जेल में बंद रहने के दौरान भी खत्म नहीं होते संपत्ति के अधिकार, कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा- अंडरट्रायल कैदी की नहीं होती नागरिक मृत्यु

कर्नाटक हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी आपराधिक मामले में विचाराधीन (अंडरट्रायल) रहते हुए जेल में बंद होने मात्र से कोई व्यक्ति अपनी संपत्ति के प्रबंधन या उसे ट्रांसफर करने के नागरिक अधिकारों से वंचित नहीं हो जाता। अदालत ने साफ तौर पर कहा कि संसद द्वारा दिए गए वैधानिक अधिकारों को केवल प्रशासनिक असुविधा का बहाना बनाकर खारिज नहीं किया जा सकता।

जस्टिस सचिन शंकर मगादुम ने इस संबंध में दायर याचिका को स्वीकार करते हुए स्थानीय सब-रजिस्ट्रार को निर्देश दिया कि वे खुद धारवाड़ सेंट्रल जेल जाएं और वहां बंद कैदी की संपत्ति का रजिस्ट्रेशन पूरा कराएं। अदालत ने 23 जून को दिए अपने आदेश में कहा कि सब-रजिस्ट्रार जेल के नियमों और सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन करते हुए आरोपी के हस्ताक्षर प्राप्त करें और रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1908 की धारा 38(1)(बी) और धारा 38(2) के तहत जरूरी प्रक्रिया पूरी करें।

यह मामला बसवराज शंकरप्पा अव्वन्नावर नामक एक विचाराधीन कैदी से जुड़ा है, जो अपनी सास की हत्या और पत्नी की जान लेने की कोशिश के आरोप में फरवरी 2025 से धारवाड़ सेंट्रल जेल में बंद है। अव्वन्नावर ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर मांग की थी कि जेल अधीक्षक को निर्देश दिया जाए कि वे सब-रजिस्ट्रार को रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया के लिए जेल परिसर के भीतर आने की अनुमति दें।

कानून के अनुसार, रजिस्ट्रेशन एक्ट की धारा 38 कैदियों या गंभीर रूप से बीमार लोगों को रजिस्ट्री कार्यालय में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने से छूट देती है। ऐसी स्थिति में संबंधित रजिस्ट्री अधिकारी को खुद जेल या उस व्यक्ति के निवास स्थान पर जाकर आवश्यक सत्यापन करना होता है।

कैदी की नहीं होती ‘सिविल डेथ’

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कैदी के वकील संकेत शंकरप्पा अंबाली ने अदालत में दलील दी थी कि केवल हिरासत में रहने के कारण उनके मुवक्किल के संपत्ति संबंधी अधिकार खत्म नहीं हो जाते। हाईकोर्ट ने इस तर्क को सही माना।

अदालत ने रेखांकित किया कि शारीरिक अक्षमता के कारण रजिस्ट्री कार्यालय न जा पाने का यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि व्यक्ति को उसकी संपत्ति के लेनदेन के कानूनी हक से दूर कर दिया जाए। जस्टिस मगादुम ने कहा कि आपराधिक मुकदमे का सामना कर रहे या जेल में बंद किसी भी व्यक्ति को ‘सिविल डेथ’ यानी मृत नागरिक नहीं माना जा सकता। जब तक अदालत से सजा न हो जाए, तब तक ट्रायल के दौरान उसकी चल या अचल संपत्ति पर उसका मालिकाना हक बना रहता है। जेल प्रशासन और सुरक्षा के लिए जरूरी कानूनी पाबंदियों को छोड़कर, उसके बाकी नागरिक अधिकार पूरी तरह सुरक्षित रहते हैं।

अदालत ने आगे स्पष्ट किया कि एक विचाराधीन कैदी के पास भी अपनी संपत्ति को बेचने, ट्रांसफर करने या उस पर फैसला लेने के वे सभी अधिकार मौजूद रहते हैं जो एक सामान्य नागरिक के पास होते हैं। केवल जेल में बंद होने के आधार पर इन अधिकारों को निरर्थक नहीं बनाया जा सकता।

जेल प्रशासन की ढिलाई पर अदालत सख्त

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मामले की सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि संबंधित सब-रजिस्ट्रार ने पहले ही जेल अधिकारियों को पत्र लिखकर रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया पूरी करने में सहयोग का अनुरोध किया था। हालांकि, जेल प्रशासन ने अदालत में स्वीकार किया कि इस पत्र को गलती से सक्षम प्राधिकारी के समक्ष प्रस्तुत ही नहीं किया गया था।

इस पर नाराजगी व्यक्त करते हुए जस्टिस मगादुम ने कहा कि जब क्षेत्राधिकार के सब-रजिस्ट्रार ने खुद जेल जाने की सहमति दे दी थी, तो जेल प्रशासन का यह कानूनी दायित्व था कि वह सुरक्षा नियमों के तहत सहयोग प्रदान करे। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक कठिनाइयों को आगे रखकर संसद द्वारा कानून के तहत दिए गए अधिकारों को खत्म नहीं किया जा सकता।

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