कोरोहेल्थ छंटनी विवाद: केरल हाईकोर्ट ने प्रबंधन और कर्मचारियों को आपसी बातचीत से मसला हल करने का दिया निर्देश

केरल हाईकोर्ट ने अमेरिकी हेल्थकेयर टेक्नोलॉजी कंपनी ‘कोरोहेल्थ’ और नौकरी से निकाले गए उसके कर्मचारियों को आपसी बातचीत (conciliation) के जरिए विवाद का हल निकालने को कहा है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड 2020 के प्रावधानों के तहत दोनों पक्ष इस मामले में सुलह का प्रयास करें।

जस्टिस गोपीनाथ पी. की एकल पीठ ने यह निर्देश कंपनी की उस याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया, जिसमें उसने एर्नाकुलम के जिला लेबर ऑफिसर के ‘यथास्थिति’ (status quo) बनाए रखने के आदेश को चुनौती दी थी। लेबर ऑफिसर ने कंपनी को अपने केरल दफ्तर को बंद करने और कर्मचारियों को नौकरी से निकालने के फैसले पर फिलहाल रोक लगाने को कहा था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जिला लेबर ऑफिसर के उस निर्देश को कोई कानूनी बाध्यता न मानकर केवल चल रही सुलह प्रक्रिया का एक हिस्सा समझा जाए।

हाईकोर्ट का रुख और सरकारी दायित्व

अदालत ने राज्य सरकार के इस तर्क का समर्थन किया कि जब इतनी बड़ी संख्या में लोग अचानक बेरोजगार हो रहे हों, तो उनके बीच मध्यस्थता करना और हस्तक्षेप करना सरकार का सामाजिक दायित्व है।

राज्य सरकार की ओर से पैरवी करते हुए एडवोकेट जनरल जाजू बाबू ने कोर्ट को बताया कि नौकरी से निकाले गए लगभग 800 कर्मचारियों में से अधिकांश महिलाएं हैं। उन्होंने कहा कि सरकार इस संकट का समाधान निकालने के लिए लगातार प्रयास कर रही है और श्रम विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों की अगुवाई में 10 जुलाई को एक सुलह बैठक बुलाई गई है, जिसमें कंपनी प्रबंधन को भी उपस्थित रहने का अनुरोध किया गया है।

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कंपनी का पक्ष और दफ्तर में एंट्री पर विवाद

चिकित्सा कोडिंग (मेडिकल कोडिंग) का काम करने वाली कंपनी कोरोहेल्थ ने केरल के कोच्चि और कोझिकोड स्थित अपने सेंटर्स से लगभग 800 से 850 कर्मचारियों की छंटनी की है। कंपनी का कहना है कि कुछ अपरिहार्य परिस्थितियों के कारण उसे राज्य में अपना काम बंद करना पड़ा। प्रबंधन ने अदालत को बताया कि वह सुलह प्रक्रिया में सहयोग करने को तैयार है और उसने कर्मचारियों के खातों में छंटनी का हर्जाना (retrenchment compensation) पहले ही ट्रांसफर कर दिया है।

कंपनी का तर्क था कि लेबर ऑफिसर को मामले में सुलह कराने का अधिकार तो है, लेकिन वे अंतरिम तौर पर कर्मचारियों को काम पर बनाए रखने का आदेश नहीं दे सकते। उनका कहना था कि इस आदेश की वजह से कंपनी को श्रमिक संगठनों के उग्र विरोध का सामना करना पड़ रहा है।

इससे पहले सोमवार को केरल की लेबर कमिश्नर सफना नजरुद्दीन और तृक्काकरा की विधायक उमा थॉमस ने कंपनी के कानूनी सलाहकार से चर्चा की थी। इस बैठक में सहमति बनी थी कि जब तक 10 जुलाई को श्रम मंत्री बिंदु कृष्ण की अध्यक्षता में मुख्य बैठक नहीं हो जाती, तब तक कर्मचारियों को कोच्चि दफ्तर में आने दिया जाएगा। हालांकि, मंगलवार को जब कर्मचारी दफ्तर पहुंचे, तो उन्हें अंदर जाने से रोक दिया गया, जिससे विवाद बढ़ गया और श्रम विभाग के अधिकारियों को दोबारा हस्तक्षेप करना पड़ा।

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नए श्रम कानूनों पर राजनीतिक तकरार

इस बीच, कांग्रेस और माकपा (CPI-M) दोनों ही प्रमुख दलों ने प्रभावित कर्मचारियों का खुलकर समर्थन किया है। दोनों दलों ने केंद्र सरकार के नए श्रम कानूनों (Labour Codes) पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि इन नए नियमों ने कंपनियों को ऐसी छूट दे दी है जिससे वे राज्य सरकारों या स्थानीय श्रम विभागों को पूर्व सूचना दिए बिना भी बड़े पैमाने पर छंटनी कर सकती हैं।

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