पत्रकारों के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का 2003 का मामला सुप्रीम कोर्ट में निष्प्रभावी घोषित, संवैधानिक सवाल भविष्य के लिए खुला रहेगा

सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की संविधान पीठ ने तमिलनाडु विधानसभा द्वारा 2003 में पत्रकारों के खिलाफ शुरू की गई विशेषाधिकार हनन की कार्यवाही से जुड़े दो दशक पुराने मामले को निष्प्रभावी करार देते हुए समाप्त कर दिया है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह स्पष्ट किया कि यद्यपि मौजूदा याचिकाएं अब अर्थहीन हो चुकी हैं, लेकिन विधायकों के विशेषाधिकारों और नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन से जुड़े गंभीर संवैधानिक प्रश्न भविष्य में किसी उपयुक्त मामले में विचार के लिए खुले रहेंगे।

इस संविधान पीठ में चीफ जस्टिस के अतिरिक्त जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा, जस्टिस जॉयमाला बागची, जस्टिस विपुल एम. पंचोली, जस्टिस श्री चंद्रशेखर और जस्टिस वी. मोहना शामिल थे। शीर्ष अदालत ने यह फैसला इसलिए दिया क्योंकि पत्रकारों के विरुद्ध की गई दंडात्मक कार्रवाई को विधानसभा बहुत पहले ही वापस ले चुकी थी।

विधानसभा द्वारा प्रस्ताव वापस लिए जाने से समाप्त हुआ विवाद

मामले की सुनवाई के दौरान तमिलनाडु विधानसभा का पक्ष रख रहे वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने अदालत के समक्ष 24 अगस्त 2004 का एक हलफनामा प्रस्तुत किया। इस हलफनामे में दर्ज था कि विधानसभा ने 30 जुलाई 2004 को सर्वसम्मति से एक नया प्रस्ताव पारित करके पत्रकारों के विरुद्ध 7 नवंबर 2003 को पारित किए गए अपने दंडात्मक प्रस्ताव को वापस ले लिया था।

चीफ जस्टिस ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि जब इस मामले को सात जजों की संविधान पीठ के पास भेजा गया था, तब संभवतः यह महत्वपूर्ण घटनाक्रम अदालत के संज्ञान में नहीं लाया जा सका था और यह ध्यान में आने से छूट गया था। पीठ ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि चूंकि 7 नवंबर 2003 का दंडात्मक प्रस्ताव पहले ही निरस्त किया जा चुका है, इसलिए विवाद का मूल कारण ही समाप्त हो चुका है और अब इस मामले में सुनवाई का कोई औचित्य बाकी नहीं रहा।

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मौलिक अधिकार बनाम विशेषाधिकार का सवाल आगे भी विचारणीय

याचिकाओं को समाप्त करते हुए भी पीठ ने रेखांकित किया कि इसमें उठाए गए मूल विधिक प्रश्नों का समाधान होना अभी बाकी है। ‘एन. रवि व अन्य बनाम अध्यक्ष, तमिलनाडु विधानसभा’ शीर्षक वाली इस याचिका का मुख्य कानूनी आधार यह है कि क्या नागरिकों के मौलिक अधिकार विधायिका के विशेषाधिकारों से ऊपर हैं।

इस मामले का न्यायिक इतिहास 8 दिसंबर 2003 से जुड़ा है, जब सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 194(3), अनुच्छेद 19(1)(ए) और अनुच्छेद 21 के पारस्परिक संबंधों की व्याख्या से जुड़े गंभीर सवालों को देखते हुए इसे पांच जजों की पीठ को सौंपा था।

इसके बाद 8 दिसंबर 2004 को अदालत ने पाया कि विधायिका की शक्तियों पर उसके पुराने निर्णयों में स्पष्ट विरोधाभास है। वर्ष 1959 में ‘पंडित एम.एस.एम. शर्मा बनाम श्री श्रीकृष्ण सिन्हा’ मामले में पांच जजों की पीठ के निष्कर्ष 1964 के एक अन्य निर्णय में तय किए गए विशेषाधिकारों से मेल नहीं खाते थे। एक फैसले का निष्कर्ष था कि मौलिक अधिकारों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए, जबकि दूसरे में मौलिक अधिकारों को संसदीय विशेषाधिकारों के अधीन माना गया था। इसी टकराव को दूर करने के लिए मामले को सात जजों की पीठ के पास भेजा गया था।

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2003 में संपादकीय और खबरों से उपजा था विवाद

यह विवाद अप्रैल 2003 में तमिलनाडु विधानसभा की कार्यवाही पर ‘द हिंदू’ समाचार पत्र में 12, 13, 24 और 26 अप्रैल को छपी खबरों तथा 25 अप्रैल को प्रकाशित एक संपादकीय के बाद शुरू हुआ था। इसके तुरंत बाद, 26 अप्रैल 2003 को ‘मुरासोली’ अखबार ने इस संपादकीय का शब्दशः तमिल अनुवाद छापा था।

तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष ने इन प्रकाशनों को जांच के लिए विशेषाधिकार समिति को सौंप दिया। समिति ने 5 मई 2003 को बैठक कर माना कि संबंधित लेखों से संसदीय विशेषाधिकार का हनन हुआ है और उसने पत्रकारों से स्पष्टीकरण मांगा।

सदन के पटल पर इस पर विधिवत चर्चा होने से पहले ही विधानसभा ने 7 नवंबर 2003 को प्रस्ताव पारित कर दिया। इसके बाद तत्कालीन अध्यक्ष के. कालिमुथु ने एन. रवि सहित छह पत्रकारों को सदन की अवमानना और विशेषाधिकार हनन के आरोप में गिरफ्तार करने का आदेश जारी कर दिया। पत्रकारों ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जहां अदालत ने गिरफ्तारियों पर अंतरिम रोक लगाते हुए मामले को संवैधानिक समीक्षा के लिए आगे बढ़ा दिया था।

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