छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक बड़ा निर्णय लेते हुए 14 साल की एक नाबालिग बलात्कार पीड़िता को 28 हफ्ते से अधिक का गर्भ गिराने की अनुमति दे दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी नाबालिग को उसकी इच्छा के विरुद्ध अनचाहे गर्भ को रखने के लिए मजबूर करना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले उसके जीवन, गरिमा, निजता और शारीरिक स्वायत्तता के अधिकारों का हनन है। जस्टिस अमितेन्द्र किशोर प्रसाद ने 3 जुलाई को इस मामले पर फैसला सुनाते हुए कहा कि पीड़िता को गर्भ जारी रखने के लिए मजबूर करना उसे और अधिक मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना देने जैसा होगा।
संविधान और कानून के तहत अधिकार
हाईकोर्ट ने मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) कानून का हवाला देते हुए कहा कि कानून खुद यह मानता है कि बलात्कार के कारण ठहरा गर्भ किसी भी महिला के मानसिक स्वास्थ्य को गहरी चोट पहुंचाता है। कोर्ट ने कहा कि चूंकि 14 वर्षीय पीड़िता ने खुद अपनी मर्जी से गर्भपात कराने की इच्छा जताई है, इसलिए इस प्रक्रिया में कोई कानूनी बाधा नहीं होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का जिक्र करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि विशेष परिस्थितियों में, खासकर नाबालिगों और यौन शोषण की पीड़िताओं के मामलों में, संवैधानिक अदालतों को तय समय-सीमा के बाद भी गर्भपात की अनुमति देने का पूरा अधिकार है।
मेडिकल रिपोर्ट और सरकार का रुख
यह मामला तब हाईकोर्ट पहुंचा जब पीड़िता का गर्भ तय कानूनी सीमा को पार कर गया था। कोर्ट ने स्थिति की संवेदनशीलता को देखते हुए 29 जून को एक मेडिकल बोर्ड का गठन कर लड़की की स्वास्थ्य जांच के निर्देश दिए थे।
1 जुलाई को पेश की गई मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट में बताया गया कि लड़की 28 हफ्ते और पांच दिन की गर्भवती है। हालांकि बोर्ड ने माना कि लड़की शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ है, लेकिन इतनी गंभीर स्थिति में गर्भपात कराने से संक्रमण, अत्यधिक रक्तस्राव और चोट का खतरा रहता है। इसके बावजूद, डॉक्टरों ने आगाह किया कि गर्भ को बनाए रखने से लड़की को अधिक शारीरिक और मानसिक पीड़ा झेलनी पड़ेगी। राज्य सरकार ने भी इस याचिका का समर्थन किया और कहा कि गर्भपात की अनुमति न मिलने से नाबालिग के मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुंचेगा।
पेट दर्द के बाद पता चली थी गर्भावस्था
याचिका के अनुसार, दिसंबर 2025 में नाबालिग का अपहरण कर उसका यौन शोषण किया गया था। धमकी मिलने के कारण उसने इस घटना के बारे में अपने परिवार को कुछ नहीं बताया।
जून 2026 में जब अचानक उसके पेट में तेज दर्द हुआ और उसे अस्पताल ले जाया गया, तब इस गर्भावस्था का खुलासा हुआ। अल्ट्रासाउंड में सच सामने आने के बाद परिवार ने पुलिस से संपर्क किया, जिसके बाद भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) और पोक्सो (POCSO) एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया।
सुरक्षित इलाज और सबूत सुरक्षित रखने के निर्देश
याचिका को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि नाबालिग को एक हफ्ते के भीतर किसी सरकारी या जिला अस्पताल में भर्ती कराया जाए। कोर्ट ने निर्देश दिया कि यह जटिल प्रक्रिया डॉक्टरों की एक विशेषज्ञ टीम द्वारा की जाएगी, जिसमें कम से कम दो स्त्री रोग विशेषज्ञ और एक सर्जन शामिल होने चाहिए। इसके लिए पीड़िता की सहमति के साथ-साथ उसके पिता या अभिभावक की मंजूरी लेना भी अनिवार्य किया गया है।
इसके अलावा, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) को पूरी प्रक्रिया की निगरानी करने, एम्बुलेंस सुविधा देने और लड़की की गोपनीयता बनाए रखते हुए उसका इलाज सुनिश्चित करने को कहा गया है। चल रही आपराधिक जांच में मदद के लिए डॉक्टरों को भ्रूण के टिशू और डीएनए सैंपल सुरक्षित रखने के भी निर्देश दिए गए हैं। अस्पताल को इस प्रक्रिया के पूरा होने के बाद हाईकोर्ट में अपनी अनुपालन रिपोर्ट पेश करनी होगी।

