धारा 299 सीआरपीसी | फरार आरोपी के खिलाफ मृत पीड़िता का बयान मजिस्ट्रेट के पूर्व औपचारिक आदेश के बिना भी सबूत के रूप में स्वीकार्य: सुप्रीम कोर्ट

Criminal Procedure (आपराधिक प्रक्रिया) के संबंध में एक महत्वपूर्ण फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाईकोर्ट के एक आदेश को खारिज कर दिया है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पांचोली की पीठ ने यह निर्णय दिया कि सह-आरोपियों के मुकदमे (ट्रायल) के दौरान दर्ज किया गया मृत पीड़िता का बयान, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CRPC) की धारा 299 के तहत बाद में पकड़े गए फरार आरोपी के खिलाफ भी सबूत के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून में ऐसा कोई अनिवार्य प्रावधान नहीं है जो मजिस्ट्रेट के लिए गवाह के बयान दर्ज करने से पहले यह औपचारिक आदेश पारित करना अनिवार्य बनाता हो कि आरोपी फरार है और उसकी जल्द गिरफ्तारी की कोई संभावना नहीं है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 5 फरवरी 2012 को कोलकाता में हुई एक बेहद संवेदनशील घटना से जुड़ा है। रात करीब 12:15 बजे एक महिला को घर छोड़ने का झांसा देकर कार में बैठाया गया। कार में सवार आरोपियों ने पीड़िता को गाड़ी से उतरने नहीं दिया और बंधक बनाकर बंदूक की नोक पर उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया। इसके बाद उसे चलती कार से सड़क किनारे फेंक दिया गया।

पीड़िता की शिकायत पर पुलिस ने सामूहिक दुष्कर्म, मारपीट और अन्य गंभीर धाराओं में प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज की थी। जांच के बाद पुलिस ने गिरफ्तार किए गए तीन सह-आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की, जबकि मुख्य आरोपी और एक अन्य आरोपी को फरार दिखाया गया। गिरफ्तारी न होने के कारण अदालत ने उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट और बाद में उद्घोषणा (प्रोकलेमेशन) जारी की।

कलकत्ता हाईकोर्ट के निर्देश पर फरार आरोपियों का मुकदमा मुख्य मुकदमे से अलग कर दिया गया। जनवरी 2013 में ट्रायल अलग होने के बाद, अदालत ने गिरफ्तार सह-आरोपियों के खिलाफ आरोप तय किए। इस मुकदमे के दौरान पीड़िता ने मार्च से जुलाई 2013 के बीच विस्तृत बयान दर्ज कराए, जिसमें बचाव पक्ष के वकीलों ने उसकी जिरह (क्रॉस-एग्जामिनेशन) भी की थी।

दुखद रूप से, बयान दर्ज होने के बाद मार्च 2015 में पीड़िता का निधन हो गया। इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने हिरासत में लिए गए तीनों सह-आरोपियों को दोषी ठहराते हुए उन्हें दस साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई।

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साल 2016 में, लंबे समय से फरार चल रहे मुख्य आरोपी और उसके साथी को अंततः गिरफ्तार कर लिया गया। उनके खिलाफ पूरक चार्जशीट दाखिल की गई और आरोप तय किए गए। इस नए मुकदमे के दौरान, अभियोजन पक्ष ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 33 के तहत आवेदन देकर मृत पीड़िता के पिछले बयान को इस मुकदमे में भी रिकॉर्ड पर लेने की मांग की। ट्रायल कोर्ट ने 2018 में इसकी अनुमति दे दी। हालांकि, कलकत्ता हाईकोर्ट ने 2022 में इस आदेश को रद्द करते हुए कहा कि धारा 299 सीआरपीसी के तहत अभियोजन पक्ष का यह स्पष्ट कर्तव्य है कि वह पहले अदालत से फरार आरोपी के खिलाफ सबूत दर्ज करने का औपचारिक निर्देश प्राप्त करे, जिसके बिना पुराना बयान स्वीकार्य नहीं माना जा सकता।

पक्षकारों की दलीलें

अपीलकर्ता राज्य सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि धारा 299(1) के तहत पिछले बयानों को स्थानांतरित करने की स्थिति केवल तभी उत्पन्न होती है जब गवाह उपलब्ध न हो। उन्होंने दलील दी कि यह प्रावधान विशेष रूप से उन आरोपियों के खिलाफ सबूतों को सुरक्षित रखने के लिए बनाया गया है जो जानबूझकर मुकदमे से बचने के लिए फरार हो जाते हैं।

दूसरी ओर, प्रतिवादी आरोपी की ओर से पेश वकील ने कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले का समर्थन किया। उन्होंने तर्क दिया कि धारा 299 की प्रक्रियात्मक शर्तों का कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए और पिछले मुकदमे के दौरान बिना किसी औपचारिक आदेश के पुराने बयान को सीधे स्वीकार नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने रेखांकित किया कि सामान्य आपराधिक न्यायशास्त्र में गवाह का परीक्षण आरोपी की उपस्थिति में होना चाहिए, लेकिन सीआरपीसी की धारा 299 इस सामान्य नियम का एक अपवाद है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 299(1) को लागू करने के लिए दो बुनियादी शर्तें पूरी होनी चाहिए: पहली, आरोपी फरार हो चुका हो और दूसरी, उसकी तत्काल गिरफ्तारी की कोई संभावना न हो।

हाईकोर्ट की संकीर्ण व्याख्या को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की:

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“उक्त धारा में ऐसा कोई वैधानिक नियम नहीं है, जो गवाह के बयान दर्ज होने से पहले संबंधित मजिस्ट्रेट द्वारा इस बात का औपचारिक आदेश पारित करना अनिवार्य बनाता हो कि उपर्युक्त दोनों शर्तों का पालन किया गया है। प्रासंगिक यह है कि क्या गवाह के बयान दर्ज होने की तिथि पर ये दोनों आवश्यक शर्तें वास्तव में मौजूद थीं।”

अपने विश्लेषण में सुप्रीम कोर्ट ने कई महत्वपूर्ण न्यायिक दृष्टांतों का भी उल्लेख किया:

  • निर्मल सिंह बनाम हरियाणा राज्य (2000): अदालत ने स्पष्ट किया कि यद्यपि अभियोजन पक्ष को धारा 299 की सभी शर्तों को कड़ाई से साबित करना होगा, लेकिन मुख्य कारक यह है कि बयान दर्ज करते समय वे शर्तें वास्तव में मौजूद थीं या नहीं, न कि न्यायाधीश द्वारा संतुष्टि का कोई औपचारिक आदेश दर्ज किया जाना।
  • सीबीआई बनाम अबू सालेम अंसारी (2011): सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि फरार आरोपी बाद में पकड़ा जाता है और गवाह उपलब्ध नहीं है (जैसे उसकी मृत्यु हो चुकी है), तो अभियोजन पक्ष धारा 299 की पूर्व-शर्तों को साबित करके पिछले मुकदमे में दर्ज बयानों पर भरोसा कर सकता है।
  • फरीदा उर्फ फरीद अहमद बनाम छत्तीसगढ़ राज्य (2016): छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के इस निर्णय का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने माना कि जो आरोपी जानबूझकर मुकदमे से बचता है, वह बाद में गवाहों की अनुपलब्धता या मृत्यु का लाभ उठाकर बरी नहीं हो सकता। ऐसा होने देना हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली के लिए बेहद नुकसानदेह होगा।
  • अब्दुल अजीज बनाम तमिलनाडु राज्य (2025): मद्रास हाईकोर्ट के इस फैसले का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने कहा कि जो आरोपी जानबूझकर अदालती कार्यवाही से दूर रहता है, वह गवाहों से जिरह के अधिकार के हनन का दावा नहीं कर सकता। यह एक वैधानिक अधिकार है, न कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत फरार आरोपी को मिलने वाला कोई पूर्ण मौलिक अधिकार।
  • अफजल बनाम राज्य (2019): दिल्ली हाईकोर्ट के इस फैसले के जरिए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वर्षों बाद पकड़े गए घोषित अपराधी के मामले में मृत पीड़िता के बयान को साक्ष्य के तौर पर पढ़ा जाना पूरी तरह वैध है।
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फैसला सुनाते हुए जस्टिस करोल ने कानून की सीमित या संकीर्ण व्याख्या के खतरों पर चेतावनी देते हुए कहा:

“धारा 299(1) के अध्ययन से स्पष्ट है कि इसका मुख्य उद्देश्य उन मामलों में आरोपी के खिलाफ सबूतों को सुरक्षित रखना है, जहां वह जानबूझकर मुकदमे से भाग गया हो। यह अदालत इस धारा की ऐसी व्याख्या नहीं कर सकती, जो इसके मूल उद्देश्य को ही समाप्त कर दे।”

अदालत ने आगे जोड़ा:

“इसके अलावा, ऐसी संकीर्ण व्याख्या से आरोपियों को लंबे समय तक जानबूझकर फरार रहने और गवाहों की मृत्यु की प्रतीक्षा करने का बढ़ावा मिल सकता है।”

पीठ ने यह भी ध्यान दिलाया कि विधायिका ने हाल ही में लागू की गई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 की धारा 335 में भी इस कानूनी स्थिति को बिना किसी बदलाव के बरकरार रखा है, जो पुरानी सीआरपीसी की धारा 299 के समरूप है।

मौजूदा मामले पर इन सिद्धांतों को लागू करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि अप्रैल 2012 में आरोपी के खिलाफ उद्घोषणा जारी की गई थी और जब 2013 में पीड़िता का बयान दर्ज किया जा रहा था, तब वह फरार था। उसे तीन साल बाद 2016 में गिरफ्तार किया जा सका। चूंकि मार्च 2015 में पीड़िता की मृत्यु हो चुकी थी, इसलिए धारा 299(1) की सभी शर्तें पूरी तरह से संतुष्ट होती हैं।

अदालत का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की अपीलों को स्वीकार करते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट के 6 मई 2022 के फैसले को रद्द कर दिया। इसके साथ ही, कोर्ट ने मृत पीड़िता के बयान को फरार आरोपी के मुकदमे में सबूत के रूप में स्वीकार करने के ट्रायल कोर्ट के आदेश को बहाल कर दिया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: द स्टेट ऑफ वेस्ट बंगाल बनाम कादर खान
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 1164-1166 ऑफ 2023
पीठ: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पांचोली
निर्णय की तिथि: 17 जुलाई, 2026

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