सार्वजनिक स्थानों पर पोर्न देखने पर रोक की याचिका खारिज, सुप्रीम कोर्ट ने कहा – यह नीतिगत मामला

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सार्वजनिक स्थानों पर पोर्न देखने और इस पर प्रतिबंध लगाने के लिए देशव्यापी नीति बनाने की मांग वाली एक जनहित याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह मुद्दा पूरी तरह से नीतिगत और तकनीकी है, जिसमें न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। अदालत ने याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वे इस विषय पर अपनी मांग और सुझाव सीधे संबंधित सरकारी अधिकारियों के सामने रखें।

तकनीकी और विशेषज्ञता का विषय

सुनवाई के दौरान अदालत ने स्वीकार किया कि याचिका में उठाया गया मुद्दा बेहद गंभीर और महत्वपूर्ण है। हालांकि, पीठ का मानना था कि इस विषय में कोई ऐसा कानूनी सवाल शामिल नहीं है जिस पर अदालत को विचार करना पड़े। जजों ने कहा कि सार्वजनिक स्थानों पर पोर्न देखने से रोकने और इस पर नियंत्रण लगाने के लिए जटिल नीतिगत फैसले, आधुनिक तकनीकी विकास और विशेषज्ञों की राय की जरूरत होती है। अदालत के अनुसार, यह कार्य पूरी तरह से सरकारी विशेषज्ञों और विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में आता है।

यह याचिका सामाजिक कार्यकर्ता बी एल जैन की ओर से दायर की गई थी, जिनकी पैरवी कोर्ट में अधिवक्ता वरुण ठाकुर ने की। याचिका में मांग की गई थी कि सरकार सार्वजनिक स्थानों पर अश्लील सामग्री देखने पर पूरी तरह से रोक लगाए। इसके साथ ही, नाबालिगों को ऐसी सामग्री से दूर रखने के लिए एक राष्ट्रीय नीति और व्यापक कार्य योजना तैयार की जाए।

बढ़ते अपराध और इंटरनेट के आंकड़े

याचिकाकर्ता ने इंटरनेट पर पोर्नोग्राफी से जुड़े कुछ चौंकाने वाले आंकड़े भी अदालत के सामने रखे। याचिका में दावा किया गया कि दुनिया भर में हर सेकंड लगभग 5,000 पोर्न वेबसाइट्स देखी जाती हैं और इंटरनेट पर रोजाना दो करोड़ से अधिक नए वीडियो या क्लिपिंग अपलोड की जाती हैं।

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याचिका में दलील दी गई कि इंटरनेट की आसान पहुंच के कारण लोगों में अश्लील सामग्री देखने की लत तेजी से बढ़ रही है, जिससे समाज में यौन अपराधों में बढ़ोतरी हो रही है। इसके अलावा, याचिका में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 69ए का भी उल्लेख किया गया। याचिकाकर्ता का तर्क था कि इस कानून के तहत केंद्र सरकार के पास किसी भी कंप्यूटर संसाधन के माध्यम से दिखाई जाने वाली जानकारी या वेबसाइटों पर प्रतिबंध लगाने की पूरी कानूनी शक्ति है।

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