मद्रास हाईकोर्ट ने एक इंजीनियरिंग कॉलेज की मान्यता और स्वायत्तता की जांच की मांग करने वाली जनहित याचिका (पीआईएल) को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जनहित याचिकाएं केवल डिजिटल गपशप और सोशल मीडिया पर तैर रही अपुष्ट खबरों के आधार पर दाखिल नहीं की जा सकती हैं। हाईकोर्ट ने कहा कि जनहित याचिका दायर करने वाले व्यक्ति को एक सजग शोधकर्ता होना चाहिए, न कि इंटरनेट पर उपलब्ध अधूरी जानकारियों को इकट्ठा करने वाला शख्स।
यह आदेश चीफ जस्टिस सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और जस्टिस जी अरुल मुरुगन की खंडपीठ ने 3 जुलाई को डी राधाकृष्णन की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिकाकर्ता ने श्री वेंकटेश्वर कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी को मिली स्वायत्तता (ऑटोनॉमस स्टेटस) और संबद्धता की जांच के लिए नियामक अधिकारियों की एक स्वतंत्र समिति गठित करने की मांग की थी।
याचिकाकर्ता के दावों में बड़ा विरोधाभास
अदालत में याचिकाकर्ता का पक्ष वरिष्ठ वकील आर शणमुगसुंदरम ने रखा। उन्होंने कॉलेज में कथित गड़बड़ियों के प्रमाण के रूप में अखबारों की कतरनें, यूट्यूब वीडियो, साल 2025 की एक एफआईआर और सतर्कता और भ्रष्टाचार निरोधक निदेशालय (डीवीएसी) की जांच का हवाला दिया था।
हालांकि, हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के इस रुख में गंभीर विरोधाभास पाया। कोर्ट ने रेखांकित किया कि राधाकृष्णन ने अप्रैल 2026 में पहले तो संबंधित अधिकारियों से कॉलेज की मान्यता तुरंत वापस लेने की मांग की थी, लेकिन बाद में वे इसी मांग को बदलकर जांच कमेटी गठित कराने के अनुरोध के साथ हाईकोर्ट पहुंच गए। कोर्ट ने कहा कि कोई भी व्यक्ति पहले सीधे तौर पर सख्त कार्रवाई की मांग करे और फिर अदालत में आकर पूरी तरह से अपना रुख बदलते हुए जांच कमेटी की मांग करने लगे, यह तरीका स्वीकार्य नहीं है।
मामले को सनसनीखेज बनाने का प्रयास
खंडपीठ ने सबूतों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए कहा कि याचिकाकर्ता ने बिना किसी स्वतंत्र और व्यक्तिगत जांच-पड़ताल के केवल यूट्यूब संदर्भों और अखबारों की खबरों को इकट्ठा करके अदालत के सामने पेश कर दिया।
कोर्ट ने आगे कहा कि चूंकि इस मामले की आपराधिक जांच सतर्कता और भ्रष्टाचार निरोधक निदेशालय (डीवीएसी) द्वारा पहले से ही की जा रही है, इसलिए यह पूरा विषय अभी अदालत के समक्ष विचाराधीन (सब-जुडिस) है। ऐसे में याचिका दायर करना कानून सम्मत प्रक्रिया को बेवजह सनसनीखेज बनाने की कोशिश जैसा है, न कि जनहित का कोई वास्तविक कार्य।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि बिना किसी स्वतंत्र और सत्यापित शोध के दायर की जाने वाली जनहित याचिकाओं को शुरुआती स्तर पर ही कड़ाई से खारिज कर दिया जाना चाहिए। हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ता पर कोई मुकदमा खर्च या जुर्माना नहीं लगाया।

