प्रीमियम लेने के बाद पुरानी गाड़ी का हवाला देकर क्लेम खारिज करना गलत, उपभोक्ता आयोग ने बीमा कंपनी पर लगाया जुर्माना

करनाल जिला उपभोक्ता आयोग ने बीमा कंपनियों के मनमाने रवैये पर कड़ा रुख अपनाया है। आयोग ने द न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को एक वाहन दुर्घटना क्लेम का भुगतान करने के साथ-साथ पीड़ित ग्राहक को मानसिक परेशानी के लिए मुआवजा देने का आदेश दिया है। आयोग ने साफ किया है कि बीमा कंपनियां ग्राहकों से प्रीमियम वसूलने के बाद गाड़ी की उम्र या नियमों का बहाना बनाकर उनके वैध दावों (क्लेम) को खारिज नहीं कर सकती हैं।

आयोग ने बीमा कंपनी को निर्देश दिया है कि वह शिकायतकर्ता को नुकसान के दावे के रूप में 60,888 रुपये, मानसिक प्रताड़ना के मुआवजे के तौर पर 25,000 रुपये और कानूनी खर्च के रूप में 11,000 रुपये का भुगतान करे। यह फैसला 16 जून को आयोग के अध्यक्ष जसवंत सिंह और सदस्य नीरू अग्रवाल व सर्वजीत कौर की पीठ ने सुनाया।

बाइक सवार को बचाने में हुई थी दुर्घटना

यह पूरा मामला जून 2024 का है, जब शिकायतकर्ता की 2012 मॉडल की डीजल हुंडई एलांट्रा कार एक दुर्घटना का शिकार हो गई थी। एक सामने से आ रहे मोटरसाइकिल सवार को बचाने के प्रयास में कार बिजली के खंभे से टकराकर गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो गई थी। कार मालिक ने एक अधिकृत हुंडई वर्कशॉप में गाड़ी की मरम्मत कराई, जिस पर कुल 2.89 लाख रुपये का खर्च आया। जब उन्होंने मरम्मत के बिल बीमा कंपनी को सौंपे, तो कंपनी ने क्लेम देने से साफ इनकार कर दिया।

एनसीआर में प्रतिबंध का दिया था हवाला

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बीमा कंपनी ने दावा खारिज करने के पीछे सुप्रीम कोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के दिशा-निर्देशों के साथ-साथ दिल्ली सरकार के परिवहन विभाग के 2021 के एक सर्कुलर का हवाला दिया था। इन नियमों के तहत राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में 10 साल से पुराने डीजल और 15 साल से पुराने पेट्रोल वाहनों के चलने पर पाबंदी है। चूंकि दुर्घटना एनसीआर क्षेत्र में हुई थी और वाहन 12 साल पुराना डीजल मॉडल था, इसलिए बीमा कंपनी का तर्क था कि नियमों का उल्लंघन कर चलाई जा रही गाड़ी पर क्लेम नहीं बनता।

नियम पता थे तो क्यों लिया प्रीमियम: आयोग

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उपभोक्ता आयोग ने बीमा कंपनी के इन तर्कों को पूरी तरह खारिज कर दिया। मामले की सुनवाई के दौरान सामने आया कि शिकायतकर्ता ने 12,000 रुपये का प्रीमियम देकर 31 मार्च 2024 से 20 मार्च 2025 तक की अवधि के लिए अपनी कार का बीमा कराया था।

आयोग की पीठ ने इस बात पर हैरानी जताई कि जब बीमा कंपनी को सुप्रीम कोर्ट के नियमों, दिल्ली सरकार के सर्कुलर और एनजीटी के प्रतिबंधों की पूरी जानकारी थी, तो उसने गाड़ी के दस्तावेजों और उम्र की जांच करने के बाद पॉलिसी क्यों जारी की और प्रीमियम क्यों लिया? आयोग ने टिप्पणी की कि आजकल बीमा कंपनियों में यह एक गलत चलन बन गया है कि वे झूठे वादे करके पहले तो ग्राहकों से पॉलिसी का प्रीमियम वसूल लेती हैं, लेकिन जब क्लेम देने की बारी आती है, तो तकनीकी कमियां निकालने लगती हैं।

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आयोग ने बीमा कंपनी के इस रवैये को सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार करार दिया। इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि यदि बीमा कंपनी गाड़ी की स्थिति और नियमों को जानते हुए पॉलिसी जारी करती है, तो वह बाद में अपनी देनदारियों से पीछे नहीं हट सकती।

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