नहीं रह सकता कि खुद का घर होते हुए भी बुजुर्गों को कहीं और शरण लेने के लिए मजबूर होना पड़े।

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अदालत ने माना कि घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम भी एक कल्याणकारी कानून है जो महिलाओं को साझा घर में रहने का अधिकार देता है। हालांकि, कोर्ट ने साफ किया कि यह सुरक्षा हर परिस्थिति में एक ऐसा स्थायी या पूर्ण अधिकार नहीं बन सकती जो सास-ससुर की निजी संपत्ति पर कब्जा बनाए रखने की अनुमति दे, खासकर तब जब इससे खुद बुजुर्गों के शांति से रहने का अधिकार छिन रहा हो।

बहू के कानूनी तर्कों पर अदालत का रुख

श्रीदेवी के वकील कनिष्क रविंद्रन ने दलील दी थी कि सीनियर सिटीजन एक्ट के तहत बहू को घर से निकालने का कोई प्रावधान नहीं है। उन्होंने दावा किया कि बुजुर्ग दंपति ने 2015 में श्रीदेवी और उनके पति के बीच चल रहे वैवाहिक विवाद के कारण खुद अपनी मर्जी से घर छोड़ा था। बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि श्रीदेवी को घरेलू हिंसा कानून की धारा 12 के तहत पहले ही रहने का अनुकूल अंतरिम आदेश मिल चुका है, इसलिए सीनियर सिटीजन एक्ट के तहत की गई कार्रवाई केवल उनके वैवाहिक मुकदमों के बदले के रूप में की गई है।

अदालत ने इन तर्कों को अमान्य घोषित कर दिया। अदालत ने कहा कि घर पर श्रीदेवी का कब्जा केवल वैवाहिक रिश्ते और रहने की अनुमति मिलने के कारण था, जबकि यह संपत्ति पूरी तरह उनकी सास के नाम पर है। इसके अलावा, अदालत ने पाया कि श्रीदेवी कामकाजी हैं, आत्मनिर्भर हैं और उनके पास रहने के वैकल्पिक साधन मौजूद हैं, जबकि उनके बुजुर्ग सास-ससुर को बेघर होकर दूसरे बेटे के यहाँ शरण लेनी पड़ी थी।

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सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का हवाला

कर्नाटक हाईकोर्ट ने अपने फैसले को मजबूत करने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा वर्ष 2025 में ‘राजेश्वर प्रसाद रॉय बनाम बिहार राज्य’ मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया। सुप्रीम कोर्ट ने उस मामले में स्पष्ट किया था कि सीनियर सिटीजन एक्ट के तहत मिलने वाले संरक्षण को सिर्फ इसलिए निष्प्रभावी नहीं किया जा सकता क्योंकि कब्जा करने वाली महिला एक बहू है जो घरेलू हिंसा कानून के तहत रहने का दावा कर रही है।

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अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि दोनों कानूनों के बीच हर मामले के तथ्यों के आधार पर संतुलन बनाना जरूरी है। लेकिन जब संपत्ति पूरी तरह वरिष्ठ नागरिकों की हो और उन्हें ही विषम परिस्थितियों के कारण अपना घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा हो, तो सीनियर सिटीजन एक्ट के तहत मिलने वाले कानूनी संरक्षण को ही प्राथमिकता दी जाएगी।

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