जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए छह साल की बच्ची की अंतरिम कस्टडी दोबारा उसकी मां को सौंपने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने निचली अदालत के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें पिता के इस दावे को आधार बनाकर कस्टडी उसे सौंप दी गई थी कि मां ने कस्टडी हासिल करने के लिए झूठे आरोप लगाए हैं। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि माता-पिता के आपसी कानूनी विवादों और बिना साबित हुए आरोपों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण बच्चे की मानसिक स्थिरता और उसका सुरक्षित भविष्य है।
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस संजय परिहार ने कहा कि जब तक कोई बहुत गंभीर परिस्थिति न हो, बच्चे की कस्टडी में बार-बार या अचानक बदलाव नहीं किया जाना चाहिए। ऐसा करने से बच्चे के मानसिक और भावनात्मक विकास पर बुरा असर पड़ सकता है। कोर्ट ने साफ किया कि माता-पिता के एक-दूसरे पर लगाए जा रहे आरोपों की तुलना में बच्चे की कोमल उम्र, उसकी सुरक्षा की भावना और मानसिक स्थिरता सबसे ज्यादा मायने रखती है।
अदालत ने 2 जुलाई को दिए अपने आदेश में बच्ची के साथ हुई बातचीत का भी जिक्र किया। अदालत ने बच्ची को बुद्धिमान, खुशमिजाज और सहयोगी बताते हुए कहा कि हालांकि छह साल की बच्ची की इच्छा को अंतिम नहीं माना जा सकता, लेकिन इस बातचीत से कोर्ट को बच्चे की भावनात्मक स्थिति, उसकी सुरक्षा की भावना और उसके समग्र कल्याण को समझने में मदद मिली। कोर्ट के अनुसार, जीवन के इस शुरुआती पड़ाव पर बच्चे की पढ़ाई की निरंतरता, भावनात्मक स्थिरता और एक प्यार भरा माहौल बेहद जरूरी होता है।
बच्ची की कस्टडी को लेकर लंबा विवाद
इस कस्टडी विवाद की शुरुआत एक टूटते वैवाहिक रिश्ते से हुई। याचिकाकर्ता महिला और पुरुष की मुलाकात साल 2013 में हुई थी, जिसके बाद उन्होंने 2015 में हिंदू रीति-रिवाजों से आर्य समाज मंदिर में विवाह किया। इसके बाद साल 2019 में दोनों का निकाह भी हुआ। साल 2023 में दोनों के बीच वैवाहिक मतभेद शुरू हो गए, जिसके बाद वे अलग हो गए और अपनी बेटी की कस्टडी को लेकर दोनों के बीच कानूनी जंग छिड़ गई।
आपसी विवाद बढ़ने पर दोनों ने एक-दूसरे के खिलाफ कई कानूनी मामले दर्ज कराए। विवाद तब और गहरा गया जब महिला ने 20 अक्टूबर 2024 को अपने पति के खिलाफ वैवाहिक बलात्कार (मैरिटल रेप) की प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराई। इससे पहले, महिला ने 31 मई 2024 को गार्जियन एंड वार्ड्स एक्ट के तहत याचिका दायर कर बच्ची की कानूनी गार्जियन बनने की मांग की थी, क्योंकि उन्हें डर था कि पिता बच्ची को जबरन ले जा सकते हैं।
इसके बाद, 14 अगस्त 2024 को पिता पर बच्ची को जबरन अपने साथ ले जाने और उसे छिपाने का आरोप लगा। मां की शिकायत पर पुलिस ने बच्ची को बरामद कर बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) के सामने पेश किया, जिसने 8 नवंबर 2024 को बच्ची की कस्टडी दोबारा मां को सौंप दी।
निचली अदालत के फैसले में सुधार
इस मामले में नया मोड़ तब आया जब 28 अगस्त 2025 को एक निचली अदालत ने बच्ची की अंतरिम कस्टडी पिता को सौंपने का आदेश दे दिया। निचली अदालत का मानना था कि मां ने तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया और कस्टडी पाने के लिए कानून का दुरुपयोग करते हुए पति पर झूठे आरोप लगाए। पिता के वकील एडवोकेट वीरेंद्र देव सिंह ने भी दलील दी थी कि महिला ने केवल बच्ची पर अपना नियंत्रण बनाए रखने के लिए इन आपराधिक मामलों को ढाल बनाया।
इस फैसले के खिलाफ मां के वकील एडवोकेट शयान चौहान ने हाईकोर्ट में अपील दायर की। उन्होंने तर्क दिया कि निचली अदालत इस गलत धारणा पर आगे बढ़ी कि मां के आरोप झूठे हैं, जबकि अभी पुलिस जांच पूरी भी नहीं हुई थी। उन्होंने कोर्ट को याद दिलाया कि बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) ने खुद बच्ची से बात करने के बाद उसकी कस्टडी मां को दी थी, क्योंकि बच्ची अपनी मां के साथ पूरी तरह सुरक्षित और खुश थी। उन्होंने आरोप लगाया कि निचली अदालत बच्ची की उम्र, उसके जेंडर और उसके कल्याण को प्राथमिकता देने में नाकाम रही।
हाईकोर्ट ने मां के वकील की दलीलों से सहमति जताई। जस्टिस परिहार ने स्पष्ट किया कि गार्जियन एंड वार्ड्स एक्ट के तहत अदालतों को माता-पिता के रूप में (पेरेंस पैट्रिए) सुरक्षात्मक भूमिका निभानी चाहिए, न कि लंबित मुकदमों के आधार पर किसी एक पक्ष को दोषी मानकर फैसला करना चाहिए। हाईकोर्ट ने कहा कि जांच जारी रहने के दौरान निचली अदालत के पास मां की शिकायत को झूठा मानने का कोई कानूनी आधार नहीं था। अदालत ने मां को अंतरिम कस्टडी सौंपते हुए निचली अदालत को निर्देश दिया कि वह पिता के लिए बच्ची से मिलने का एक उचित समय तय करे।

