दिव्यांग भाई की देखभाल करने वाले यूको बैंक प्रबंधक का 1,000 किमी दूर तबादला रद्द, राजस्थान हाईकोर्ट ने बताया अमानवीय व असंवैधानिक

राजस्थान हाईकोर्ट ने यूको बैंक के एक प्रबंधक के 1,000 किलोमीटर दूर किए गए तबादला आदेश को निरस्त करते हुए इसे मनमाना और अमानवीय करार दिया है। अदालत ने कहा कि गंभीर थैलेसीमिया और 75 प्रतिशत स्थायी दिव्यांगता से जूझ रहे भाई के एकमात्र आश्रयदाता को मानवीय परिस्थितियों की अनदेखी कर इतनी दूर भेजना संविधान के अनुच्छेद 21 का सीधा उल्लंघन है, जो सम्मानपूर्वक जीवन और स्वास्थ्य का मौलिक अधिकार देता है।

जस्टिस अनूप कुमार ढंड ने 5 अक्टूबर को राहुल अग्रवाल की याचिका स्वीकार करते हुए यह आदेश पारित किया। बैंक ने अग्रवाल को जयपुर अंचल की बानेती शाखा से गुजरात के अहमदाबाद अंचल स्थित भड़वा शाखा में स्थानांतरित करने का फरमान जारी किया था। पीठ ने सरकारी बैंक को आदेश दिया कि जब तक अग्रवाल के मामले पर बैंक की अपनी दिव्यांग कल्याण नीति के तहत सहानुभूतिपूर्वक पुनर्विचार नहीं किया जाता, तब तक उन्हें वर्तमान तैनाती स्थल पर ही कार्य करने दिया जाए।

दिव्यांग कल्याण नीति कोई खैरात नहीं, बैंक पर कानूनी रूप से बाध्यकारी

इस कानूनी विवाद के केंद्र में यूको बैंक की ‘समान अवसर नीति 2024-27’ (इक्वल ऑपर्च्युनिटी पॉलिसी) रही। इस नीति में स्पष्ट प्रावधान है कि दिव्यांग कर्मियों अथवा गंभीर दिव्यांगता से पीड़ित माता-पिता, जीवनसाथी, संतान या भाई-बहन की देखरेख करने वाले कर्मचारियों को नियमित या रोटेशनल तबादलों से छूट दी जानी चाहिए। साथ ही, उन्हें ऐसे सुदूर क्षेत्रों में नहीं भेजा जाना चाहिए जहाँ से आवागमन या इलाज में भारी कठिनाई हो।

जस्टिस ढंड ने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक केवल जनता को दिखाने के लिए कल्याणकारी नीतियां बनाकर व्यवहार में उनके विपरीत आचरण नहीं कर सकते। अदालत ने स्पष्ट किया कि बैंक द्वारा बनाई गई यह विशेष नीति किसी तरह का उपकार या खैरात नहीं, बल्कि एक वैधानिक दायित्व है जिसका पालन अनिवार्य है। अदालत ने पाया कि तबादला आदेश में न तो भाई की दिव्यांगता का कोई उल्लेख था और न ही इस विशेष नीति का, जो यह दर्शाता है कि बैंक प्रबंधन ने बिना सोचे-समझे यह निर्णय लिया।

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हर पखवाड़े रक्त चढ़ाने की लाचारी, बैंक के आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज थी निर्भरता

अदालत में पेश साक्ष्यों के अनुसार, याचिकाकर्ता के छोटे भाई आशीष कुमार अग्रवाल थैलेसीमिया से पीड़ित हैं। राजस्थान सरकार के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग ने 19 अप्रैल 2022 को उन्हें 75 प्रतिशत स्थायी शारीरिक दिव्यांगता का प्रमाणपत्र जारी किया था। आशीष को जीवित रहने के लिए हर 15 से 20 दिन में रक्त चढ़ाना पड़ता है। उनके इलाज, दैनिक देखभाल और भरण-पोषण का पूरा जिम्मा राहुल पर ही है और परिवार में उनकी देखभाल के लिए कोई दूसरा सदस्य नहीं है।

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हाईकोर्ट ने इस बात पर विशेष ध्यान दिया कि अग्रवाल ने यह दलील मुकदमेबाजी के दौरान अचानक तैयार नहीं की। यह निर्भरता बैंक के आधिकारिक सेवा और मानव संसाधन (एचआर) रिकॉर्ड में पहले से ही दर्ज थी, जिस पर बैंक प्रबंधन ने भी अपनी ओर से कभी कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई थी।

प्रशासनिक विवशता का हवाला देकर नियमों को दरकिनार नहीं कर सकता बैंक

बैंक प्रबंधन ने 16 मई को तबादला आदेश जारी किया था और बाद में 8 सितंबर को अग्रवाल के अभ्यावेदन को खारिज कर दिया था। इसके बचाव में बैंक ने दलील दी कि 1 अप्रैल 2026 को स्केल-I से स्केल-II में पदोन्नति के कारण अधिकारियों का स्थानांतरण अनिवार्य होता है। बैंक का यह भी कहना था कि अग्रवाल जनवरी 2018 से लगभग आठ वर्षों से जयपुर अंचल में ही पदस्थापित थे और यह कार्रवाई बिना किसी दुर्भावना के केवल प्रशासनिक आवश्यकताओं के तहत की गई थी।

हाईकोर्ट ने बैंक की इन दलीलों को खारिज करते हुए 8 सितंबर के निरस्तीकरण आदेश को पूरी तरह आधारहीन बताया। अदालत ने कहा कि उस आदेश में यह तनिक भी स्पष्ट नहीं किया गया था कि कर्मचारी को विशेष नीति के तहत छूट क्यों नहीं दी गई। पीठ ने इस कार्रवाई को भेदभावपूर्ण बताते हुए संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) और अनुच्छेद 16 (अवसर की समानता) के विरुद्ध माना। अदालत ने साफ किया कि ‘प्रशासनिक बाध्यता’ का इस्तेमाल मनमाने ढंग से सुरक्षात्मक नीतियों को निष्प्रभावी बनाने के लिए नहीं किया जा सकता।

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तबादले से हमेशा की छूट नहीं, नीति के तहत समीक्षा के बाद ही संभव होगी नई तैनाती

अदालत ने माना कि सामान्य तौर पर तबादला सेवा की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है और न्यायपालिका इसमें आमतौर पर हस्तक्षेप नहीं करती। हालांकि, जब किसी आदेश में वैधानिक नीति का उल्लंघन, मनमाना रवैया या मानवीय संवेदनहीनता दिखे, तो अदालत का हस्तक्षेप जरूरी हो जाता है।

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जयपुर अंचल में सात वर्ष से अधिक का कार्यकाल पूरा कर लेने के आधार पर अग्रवाल को भविष्य के तबादलों से स्थायी छूट नहीं मिल जाती। बैंक प्रबंधन यदि चाहे तो किसी अन्य स्टेशन पर रिक्त पद होने पर उनके स्थानांतरण पर विचार कर सकता है, लेकिन ऐसा करने से पहले बैंक को कर्मचारी की पारिवारिक परिस्थितियों, भाई की गंभीर चिकित्सा स्थिति और अपनी समान अवसर नीति का गंभीरता से मूल्यांकन करना होगा।

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