इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल किसी आपराधिक मामले के लंबित होने या प्रशासनिक अधिकारियों की प्रतिकूल सिफारिश के आधार पर नियुक्ति प्राधिकारी किसी चयनित अभ्यर्थी की नियुक्ति को यांत्रिक (मैकेनिकल) तरीके से खारिज नहीं कर सकता। नियुक्ति प्राधिकारी का यह विधिक दायित्व है कि वह अभ्यर्थी की उपयुक्तता का स्वतंत्र रूप से आकलन करे। जस्टिस मनीष कुमार निगम की एकल पीठ ने पुलिस अधीक्षक, मऊ द्वारा पुलिस आरक्षी (कांस्टेबल) भर्ती के एक चयनित अभ्यर्थी की उम्मीदवारी निरस्त करने के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने आबकारी अधिनियम के तहत लंबित एक मुकदमे और एक गैर-जांच योग्य एनसीआर (गैर-संज्ञेय रिपोर्ट) के आधार पर निरस्तीकरण को अनुचित माना और संबंधित प्राधिकारी को दो माह के भीतर नए सिरे से निर्णय लेने का निर्देश दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
याची सूरज कन्नौजिया ने उत्तर प्रदेश पुलिस आरक्षी नागरिक पुलिस सीधी भर्ती-2023 में भाग लिया था। लिखित परीक्षा में सफल होने के बाद उन्हें 19 अप्रैल 2025 को चिकित्सा परीक्षण के लिए बुलाया गया, जिसमें वे पूरी तरह योग्य पाए गए। इसके बाद आधिकारिक भर्ती पोर्टल पर उन्हें अंतिम रूप से चयनित घोषित कर दिया गया।
चयन के उपरांत चरित्र सत्यापन प्रक्रिया के तहत थाना तुर्कपट्टी, जनपद कुशीनगर द्वारा 16 मई 2025 को एक रिपोर्ट भेजी गई। इस रिपोर्ट में उल्लेख किया गया कि याची के विरुद्ध संयुक्त प्रांत आबकारी अधिनियम की धारा 60 के तहत अपराध संख्या 12/2021 दर्ज है, जिसमें 4 जून 2021 को चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है। इसके अलावा, भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 323 और 504 के तहत वर्ष 2018 की एक एनसीआर (संख्या 139/2018) भी दर्ज है। इसके बाद पुलिस अधीक्षक, कुशीनगर ने जिलाधिकारी, कुशीनगर से मार्गदर्शन मांगा। जिलाधिकारी ने 5 जून 2025 को अपनी रिपोर्ट में याची की नियुक्ति की संस्तुति नहीं की। इस प्रतिकूल आख्या को आधार बनाकर नियुक्ति प्राधिकारी यानी पुलिस अधीक्षक, मऊ ने 26 अगस्त 2025 को सूरज कन्नौजिया का चयन निरस्त कर दिया। इस आदेश को चुनौती देते हुए याची ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल कर निरस्तीकरण आदेश रद्द करने और नियुक्ति पत्र जारी करने की मांग की।
पक्षकारों की दलीलें
याची की ओर से बहस कर रहे अधिवक्ता अभय प्रताप सिंह और रिकॉर्ड पर अधिवक्ता बृजेश ने दलील दी कि याची को चरित्र सत्यापन आख्या कभी उपलब्ध ही नहीं कराई गई। उन्होंने कहा कि मामले के तथ्यों और कथित अपराध की प्रकृति का मूल्यांकन किए बिना केवल आपराधिक मामले के लंबित रहने के आधार पर नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता। उन्होंने 28 अप्रैल 1958 के शासनादेश का हवाला देते हुए बताया कि यदि किसी मामले में दोषसिद्धि भी हो चुकी हो, तब भी चरित्र प्रमाण पत्र देने से तब तक इनकार नहीं किया जा सकता जब तक कि अपराध नैतिक अधमता, हिंसा या सरकार को हिंसक साधनों से उखाड़ फेंकने से संबंधित न हो। अधिवक्ता ने दलील दी कि याची किसी भी मामले में दोषी नहीं ठहराया गया है, उसे कभी समन तामील नहीं हुआ, और आबकारी मामले की जानकारी मिलते ही उसने अदालत में आत्मसमर्पण कर 16 मई 2025 को जमानत प्राप्त कर ली थी। इसके अतिरिक्त, आबकारी मामले में पुलिस जब्ती का कोई स्वतंत्र गवाह नहीं था और एनसीआर की पुलिस ने कभी कोई विवेचना ही नहीं की थी।
दूसरी ओर, राज्य सरकार की ओर से उपस्थित विद्वान स्टैंडिंग काउंसिल और चीफ स्टैंडिंग काउंसिल (सीएससी) ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि पुलिस बल एक अनुशासित बल है, जिसमें अत्यधिक सत्यनिष्ठा और बेदाग चरित्र वाले व्यक्तियों की आवश्यकता होती है। राज्य का कहना था कि जब एफआईआर दर्ज है, चार्जशीट दाखिल हो चुकी है और आपराधिक मुकदमा लंबित है, तो नियोक्ता का विश्वास समाप्त हो जाता है। उन्होंने कहा कि पुलिस अधीक्षक, मऊ ने 1958 के शासनादेश के तहत जिलाधिकारी, कुशीनगर की रिपोर्ट पर विचार कर एक सचेत प्रशासनिक निर्णय लिया है, जिसमें अदालत को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
सुसंगत नियम और नज़ीरें
हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस आरक्षी तथा मुख्य आरक्षी सेवा नियमावली, 2015 (यथा संशोधित 2017) के नियम 16 पर विचार किया। कोर्ट ने पाया कि यद्यपि यह नियम प्रशिक्षण और नियुक्ति से पूर्व चरित्र सत्यापन को अनिवार्य करता है, किंतु इसमें किसी अभ्यर्थी को ‘अनुपयुक्त’ ठहराने के लिए कोई स्पष्ट मापदंड या प्रक्रिया निर्धारित नहीं की गई है। ऐसे मामलों में 28 अप्रैल 1958 का शासनादेश (संख्या 4694-II-B-321-1947) प्रभावी है, जो स्पष्ट करता है कि मात्र दोषसिद्धि भी सरकारी सेवा में प्रवेश के लिए स्वतः अयोग्यता नहीं मानी जा सकती यदि मामला गंभीर हिंसा या नैतिक पतन का न हो।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न महत्वपूर्ण फैसलों का संदर्भ लिया:
- अवतार सिंह बनाम भारत संघ (2016): सुप्रीम कोर्ट ने विस्तृत दिशानिर्देश तय करते हुए कहा था कि नियोक्ता को अपराध की तुच्छ प्रकृति, लागू सरकारी नियमों और तथ्यों को जानबूझकर छिपाए जाने के पहलू पर विचार करना चाहिए।
- कमिश्नर ऑफ पुलिस बनाम संदीप कुमार (2011): सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि युवाओं से होने वाली छोटी-मोटी भूलों को नजरअंदाज किया जाना चाहिए, न कि उन्हें जीवन भर के लिए अपराधी का तमगा दिया जाए।
- एसपीओ/कांस्टेबल आईआरबी सतपाल सिंह बनाम पंजाब राज्य (2026): सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि केवल आपराधिक मामले के लंबित रहने के आधार पर किसी को सार्वजनिक रोजगार से बाहर नहीं किया जा सकता।
- मोहम्मद इमरान बनाम महाराष्ट्र राज्य (2018): अदालत ने माना था कि नैतिक अधमता के नाम पर बिना ठोस आधार के किसी अभ्यर्थी के भविष्य को बंधक नहीं बनाया जा सकता।
- उमेश चंद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2023): हाईकोर्ट की खंडपीठ ने माना था कि नियुक्ति प्राधिकारी लागू शासनादेशों का मूल्यांकन करने के लिए बाध्य है।
राज्य सरकार द्वारा प्रस्तुत निर्णयों—जैसे राजस्थान राज्य विद्युत प्रसारण निगम लिमिटेड बनाम अनिल कंवरिया (2021), भारत संघ बनाम मेठू मेडा (2021), राजस्थान राज्य बनाम चेतन जेफ (2022), सतीश चंद्र यादव बनाम भारत संघ (2022) और इम्तियाज अहमद मल्ला बनाम जम्मू-कश्मीर राज्य (2023)—को हाईकोर्ट ने वर्तमान मामले से भिन्न बताया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वे मामले आपराधिक इतिहास को दुर्भावनापूर्वक छिपाने या संदेह के लाभ पर आधारित बरी होने से संबंधित थे, जबकि वर्तमान मामले में तथ्यों को छिपाने का कोई आरोप नहीं था।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
अभिलेखों और निरस्तीकरण आदेश की समीक्षा करते हुए जस्टिस निगम ने पाया कि नियुक्ति प्राधिकारी ने अपने स्वतंत्र विवेक का प्रयोग नहीं किया और केवल प्रशासनिक अधिकारियों की रिपोर्ट को आधार बना लिया।
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“विपक्षी संख्या 3 ने केवल जिलाधिकारी, कुशीनगर और पुलिस अधीक्षक, कुशीनगर की सिफारिश को स्वीकार कर लिया है और याची की उम्मीदवारी पर स्वतंत्र रूप से ऐसा कोई निष्कर्ष दर्ज नहीं किया है कि क्या मामूली प्रकृति के आपराधिक मामले के लंबित रहने मात्र से शासनादेश दिनांक 28.04.1958 के अनुसार याची को नियुक्त न करना उचित होगा। नियुक्ति प्राधिकारी को अपने समक्ष प्रस्तुत रिपोर्टों पर विचार करने के बाद एक स्वतंत्र निर्णय लेना होता है। वर्तमान मामले में विपक्षी संख्या 3 द्वारा ऐसा कोई विचार नहीं किया गया है।”
आपराधिक आरोपों की वस्तुस्थिति पर गौर करते हुए कोर्ट ने कहा:
“यह न्यायालय यह भी संज्ञान ले सकता है कि एफआईआर के अवलोकन से पता चलता है कि याची के विरुद्ध आबकारी अधिनियम की धारा 60 के तहत मामला दर्ज किया गया था और पुलिस द्वारा की गई जब्ती का कोई स्वतंत्र गवाह नहीं था। विपक्षी द्वारा जिस दूसरे मामले पर भरोसा जताया गया है वह एक एनसीआर है, जिसकी पुलिस द्वारा कभी विवेचना ही नहीं की गई और इसलिए, याची को चरित्र प्रमाण पत्र न जारी करने के लिए इसका कोई उपयोग नहीं किया जा सकता।”
प्रशासनिक विवेक की न्यायिक समीक्षा के दायरे को स्पष्ट करते हुए कोर्ट ने आगे कहा:
“यह न्यायालय इस तथ्य से अवगत है कि उम्मीदवार की उपयुक्तता का आकलन करना नियुक्ति प्राधिकारी का अनन्य अधिकार क्षेत्र है और एक बार जब कानून के स्थापित सिद्धांतों पर उम्मीदवार की उपयुक्तता का आकलन कर लिया जाता है, तो इस न्यायालय को नियुक्ति प्राधिकारी के विवेक में तब तक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए जब तक कि उक्त विवेक का प्रयोग मनमाने ढंग से न किया गया हो। वर्तमान मामले में, विवादित आदेश जिलाधिकारी, कुशीनगर द्वारा की गई सिफारिश के आधार पर पारित किया गया है। विपक्षी संख्या 3 ने एफआईआर में याची के विरुद्ध लगाए गए आरोपों की प्रकृति और इस तथ्य पर कोई विचार नहीं किया है कि एफआईआर 30.05.2021 को दर्ज की गई थी और पाँच वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद भी मुकदमा समाप्त नहीं हुआ है तथा याची को उक्त मामले में 16.05.2025 को जमानत भी मिल चुकी है। तथ्यों के ऐसे परिप्रेक्ष्य में, यह न्यायालय पाता है कि आपराधिक मामले के आधार पर याची को नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता, विशेषकर तब जब विवादित आदेश बिना विचार किए पारित किया गया हो।”
निर्णय
हाईकोर्ट ने पुलिस अधीक्षक, मऊ द्वारा पारित 26 अगस्त 2025 के आदेश को कानून की नजर में टिकने योग्य न मानते हुए निरस्त कर दिया और रिट याचिका स्वीकार कर ली। कोर्ट ने नियुक्ति प्राधिकारी को निर्देश दिया कि वह आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने की तिथि से दो माह के भीतर सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट की टिप्पणियों के आलोक में याची की उम्मीदवारी पर नए सिरे से विधिसम्मत निर्णय पारित करे।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: सूरज कन्नौजिया बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व 3 अन्य
वाद संख्या: रिट-ए संख्या 8280/2026
पीठ: जस्टिस मनीष कुमार निगम
निर्णय की तिथि: 30 सितंबर 2026

