मद्रास हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि किसी बीमित कर्मचारी की प्रतिनियुक्ति पर ड्यूटी के दौरान अचानक तबीयत बिगड़ने या गिर जाने से अप्रत्याशित मौत हो जाती है, तो कर्मचारी राज्य बीमा (ईएसआई) अधिनियम, 1948 की धारा 51ए के तहत वैधानिक उपधारणा लागू होगी। अदालत ने कहा कि विपरीत साक्ष्य के अभाव में कानूनी तौर पर यही माना जाएगा कि कर्मचारी की मौत रोजगार के कारण ही हुई है। जस्टिस शमीम अहमद की पीठ ने कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ईएसआईसी) की ओर से दायर सिविल मिसलेनियस अपील को खारिज करते हुए ईएसआई कोर्ट, कोयंबटूर के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें मृतक कर्मचारी की विधवा को 7.5 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ आश्रित लाभ देने का निर्देश दिया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
मृतक कर्मचारी एम. शक्तिवेल 28 मई 2012 से के.यू. सुदलामुथु एंड कंपनी प्राइवेट लिमिटेड में काम कर रहे थे और ईएसआई अधिनियम के तहत बीमित व्यक्ति थे। नियोक्ता कंपनी ने 29 अक्टूबर 2020 को उन्हें एक अन्य सहकर्मी के साथ बल्ब मोल्डिंग मशीनों के निर्माण और संचालन के काम के लिए 30 दिनों के वास्ते हिमाचल प्रदेश स्थित लक्ष्मी फाइबर्स के कारखाने में प्रतिनियुक्ति पर भेजा था।
25 नवंबर 2020 को शाम करीब 4:30 बजे हिमाचल प्रदेश की फैक्ट्री में ड्यूटी के दौरान शक्तिवेल को अचानक गंभीर बेचैनी महसूस हुई, वह गिर पड़े और हरियाणा के अंबाला छावनी स्थित सिविल अस्पताल ले जाते समय रास्ते में ही उनकी मौत हो गई। इसके बाद उनकी पत्नी चंद्रमथि ने ईएसआईसी के समक्ष आश्रित लाभ के लिए दावा पेश किया।
ईएसआईसी ने 2 दिसंबर 2022 को इस दावे को खारिज कर दिया। इसके खिलाफ चंद्रमथि ने ईएसआई कोर्ट, कोयंबटूर में याचिका (ईएसआईओपी संख्या 19/2023) दायर की। 10 जून 2025 को ईएसआई कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए फैसला सुनाया कि वह दावा याचिका की तारीख से भुगतान होने तक 7.5 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित आश्रित लाभ पाने की हकदार हैं। ईएसआईसी ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
विधि के सारभूत प्रश्न और अदालती आदेश की अनदेखी
हाईकोर्ट ने 4 अगस्त 2026 को इस अपील को स्वीकार करते हुए दो सारभूत कानूनी प्रश्न तय किए थे:
- क्या ईएसआई अधिनियम, 1948 की धारा 51ए के तहत रोजगार के दौरान हुई दुर्घटना से संबंधित उपधारणा उन मामलों में लागू हो सकती है, जहां मौत किसी दुर्घटना के बजाय बीमारी से हुई हो?
- क्या प्राकृतिक कारणों से मरने वाला कर्मचारी, जिसकी मृत्यु किसी दुर्घटना या व्यावसायिक बीमारी से नहीं हुई हो, उसे कानून के तहत रोजगार जनित चोट से मरा हुआ माना जा सकता है?
हाईकोर्ट की समन्वय पीठ ने ईएसआईसी को मुआवजे की 50 प्रतिशत राशि चार सप्ताह में जमा करने की शर्त पर अंतरिम रोक प्रदान की थी। हालांकि, निगम ने राशि जमा नहीं की और बिना किसी ठोस कारण के समय बढ़ाने की मांग की। जस्टिस शमीम अहमद ने कहा कि इस तरह की विफलता से निगम द्वारा अपील को आगे बढ़ाने में अनिच्छा जाहिर होती है, फिर भी अदालत ने मामले का निस्तारण इसके गुण-दोष के आधार पर किया।
पक्षों की दलीलें
ईएसआईसी के वकील ने दलील दी कि बीमित कर्मचारी की मृत्यु किसी ‘दुर्घटना’ या व्यवसाय से जुड़ी बीमारी के कारण नहीं हुई थी। निगम का तर्क था कि शक्तिवेल की मृत्यु “रप्चर्ड लिवर एब्सेस विद पायो पेरिटोनियम विद सेप्सिस” (लिवर में गंभीर संक्रमण फटने) के कारण हुई थी, जो कि एक प्राकृतिक बीमारी है और इसका रोजगार से कोई संबंध नहीं है। इसलिए यह धारा 2(8) के तहत ‘रोजगार जनित चोट’ नहीं है और निगम धारा 52 के तहत आश्रित लाभ देने के लिए उत्तरदायी नहीं है।
वहीं दावेदार (विधवा) का कहना था कि उनके पति ने कंपनी में कई वर्षों तक बिना किसी पुरानी बीमारी के काम किया था और प्रतिनियुक्ति के दौरान अत्यधिक शारीरिक मेहनत वाली ड्यूटी करते समय उनकी अचानक मृत्यु हुई।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
ईएसआई अधिनियम के कानूनी ढांचे का परीक्षण करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि यह एक सामाजिक कल्याणकारी कानून है, जिसे 1948 के मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा के अनुच्छेद 1 को प्रभावी बनाने के लिए लागू किया गया था, इसलिए इसकी उदार व्याख्या की जानी चाहिए। धारा 2(8), 51ए, 52 और 52ए का विश्लेषण करते हुए अदालत ने रेखांकित किया कि यदि कोई बीमित कर्मचारी रोजगार जनित चोट के कारण दम तोड़ता है, तो उसके आश्रित धारा 52 के तहत कानूनी लाभ पाने के पात्र हैं।
अदालत ने पाया कि शक्तिवेल का कंपनी में कर्मचारी होना और प्रतिनियुक्ति पर ड्यूटी के दौरान उनका अस्वस्थ होकर गिरना निर्विवाद तथ्य हैं। ईएसआई कोर्ट के रिकॉर्ड्स—जिनमें एम्प्लॉयमेंट इंजरी रिपोर्ट (प्रदर्श आर-4), दुर्घटना-सह-स्पॉट जांच रिपोर्ट (प्रदर्श आर-5) और सहकर्मी का बयान (प्रदर्श आर-9)—यह साबित करते हैं कि 25 नवंबर 2020 को शाम 4:30 बजे ड्यूटी के दौरान ही उनकी तबीयत बिगड़ी थी। इसके अलावा पोस्टमार्टम रिपोर्ट (प्रदर्श पी-5) में मौत के स्पष्ट कारण का उल्लेख नहीं था और निगम ने पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर का बयान भी दर्ज नहीं कराया।
निगम के गवाह डॉ. आनंदन (आरडब्ल्यू-3) ने भी गवाही में माना कि मृतक ने कभी लिवर की बीमारी की दवा नहीं ली थी और काम के दबाव, मशीनों को संभालने तथा अत्यधिक शारीरिक मेहनत से रोजगार जनित चोट या शारीरिक आघात की स्थिति बन सकती है।
‘दुर्घटना’ शब्द की व्याख्या करते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के शकुंतला चंद्रकांत श्रेष्ठ बनाम प्रभाकर मारुति गरवाली (2007) के फैसले का हवाला दिया, जिसमें मैकिनन मैकेंजी एंड कंपनी प्राइवेट लिमिटेड बनाम इब्राहिम मोहम्मद इसहाक (1970) के कानूनी सिद्धांत को स्वीकार किया गया था:
“इस अधिनियम के दायरे में आने के लिए, दुर्घटना से लगी चोट का रोजगार से और रोजगार के दौरान होना दोनों जरूरी है। ‘रोजगार से उत्पन्न’ शब्दों का अर्थ यह है कि रोजगार के दौरान चोट किसी ऐसे जोखिम से उत्पन्न हुई हो जो सेवा के कर्तव्यों से जुड़ा था, और यदि वह मालिक के प्रति अपने कर्तव्य में संलग्न नहीं होता, तो यह मानना उचित है कि श्रमिक को वह नुकसान नहीं उठाना पड़ता। दूसरे शब्दों में, दुर्घटना और रोजगार के बीच एक कारण-संबंध होना चाहिए। ‘रोजगार से उत्पन्न’ पद केवल काम के स्वरूप तक सीमित नहीं है, बल्कि यह रोजगार की प्रकृति, उसकी शर्तों, जिम्मेदारियों और उससे जुड़ी परिस्थितियों पर भी लागू होता है। यदि इनमें से किसी भी कारक के कारण श्रमिक विशेष खतरे के दायरे में आता है, तो वह चोट रोजगार से उत्पन्न मानी जाएगी। दूसरे शब्दों में, यदि दुर्घटना किसी ऐसे जोखिम के कारण हुई है जो रोजगार का ही एक हिस्सा है, तो मुआवजे का दावा अवश्य स्वीकार किया जाना चाहिए, जब तक कि श्रमिक ने अपने स्वयं के अविवेकपूर्ण कृत्य से खुद को अतिरिक्त खतरे में न डाला हो।”
अदालत ने दुर्घटना की स्थापित कानूनी परिभाषा को रेखांकित करते हुए कहा:
“कानूनी दायित्वों के संदर्भ में दुर्घटना का अर्थ कोई भी अनपेक्षित और अप्रत्याशित घटना है, जिससे कोई क्षति या नुकसान होता है। लेकिन इसका उपयोग अक्सर किसी अनपेक्षित और अचानक हुए नुकसान या चोट के लिए भी किया जाता है, भले ही उसका कारण कुछ भी हो; और यदि कारण ज्ञात न हो, तो वह नुकसान या क्षति अपने आप में निश्चित रूप से दुर्घटना कहलाएगी।”
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि शक्तिवेल ने सात वर्ष से अधिक समय तक सेवा की थी और ड्यूटी के दौरान अचानक अस्वस्थ होकर उनकी अप्रत्याशित मौत हुई, इसलिए निगम का यह तर्क स्वीकार करने योग्य नहीं है कि यह कोई दुर्घटना नहीं थी।
हाईकोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के भाग्यश्री भार्गुराम महादिक बनाम ईएसआईसी (2013) के निर्णय का भी उल्लेख किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के क्षेत्रीय निदेशक, ईएसआईसी बनाम साउथ इंडिया फ्लोर मिल्स (पी) लिमिटेड (1986) के सिद्धांत को उद्धृत किया गया था:
“यह अधिनियम एक सामाजिक सुरक्षा कानून है जिसे बीमारी, मातृत्व और रोजगार जनित चोट की स्थिति में कर्मचारियों को कुछ लाभ प्रदान करने के लिए बनाया गया है… इस प्रकृति के कानून में, न्यायालय का प्रयास उन व्यक्तियों के पक्ष में प्रावधानों की उदार व्याख्या करने का होना चाहिए, जिनके लाभ के लिए यह कानून बनाया गया है।”
बॉम्बे हाईकोर्ट के निर्णय में यह माना गया था कि जब किसी कर्मचारी की मृत्यु रोजगार के दौरान कार्यस्थल पर होती है और निगम धारा 51ए के तहत उपधारणा का खंडन करने के लिए कोई साक्ष्य पेश नहीं करता है, तो ‘नोशनल एक्सटेंशन थ्योरी’ (काल्पनिक विस्तार सिद्धांत) के आधार पर यही माना जाएगा कि मृत्यु रोजगार से ही उत्पन्न हुई है।
जस्टिस शमीम अहमद ने कहा कि ईएसआईसी यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहा कि मृतक को पहले से कोई पुरानी बीमारी थी या अत्यधिक तनाव व दबाव में हुई इस मृत्यु का संबंध उसके काम से नहीं था।
हाईकोर्ट का निर्णय
विधि के दोनों सारभूत प्रश्नों का उत्तर ईएसआईसी के विरुद्ध देते हुए हाईकोर्ट ने माना कि ईएसआई कोर्ट ने साक्ष्यों का उचित विश्लेषण किया और धारा 51ए के साथ ‘नोशनल एक्सटेंशन थ्योरी’ को सही ढंग से लागू किया।
हाईकोर्ट ने ईएसआईसी की अपील को खारिज कर दिया, 4 अगस्त 2026 को दिए गए अंतरिम स्थगन आदेश को निरस्त किया और ईएसआई कोर्ट, कोयंबटूर के 10 जून 2025 के आदेश की पुष्टि की। इसके साथ ही दावेदार को कानून के अनुसार ब्याज सहित पूरी राशि वसूलने की छूट दी गई।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: द डिप्टी डायरेक्टर, एम्प्लॉइज स्टेट इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन बनाम चंद्रमथि एवं अन्य
वाद संख्या: सीएमए संख्या 2673/2026 और सीएमपी संख्या 20510 एवं 25491/2026
पीठ: जस्टिस शमीम अहमद
निर्णय की तिथि: 28-09-2026

