करंट लगने से मौत पर मुआवजे का दावा खारिज करने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम के एमडी को किया तलब

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बिजली विभाग द्वारा अति-तकनीकी आपत्तियों का हवाला देकर करंट लगने से हुई मौत के मामले में मुआवजे के दावे को खारिज करने पर सख्त रुख अपनाया है। हाईकोर्ट ने पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर (एमडी) को 13 जुलाई 2026 को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने का निर्देश दिया है। जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस सुधांशु चौहान की खंडपीठ ने बिजली विभाग द्वारा एक वैध दावे को बेहद लापरवाही से खारिज करने और इसके बाद अदालत में विभाग के वकील के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला फूलचंद्र द्वारा दायर एक रिट याचिका से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने प्रतिवादी-निगम के अधिकारियों (प्रतिवादी संख्या 2) द्वारा 13 मार्च 2026 को जारी एक आदेश को चुनौती दी थी। इस आदेश के जरिए निगम ने 25 सितंबर 2021 के एक सरकारी ऑफिस मेमोरेन्डम (कार्यालय ज्ञाप) के तहत मुआवजे के दावे को खारिज कर दिया था। इस मेमोरेन्डम का मुख्य उद्देश्य बिजली प्रतिष्ठानों की लापरवाही या खराबी के कारण होने वाले हादसों में जान गंवाने वाले या घायल होने वाले लोगों के परिवारों को तत्काल वित्तीय राहत प्रदान करना है।

बिजली निगम ने फूलचंद्र के दावे को केवल इस तकनीकी आधार पर खारिज कर दिया था कि मृतक शिव कुमार गुप्ता निगम का कर्मचारी नहीं था। हालांकि, वाराणसी के विद्युत सुरक्षा विभाग के उप निदेशक की जांच रिपोर्ट में साफ तौर पर दर्ज था कि मृतक शिव कुमार गुप्ता, बिजली विभाग के संविदा कर्मचारी और जूनियर इंजीनियर हनुमान प्रसाद पटेल के सीधे निर्देश पर बिजली की खराबी ठीक करने के लिए खंभे पर चढ़ा था। इस जांच रिपोर्ट के आधार पर उप निदेशक ने मृतक के परिजनों को उचित मुआवजा देने की सिफारिश की थी।

पक्षकारों की दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि उप निदेशक की रिपोर्ट से यह पूरी तरह साबित होता है कि मृतक ने निगम के ही एक कर्मचारी के निर्देश पर जोखिम भरा काम किया था, इसलिए उसका परिवार 2021 के ऑफिस मेमोरेन्डम के तहत मुआवजा पाने का हकदार है।

दूसरी तरफ, सुनवाई के दौरान बिजली निगम का कानूनी रुख लगातार बदलता रहा। 2 जुलाई 2026 को निगम के मुख्य वकील की जगह उपस्थित एक जूनियर एडवोकेट नितेश कुमार पटेल ने अदालत को आश्वस्त किया था कि विभाग याचिकाकर्ता को ऑफिस मेमोरेन्डम के अनुसार 7,50,000 रुपये का मुआवजा देने के लिए तैयार है।

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लेकिन अगली सुनवाई में मुख्य पैनल वकील उदित चंद्र अपने जूनियर सहयोगी के इस बयान से मुकर गए और मामले की मेरिट पर बहस शुरू कर दी। उन्होंने दावा किया कि हाईकोर्ट ने जांच रिपोर्ट को गलत समझा है और असल में यह रिपोर्ट निगम के पक्ष में है। उन्होंने कई कानूनी आपत्तियां उठाईं:

  1. विद्युत अधिनियम की धारा 161 के तहत विद्युत निरीक्षक को केवल जांच रिपोर्ट सौंपने का अधिकार है, मुआवजा देने की सिफारिश करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
  2. हनुमान प्रसाद पटेल निगम के नियमित कर्मचारी नहीं थे, इसलिए उन्हें मृतक को पोल पर चढ़ने का निर्देश देने का कोई अधिकार नहीं था।
  3. भारतीय विद्युत नियमावली 1956 के नियम 36 के तहत बिजली का शटडाउन केवल अधिकृत अधिकारी के अनुरोध पर ही किया जा सकता है। चूंकि मौके पर कोई अधिकृत अधिकारी मौजूद नहीं था, इसलिए विभाग की ओर से कोई शटडाउन नहीं किया जा सकता था। इस आधार पर दावे को खारिज करने में कुछ भी गलत नहीं था।
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हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने बिजली निगम की इन सभी दलीलों को खारिज करते हुए इन्हें “पूरी तरह से गलत” करार दिया।

खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि बिजली विभाग ने विद्युत सुरक्षा विभाग के उप निदेशक की रिपोर्ट की प्रामाणिकता या सत्यता पर कभी कोई सवाल नहीं उठाया है। यह मानते हुए भी कि उप निदेशक के पास मुआवजे की सिफारिश करने का औपचारिक अधिकार नहीं था, रिपोर्ट में साफ दर्ज है कि मृतक, विभाग के संविदा जूनियर इंजीनियर हनुमान प्रसाद पटेल के निर्देश पर खंभे पर चढ़ा था। कोर्ट ने माना कि जब एक सक्षम अधिकारी ने इस तरह का स्पष्ट निष्कर्ष दर्ज किया है, तो निगम यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता कि पटेल उसका कर्मचारी नहीं था।

शटडाउन की अनुमति न होने से जुड़ी तकनीकी दलील पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा कि ऐसी दलीलों का इस दुखद घटना से कोई लेना-देना नहीं है। खंडपीठ ने गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा:

“हम आगे यह दर्ज करते हैं कि वर्तमान मामले के तथ्यों से कोई संबंध न रखने वाले ऐसे अति-तकनीकी आधारों पर मुआवजा देने से इनकार करने में प्रतिवादी-निगम का आचरण पूरी तरह से असंवेदनशील और अनुचित है।”

हाईकोर्ट ने विद्युत सुरक्षा विभाग की हिंदी में लिखी गई जांच रिपोर्ट का भी हवाला दिया। रिपोर्ट के अनुसार, यह हादसा जौनपुर के प्राथमिक विद्यालय रखौली के परिसर में भारतीय विद्युत नियमावली 1956 के नियम 36(2) का पालन न करने के कारण हुआ था। रिपोर्ट में स्पष्ट था कि संविदाकर्मी हनुमान प्रसाद पटेल ने बिना शटडाउन लिए मृतक को बिजली ठीक करने के लिए खंभे पर चढ़ाया, जिससे करंट लगने से उसकी मौत हो गई।

हाईकोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने इस संवेदनशील मामले को बिजली विभाग द्वारा जिस तरह से संभाला, उस पर गहरा असंतोष व्यक्त किया। अदालत ने कहा:

“यह कोर्ट उस ढीले और लापरवाही भरे तरीके पर अपनी गंभीर चिंता व्यक्त करता है जिससे प्रतिवादी-निगम ने इस संवेदनशील मुद्दे को संभाला है।”

इसके बाद कोर्ट ने पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर को 13 जुलाई 2026 को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में पेश होकर यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया कि विभाग के अधिकारी इस तरह के मामलों में इतना गैर-जिम्मेदाराना और संवेदनहीन रवैया कैसे अपना सकते हैं।

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने प्रतिवादी के वकील के आचरण की भी कड़ी निंदा की। कोर्ट ने दर्ज किया कि जब आदेश लिखाया जा चुका था, तब बिजली विभाग के वकील ने आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालत उनसे “बंदूक की नोक पर” आदेश का पालन करवा रही है। कोर्ट ने कहा कि एक वकील, जो कि अदालत का अधिकारी होता है, उसके मुंह से ऐसी टिप्पणी की गरिमा और औचित्य को समझना मुश्किल है। कोर्ट ने अगली सुनवाई टालने के वकील के अनुरोध को भी यह कहते हुए ठुकरा दिया कि अदालतें वकीलों की सुविधा के अनुसार तारीखें तय नहीं कर सकतीं।

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मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: फूलचंद्र बनाम पूर्वांचल विद्युत वितरण लिमिटेड (डी.एल.डब्ल्यू.) भिखारीपुर वाराणसी एवं अन्य

वाद संख्या: रिट-सी संख्या 15130/2026

पीठ: जस्टिस सरल श्रीवास्तव, जस्टिस सुधांशु चौहान

निर्णय की तिथि: 8 जुलाई, 2026

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