असम नागरिकता विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने पांच महिलाओं को विदेशी घोषित करने पर राज्य सरकार से दो हफ्ते में मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने असम सरकार को एक बड़ा निर्देश देते हुए पांच महिलाओं को ‘अवैध विदेशी’ घोषित करने के फैसले पर स्पष्टीकरण मांगा है। अदालत ने राज्य सरकार को इस मामले में अपना पक्ष रखने और हलफनामा दाखिल करने के लिए दो हफ्ते का समय दिया है।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। असम सरकार की ओर से पेश वकील ने कोर्ट से जवाब दाखिल करने के लिए और समय देने का अनुरोध किया था, जिसे स्वीकार करते हुए कोर्ट ने दो सप्ताह की मोहलत दे दी। अब इस मामले की अगली सुनवाई दो हफ्ते बाद होगी।

यह निर्देश सुप्रीम कोर्ट के 5 जून के उस अंतरिम आदेश के बाद आया है, जिसमें कोर्ट ने इन पांचों महिलाओं के देश से निकाले जाने (डेपॉर्टेशन) पर रोक लगा दी थी। कोर्ट फिलहाल गुवाहाटी हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर अपीलों पर विचार कर रहा है।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकील ने अदालत को बताया कि पांच में से दो महिलाएं इस समय हिरासत (डिटेंशन) में हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के यथास्थिति बनाए रखने के आदेश के कारण उनकी देश-निकासी की प्रक्रिया रुकी हुई है।

गुवाहाटी हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती

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यह पूरा मामला तब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा जब गुवाहाटी हाईकोर्ट ने इन पांचों महिलाओं की याचिकाओं को खारिज कर दिया था। याचिकाकर्ताओं ने फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के उन फैसलों को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिनमें उन्हें बांग्लादेश से भारत में अवैध रूप से प्रवेश करने वाला विदेशी नागरिक घोषित किया गया था।

नागरिकता जांच की प्रक्रिया हो निष्पक्ष और पारदर्शी

सुनवाई के दौरान एक याचिकाकर्ता के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के ही 13 जुलाई के एक महत्वपूर्ण फैसले का उल्लेख किया। इस फैसले में अदालत ने कहा था कि किसी भी व्यक्ति की नागरिकता का निर्धारण हमेशा एक निष्पक्ष, कानूनी और तर्कसंगत प्रक्रिया के माध्यम से ही होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने 13 जुलाई के अपने फैसले में गुवाहाटी हाईकोर्ट के उन पुराने निर्णयों को निरस्त कर दिया था, जिनमें लोगों को विदेशी घोषित करने के ट्रिब्यूनल के फैसलों पर मुहर लगाई गई थी। शीर्ष अदालत ने संबंधित ट्रिब्यूनलों को निर्देश दिया था कि वे हाईकोर्ट या खुद के पुराने बयानों से प्रभावित हुए बिना, इन मामलों की नए सिरे से निष्पक्ष जांच करें।

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अदालत ने माना था कि राज्य सरकार का यह वैध और जरूरी कर्तव्य है कि वह यह सुनिश्चित करे कि कोई भी व्यक्ति गलत दावों या कानूनी कमियों का फायदा उठाकर अवैध रूप से भारतीय नागरिकता हासिल न कर सके। लेकिन इसके साथ ही कोर्ट ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि नागरिकता जैसी संवेदनशील पहचान की जांच प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी और न्यायसंगत होनी चाहिए।

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