मद्रास हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: तीसरी गर्भावस्था के लिए भी मिलेगा पूरा मातृत्व अवकाश; 12 हफ्ते की सीमा को बताया ‘अनुचित’

मद्रास हाईकोर्ट ने मातृत्व लाभों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जिसमें कहा गया है कि सरकार बच्चों की संख्या के आधार पर महिला कर्मचारियों के साथ मातृत्व अवकाश देने में भेदभाव नहीं कर सकती। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि तीसरी बार गर्भवती होने वाली महिलाएं भी उसी समान अवकाश की हकदार हैं जो पहली या दूसरी गर्भावस्था के दौरान दिया जाता है। कोर्ट ने सरकार द्वारा तीसरी गर्भावस्था के लिए अवकाश को घटाकर 12 हफ्ते करने के निर्णय को ‘अनुचित’ करार दिया है।

यह मामला शयी निशा (Shayee Nisha) द्वारा दायर एक याचिका से जुड़ा है, जिन्हें उनकी तीसरी गर्भावस्था के लिए पूर्ण मातृत्व लाभ देने से इनकार कर दिया गया था। 27 मार्च, 2026 को विल्लुपुरम के प्रधान जिला न्यायाधीश ने उनकी उस अर्जी को खारिज कर दिया था, जिसमें उन्होंने 2 फरवरी, 2026 से 1 फरवरी, 2027 तक मातृत्व अवकाश की मांग की थी। इसके साथ ही विल्लुपुरम के मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण ने भी उन्हें 27 अप्रैल, 2026 को काम पर वापस लौटने का निर्देश दिया था।

इन फैसलों का आधार 13 मार्च, 2026 को जारी एक सरकारी आदेश (GO) था। इस आदेश में ‘मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961’ के प्रावधानों का हवाला देते हुए तीसरी गर्भावस्था के लिए मातृत्व अवकाश को केवल 12 सप्ताह (तीन महीने) तक सीमित कर दिया गया था।

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जस्टिस आर. सुरेश कुमार और जस्टिस एन. सेंथिल कुमार की डिवीजन बेंच ने सरकार के इस रुख की कड़ी समीक्षा की। कोर्ट ने पाया कि इस तरह की पाबंदियां सुप्रीम कोर्ट और मद्रास हाईकोर्ट के पुराने फैसलों के खिलाफ हैं।

कोर्ट ने कहा कि गर्भावस्था के दौरान होने वाली शारीरिक और भावनात्मक जरूरतें बच्चों की संख्या के साथ नहीं बदलतीं। बेंच ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा:

“चाहे पहली गर्भावस्था हो, दूसरी हो या तीसरी, महिला की पीड़ा और जरूरतें समान रहती हैं। प्रसव पूर्व और प्रसव पश्चात देखभाल सभी महिलाओं के लिए समान रूप से आवश्यक है। इसलिए, सरकार मातृत्व लाभ, विशेषकर तीसरी गर्भावस्था के लिए मातृत्व अवकाश को मंजूरी देने में कोई भेदभाव नहीं कर सकती।”

हाईकोर्ट ने आगे कहा कि सरकार ने मातृत्व लाभ को 12 सप्ताह तक सीमित करने के लिए 1961 के अधिनियम की धारा 5 की उप-धारा (3) का हवाला दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए कानूनों के आलोक में ऐसे प्रावधानों की कठोरता अब प्रासंगिक नहीं रह गई है। बेंच ने इस बात पर जोर दिया कि तमिलनाडु एक कल्याणकारी राज्य है जहाँ महिलाओं के उत्थान के लिए कई नई योजनाएं लागू की गई हैं, ऐसे में यह पाबंदी राज्य की अपनी नीति के अनुरूप नहीं है।

अदालत ने अपने फैसले में ‘उमादेवी’ (Umadevi) मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय कानून और ‘बी. रंजीता’ (B Ranjitha) व ‘पी. मंगयारकरासी’ (P Mangaiyarkkarasi) के मामलों में हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के फैसलों का संदर्भ दिया।

विल्लुपुरम के जिला न्यायाधीश और न्यायाधिकरण के आदेशों को रद्द करते हुए, हाईकोर्ट ने जिला न्यायपालिका को शयी निशा के मातृत्व अवकाश को उसी अवधि के लिए स्वीकृत करने का निर्देश दिया, जो पहली और दूसरी गर्भावस्था के लिए दी जाती है।

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बेंच ने फैसला सुनाया:

“हमारी सुविचारित राय में, 13 मार्च, 2026 के सरकारी आदेश (GO) का प्रभाव गर्भवती महिलाओं द्वारा मातृत्व अवकाश की मंजूरी के लिए दिए गए आवेदनों पर जिला न्यायपालिका के फैसलों को नियंत्रित नहीं करेगा, भले ही वह तीसरी गर्भावस्था का मामला ही क्यों न हो।”

अदालत ने प्रधान जिला न्यायाधीश को एक सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता के आवेदन पर विचार करने और सरकारी आदेश की पाबंदियों को दरकिनार करते हुए अवकाश स्वीकृत करने का निर्देश दिया है।

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