IBC संकट: समाधान योजनाओं में ‘भयानक’ देरी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, स्वतः संज्ञान लेते हुए सुधार के निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) की बेंचों द्वारा समाधान योजनाओं (resolution plans) की मंजूरी में हो रही अत्यधिक देरी पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए इस मामले में स्वतः संज्ञान (suo motu cognisance) लिया है। कोर्ट ने मौजूदा स्थिति को “भयानक” (grim) बताते हुए कहा कि यदि इस पर “युद्ध स्तर” (war footing) पर काम नहीं किया गया, तो इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्ट्सी कोड (IBC) का मूल उद्देश्य ही विफल हो जाएगा। जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस के वी विश्वनाथन की बेंच ने देशभर की NCLT बेंचों में बुनियादी ढांचे और मैनपावर की भारी कमी को इस संकट की मुख्य वजह बताया है।

सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप NCLT की प्रिंसिपल बेंच द्वारा पेश की गई एक रिपोर्ट के बाद आया है। आंकड़ों के अनुसार, देशभर की विभिन्न बेंचों में समाधान योजनाओं की मंजूरी के लिए कुल 383 आवेदन लंबित हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इन मामलों में देरी की अवधि एक महीने से लेकर 700 दिनों से भी अधिक है।

IBC के तहत एक ‘समाधान योजना’ का अर्थ किसी संकटग्रस्त कंपनी को पुनर्गठन या अधिग्रहण के माध्यम से पुनर्जीवित करना होता है। बेंच ने टिप्पणी की कि इस पूरी प्रक्रिया में समय की पाबंदी सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि देरी होने से कंपनी (कॉर्पोरेट ऋणी) की संपत्तियों का मूल्य कम होने लगता है।

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सुनवाई के दौरान बेंच ने स्पष्ट किया कि ट्रिब्यूनल के पास आवश्यक संसाधनों और पर्याप्त कर्मियों की कमी है। कोर्ट ने याद दिलाया कि 16 अप्रैल को हुई पिछली सुनवाई में भी यह बात सामने आई थी कि नई दिल्ली की प्रिंसिपल बेंच सहित कई अन्य क्षेत्रीय बेंचों में आवेदन पिछले कई वर्षों से लंबित पड़े हैं।

इस समस्या की गहराई को समझने के लिए, कोर्ट ने भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (IBBI) को भी एक पक्षकार के रूप में शामिल किया है। IBBI को निर्देश दिया गया है कि वह देश भर के आंकड़े पेश करे और यह बताए कि इन आवेदनों के लंबित रहने के पीछे मुख्य कारण क्या हैं।

बेंच ने अब इस मामले को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत के समक्ष भेजने का निर्देश दिया है, ताकि इसे उचित बेंच को सौंपा जा सके और इस पर निरंतर निगरानी रखी जा सके।

यह पूरा मामला मूल रूप से नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) के 2023 के एक आदेश के खिलाफ दायर दो याचिकाओं से शुरू हुआ था। सुनवाई के दौरान जब कोर्ट ने देखा कि देरी की समस्या केवल एक मामले तक सीमित नहीं बल्कि पूरे तंत्र में व्याप्त है, तो उन्होंने इसे व्यापक जनहित का मुद्दा मानते हुए स्वतः संज्ञान लेने का निर्णय लिया।

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