कोलकाता जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने कोविड-19 महामारी के दौरान ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड का दौरा रद्द होने के बाद एक ग्राहक का 2 लाख रुपये का अग्रिम भुगतान न लौटाने पर एक अंतरराष्ट्रीय ट्रैवल एजेंसी के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है। आयोग ने एजेंसी को पूरी रकम वापस करने का आदेश देते हुए कहा कि कई बार आग्रह के बावजूद पैसा न लौटाना जानबूझकर की गई लापरवाही और सेवा में गंभीर कमी है।
आयोग के अध्यक्ष मनोज कुमार राय और सदस्य अशोका गुहा रॉय बेरा की पीठ ने 29 सितंबर को यह फैसला सुनाते हुए पीड़ित ग्राहक को 20,000 रुपये का मुआवजा और 10,000 रुपये कानूनी खर्च के रूप में अदा करने का भी निर्देश दिया। आयोग ने साफ किया कि असाधारण या अप्रत्याशित परिस्थितियों के चलते सेवाएं रद्द होने पर भी ट्रैवल एजेंसियां ग्राहकों की जमा पूंजी अपने पास नहीं रोक सकतीं।
विवाद की पृष्ठभूमि
शिकायतकर्ता ने 14 अक्टूबर 2020 से प्रस्तावित 15 रात और 16 दिनों के ऑस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड टूर पैकेज के लिए एक अंतरराष्ट्रीय ट्रैवल एवं टूरिज्म एजेंसी से बुकिंग की थी। इसके लिए ग्राहक ने 2 लाख रुपये बतौर अग्रिम राशि जमा कराई थी। हालांकि, महामारी के प्रकोप, अंतरराष्ट्रीय यात्रा पाबंदियों और उड़ानों के निरस्त होने के कारण यह यात्रा रद्द हो गई।
यात्रा रद्द होने के बाद ग्राहक ने एजेंसी से पैसे वापस मांगे, जिस पर एजेंसी ने पूरा रिफंड देने का आश्वासन दिया था। इसके बावजूद, बार-बार के आग्रह, एजेंसी के दफ्तर के कई चक्करों और 10 फरवरी 2022 को कानूनी नोटिस भेजे जाने के बाद भी कंपनी ने पैसे नहीं लौटाए। इसके बाद पीड़ित ने मई 2022 में अनुचित व्यापार व्यवहार और सेवा में कोताही का आरोप लगाते हुए उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज कराई।
क्रेडिट वाउचर की दलील खारिज
ट्रैवल एजेंसी ने आयोग के समक्ष अपना बचाव करते हुए दावा किया कि अनुबंध की शर्तों के तहत ग्राहक नकद रिफंड का हकदार नहीं है। कंपनी ने यह तर्क भी दिया कि महामारी के कारण दौरा रद्द होने पर ग्राहक को भविष्य की यात्रा के लिए क्रेडिट वाउचर जारी किया गया था।
आयोग ने ट्रैवल एजेंसी के इन तर्कों को पूरी तरह खारिज कर दिया। आयोग ने पाया कि शिकायतकर्ता ने सेवाओं के लिए अग्रिम भुगतान किया था, जो उसे कभी मिली ही नहीं, इसलिए वह पूर्ण रूप से उपभोक्ता संरक्षण के दायरे में आता है।
पीठ ने टिप्पणी की कि सेवाएं रद्द होने की स्थिति में ग्राहकों का पैसा वापस करना किसी भी सेवा प्रदाता का प्राथमिक दायित्व होता है, लेकिन एजेंसी ने रिफंड की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया। फैसले में कहा गया कि एजेंसी के गैर-जिम्मेदाराना रवैये के चलते उपभोक्ता को वित्तीय नुकसान और मानसिक परेशानी झेलनी पड़ी, जिसके लिए सेवा प्रदाता को पूरी तरह जिम्मेदार ठहराया जाना जरूरी है।

