मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत प्यूबर्टी की उम्र पॉक्सो एक्ट और बाल विवाह कानून से ऊपर नहीं हो सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

व्यक्तिगत कानूनों (पर्सनल लॉ) और बाल संरक्षण कानूनों के टकराव पर एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और राष्ट्रीय नीति के लिए बनाए गए धर्मनिरपेक्ष निषेधात्मक कानून, व्यक्तिगत कानूनों में दी गई किसी भी छूट से ऊपर रहेंगे। एक नाबालिग लड़की के बाल विवाह को रोकने पहुंचे बचाव दल पर हमला करने और सरकारी काम में बाधा डालने के आरोपियों की याचिका खारिज करते हुए जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस अचल सचदेव की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि भारत के सभी नागरिकों के लिए विवाह की वैध उम्र केवल बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 (PCMA) से ही संचालित होगी, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 15 फरवरी 2026 को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के काकोर थाने में भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज की गई एक प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) से जुड़ा है। पुलिस और बुलंदशहर चाइल्ड लाइन की एक संयुक्त टीम को यह विश्वसनीय सूचना मिली थी कि क्षेत्र के एक गांव में एक 16 वर्षीय नाबालिग लड़की की शादी होने वाली है। टीम इस बाल विवाह को रोकने के उद्देश्य से वहां पहुंची थी।

जब चाइल्ड लाइन के कार्यकर्ताओं ने लड़की के परिवार से पूछताछ की और उसे बाल कल्याण समिति के सामने पेश करने की बात कही, तो वहां मौजूद एक उग्र भीड़ ने पुलिस और चाइल्ड लाइन कर्मियों को गालियां दीं, उन्हें जान से मारने की धमकी दी और उनके साथ मारपीट की। भीड़ ने जबरन नाबालिग लड़की को टीम की कस्टडी से छीन लिया। हालांकि, बाद में अधिकारियों ने किसी तरह अपनी जान बचाई और लड़की को सुरक्षित रेस्क्यू कर बाहर निकाला। इस घटना के बाद आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया, जिसे रद्द कराने के लिए याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट का रुख किया था।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ताओं की वकील ने कोर्ट में दलील दी कि मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरिया) के तहत, लड़की प्यूबर्टी (वयस्कता) प्राप्त करने के बाद शादी करने के योग्य हो जाती है, जिसे सामान्य तौर पर 15 वर्ष माना जाता है। उन्होंने तर्क दिया कि बाल विवाह निषेध अधिनियम (PCMA) याचिकाकर्ताओं के शादी से जुड़े व्यक्तिगत कानूनों को प्रभावित नहीं करता है। अपनी दलीलों के समर्थन में उन्होंने मेजॉरिटी एक्ट, 1875 की धारा 3 का हवाला दिया, जिसमें शादी, मेहर और तलाक से जुड़े मामलों को अधिनियम के दायरे से बाहर रखने की बात कही गई है। इसके साथ ही उन्होंने मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरियत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 की धारा 2 का भी हवाला दिया कि मुस्लिमों के मामलों में शरियत कानून ही लागू होना चाहिए।

दूसरी ओर, राज्य सरकार के अतिरिक्त शासकीय अधिवक्ताओं ने इस याचिका का कड़ा विरोध करते हुए तर्क दिया कि बच्चों के अधिकारों की रक्षा करने वाले विशेष कानून सर्वोपरि हैं।

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कोर्ट का विश्लेषण

पर्सनल लॉ और बच्चों के संरक्षण के लिए बने विशेष कानूनों के बीच टकराव पर चर्चा करते हुए जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस अचल सचदेव की पीठ ने विभिन्न हाईकोर्टों के अलग-अलग फैसलों का संज्ञान लिया। कोर्ट ने इस मुद्दे पर केरल हाईकोर्ट के एक फैसले से पूरी सहमति जताई, जिसमें व्यक्तिगत कानूनों के ऊपर धर्मनिरपेक्ष कानूनों की प्राथमिकता को स्पष्ट किया गया था।

याचिकाकर्ताओं के तर्कों को सिरे से खारिज करते हुए पीठ ने महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणी की: “कोई भी व्यक्तिगत कानून बाल विवाह निषेध अधिनियम (PCMA) द्वारा लगाए गए बाल विवाह के प्रतिबंध को समाप्त नहीं कर सकता है। इसी तरह पॉक्सो (POCSO) एक्ट के प्रभाव को भी खत्म नहीं किया जा सकता, जो 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चे के साथ शारीरिक संबंध बनाने को एक गंभीर अपराध मानता है। हमारे विचार में, देश के हर नागरिक के लिए विवाह की न्यूनतम उम्र वही है जो बाल विवाह निषेध अधिनियम (PCMA) में तय की गई है, चाहे उसका धर्म कुछ भी हो।”

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि शारीरिक संबंध शादी की संस्था से पूरी तरह जुड़े हुए हैं। ऐसे में 18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति की शादी की अनुमति देने का सीधा मतलब पॉक्सो एक्ट का उल्लंघन होगा। पीठ ने PCMA और पॉक्सो एक्ट को सार्वजनिक स्वास्थ्य और राष्ट्रीय नीति पर आधारित आधुनिक वैज्ञानिक कानून बताया, जिनसे बचने का किसी के पास कोई रास्ता नहीं है।

कोर्ट ने आगे कहा कि चूंकि PCMA और पॉक्सो एक्ट बाद में बने व्यापक कानून हैं, इसलिए वे मेजॉरिटी एक्ट, 1875 में दिए गए पुराने अपवादों पर प्रभावी होंगे। कोर्ट ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के ‘इंडिपेंडेंट थॉट बनाम भारत संघ’ और ‘सोसाइटी फॉर एनलाइटनमेंट एंड वॉलंटरी एक्शन बनाम भारत संघ’ जैसे महत्वपूर्ण फैसलों और पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट तथा दिल्ली हाईकोर्ट के विभिन्न आदेशों का भी विश्लेषण किया।

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तथ्यों पर गौर करते हुए कोर्ट ने पाया कि पुलिस और चाइल्ड लाइन की टीम कानून के दायरे में रहकर अपराध को रोकने का काम कर रही थी। उनके साथ मारपीट और सरकारी काम में बाधा डालना प्रथम दृष्टया अपराध साबित करता है, जिसकी गहन जांच आवश्यक है।

निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ताओं पर लगे आरोप बेहद गंभीर हैं और शुरुआती चरण में जांच को रोकना कतई उचित नहीं होगा। इसके साथ ही खंडपीठ ने रिट याचिका को खारिज कर दिया और पूर्व में दिए गए अंतरिम रोक के आदेश को वापस ले लिया।

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मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: रूबी और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
वाद संख्या: क्रिमिनल मिसलेनियस रिट पिटीशन संख्या 4846 / 2026
पीठ: जस्टिस जे.जे. मुनीर, जस्टिस अचल सचदेव
निर्णय की तिथि: 1 जुलाई, 2026

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