बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग (एमपीएससी) की परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के मामले पर कड़ा रुख अपनाते हुए राज्य सरकार को तीन सप्ताह के भीतर विस्तृत कार्ययोजना (रोडमैप) और रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रशासन का यह संवैधानिक दायित्व है कि वह भर्ती परीक्षाओं को पूरी तरह निष्पक्ष, पारदर्शी और गड़बड़ी-मुक्त बनाए ताकि अभ्यर्थियों का भरोसा बहाल हो सके।
मुख्य न्यायाधीश महेश चंद्र त्रिपाठी और जस्टिस अद्वैत सेठना की खंडपीठ ने बुधवार को पुणे में चल रहे छात्र आंदोलनों को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि अपने हक के लिए आवाज उठा रहे छात्र कोई असामाजिक तत्व नहीं हैं। मामले की अगली सुनवाई 25 नवंबर को मुकर्रर की गई है।
छात्रों का आंदोलन जायज, लेकिन अब वापस पढ़ाई पर लौटें: हाईकोर्ट
सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने छात्रों के प्रदर्शन करने के अधिकार को जायज ठहराया। अदालत ने कहा कि जो अभ्यर्थी दिन-रात एक करके पढ़ाई करते हैं, यदि उन्हें अवसर नहीं मिलते या प्रक्रिया में धांधली का अंदेशा होता है, तो उनका आक्रोशित होना और आंदोलन करना स्वाभाविक है।
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने छात्रों से सड़कों से हटकर अपनी पढ़ाई और कॉलेजों में लौटने की भावनात्मक अपील भी की। मुख्य न्यायाधीश त्रिपाठी ने कहा कि अदालत ने अब इस मामले को अपने हाथ में ले लिया है और छात्रों की चिंताओं का पूरा समाधान निकाला जाएगा। उन्होंने कहा कि ये बच्चे निर्दोष हैं और लंबे समय तक सड़कों पर रहने से उनका भविष्य व करियर प्रभावित हो सकता है। पीठ ने छात्रों से अपने परिजनों की स्थिति का ध्यान रखने और पुणे के आम नागरिकों को किसी भी तरह की असुविधा न पहुंचाने का आग्रह किया।
सरकार का दावा: अधिकतर मांगें मंजूर, चेयरमैन के इस्तीफे पर राज्यपाल को भेजी सिफारिश
राज्य सरकार की ओर से पक्ष रखते हुए महाधिवक्ता मिलिंद साठे ने अदालत को आश्वस्त किया कि प्रशासन ने पूरे मामले में अत्यधिक संयम बरता है और किसी भी प्रदर्शनकारी छात्र के खिलाफ कोई प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज नहीं की गई है। हाईकोर्ट ने शांतिपूर्ण रवैया अपनाने के लिए सरकार के इस कदम की सराहना की।
महाधिवक्ता ने पीठ को बताया कि आंदोलनकारियों की अधिकांश मांगें पहले ही स्वीकार की जा चुकी हैं। आयोग के अध्यक्ष के इस्तीफे की मांग के संबंध में उन्होंने कहा कि निर्धारित प्रशासनिक प्रक्रिया के अनुसार राज्यपाल को औपचारिक सिफारिश भेज दी गई है, जिस पर अंतिम निर्णय प्रतीक्षित है।
पुणे निवासियों की याचिका और आयोजकों का रुख
यह पूरा मामला पुणे निवासी अमित सुपेकर और सौरभ विरकर द्वारा दायर जनहित याचिका से जुड़ा है, जिसमें शहर में जारी छात्र प्रदर्शनों के कारण कानून-व्यवस्था और आम जनजीवन में आ रही बाधाओं को चुनौती दी गई थी। याचिका में राज्य सरकार के अलावा प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे प्रमोद पाटिल, नितिन अंधाले और चेतन वागज को प्रतिवादी बनाया गया था।
अदालत की कार्यवाही के दौरान तीन आयोजकों में से एक ने खुद को आंदोलन से पूरी तरह अलग करते हुए पीछे हटने की घोषणा की। वहीं अन्य दो आयोजकों ने अदालत को बताया कि यदि पुणे प्रशासन उन्हें कोई वैकल्पिक स्थान उपलब्ध कराता है, तो वे अपना धरना-प्रदर्शन वहां स्थानांतरित करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।

