सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि एक बार लेनदारों की समिति (CoC) द्वारा रेजोल्यूशन प्लान (समाधान योजना) को मंजूरी दिए जाने के बाद, सफल रेजोल्यूशन आवेदक (SRA) को आगे बातचीत करने या प्लान से पीछे हटने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने निर्णय दिया कि सफल रेजोल्यूशन आवेदक अपनी प्रतिबद्धताओं से बचने के लिए लेटर ऑफ इंटेंट (LoI) में कथित शर्तों का बहाना नहीं बना सकता। सुप्रीम कोर्ट ने कड़े रुख के साथ कॉर्पोरेट देनदार की परिसमापन (लिक्विडेशन) प्रक्रिया को हरी झंडी दे दी और इस संबंध में नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) के आदेश के खिलाफ दायर अपील को खारिज कर दिया। इसके साथ ही अदालत ने आवेदक की बयाना राशि (EMD) को जब्त करने के फैसले को भी सही माना है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह पूरा मामला कॉर्पोरेट देनदार मेसर्स ओरकल होम टेक्सटाइल्स लिमिटेड की कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) से जुड़ा है, जो एक MSME पंजीकृत इकाई है। इस कंपनी के खिलाफ 9 अगस्त 2018 को दिवाला प्रक्रिया शुरू हुई थी। इसके बाद, रेजोल्यूशन प्रोफेशनल (RP) द्वारा 6 फरवरी 2019 को रेजोल्यूशन प्लान के लिए अनुरोध (RFRP) जारी किया गया। कंपनी के प्रमोटर और डायरेक्टर संजय दवे (अपीलकर्ता) ने इस संबंध में एक रेजोल्यूशन प्लान पेश किया, जिसे 10 मई 2021 को CoC ने 99.90% के भारी बहुमत से मंजूरी दे दी।
इसी दौरान, कुछ अन्य संभावित रेजोल्यूशन आवेदकों (PRAs) की अर्जियां भी नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) के समक्ष लंबित थीं, जो अपना प्लान पेश करने की अनुमति मांग रहे थे। इस बीच, 23 मई 2021 को RP ने संजय दवे को एक LoI जारी किया, जिसमें यह स्पष्ट लिखा था कि यह मंजूरी NCLT के समक्ष लंबित अन्य आवेदनों पर आने वाले अंतिम आदेश के अधीन होगी।
संजय दवे ने इसे “शर्तों वाला LoI” बताते हुए NCLT में एक आवेदन (IA No. 1205/2021) दायर कर दिया और बिना शर्तों वाला LoI जारी करने की मांग की। उनके द्वारा स्वीकृति न दिए जाने के कारण, RP ने 23 जून 2021 को दूसरा LoI जारी किया, जिसमें यह भी जोड़ दिया गया कि कर्मचारियों या श्रमिकों से जुड़े किसी भी कानूनी विवाद का जोखिम और खर्च खुद सफल आवेदक को उठाना होगा। जब इस पर भी सहमति नहीं बनी, तो 23 जुलाई 2021 को तीसरा LoI जारी कर RFRP के नियमों के तहत सात दिनों के भीतर परफॉर्मेंस गारंटी जमा करने का निर्देश दिया गया।
तय समय में इसका पालन न करने पर, RP ने 2 अगस्त 2021 को अपीलकर्ता की 1,00,00,000 रुपये (एक करोड़ रुपये) की बयाना राशि (EMD) जब्त कर ली। इसके खिलाफ संजय दवे ने राशि वापस पाने के लिए अर्जी लगाई। चूंकि कोई भी वैध रेजोल्यूशन प्लान लागू नहीं हो सका और CIRP की अवधि भी समाप्त हो गई, इसलिए 5 जून 2023 को CoC ने 99.61% बहुमत से कंपनी को लिक्विडेशन (परिसमापन) में भेजने का फैसला किया। NCLT ने 30 अप्रैल 2024 को संजय दवे की अर्जियां खारिज करते हुए लिक्विडेशन को मंजूरी दे दी। इसके बाद 29 अक्टूबर 2024 को NCLAT ने भी इन आदेशों को बरकरार रखा, जिसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता के वकील ने अदालत में तर्क दिया कि RP द्वारा जारी किए गए सभी LoI शर्तों से बंधे थे, जो दिवाला और दिवालियापन संहिता (IBC) और खुद उनके द्वारा सौंपे गए प्लान के खिलाफ थे। उनका कहना था कि प्लान को किसी तीसरे पक्ष के आवेदनों के अधीन रखना और कर्मचारियों के मुकदमों का जोखिम आवेदक पर डालना गलत था। इसके अलावा, उन्होंने यह भी मुद्दा उठाया कि CoC की बैठक में परफॉर्मेंस गारंटी जमा करने के लिए जो समय पहले 45 दिन तय किया गया था, उसे आखिरी LoI में घटाकर केवल 7 दिन कर दिया गया, जो नियमों का उल्लंघन है।
दूसरी ओर, मुख्य बैंक (यूनियन बैंक) और लिक्विडेटर के वकीलों ने NCLT और NCLAT के फैसलों का पुरजोर समर्थन किया। उन्होंने दलील दी कि अपीलकर्ता CoC की बैठकों में खुद मौजूद थे और उन्हें अन्य लंबित मुकदमों की पूरी जानकारी थी। गारंटी के लिए 45 दिनों का समय केवल कोरोना महामारी के कारण दी गई एक अस्थायी ढील थी, जिसकी अवधि जुलाई 2021 तक बहुत पहले ही खत्म हो चुकी थी, और अपीलकर्ता ने बाद की बैठक में खुद 7 दिनों के भीतर गारंटी देने पर सहमति जताई थी।
कोर्ट का विश्लेषण और कानूनी तर्क
सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ता की सभी दलीलों को पूरी तरह से निराधार पाते हुए खारिज कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी न्यायिक संस्था के लंबित फैसले का जिक्र होने मात्र से LoI शर्तों वाला नहीं हो जाता, क्योंकि अदालत का आदेश तो वैसे भी कानूनी रूप से सर्वोपरि और बाध्यकारी होता है।
CoC की बैठकों के मिनट्स (कार्यवृत्त) का अवलोकन करते हुए पीठ ने पाया कि अपीलकर्ता ने सभी नियमों को जानते हुए ही LoI की मांग की थी। कर्मचारियों के बकाए और जोखिम के मुद्दे पर भी कोर्ट ने पाया कि 27वीं बैठक में संजय दवे ने खुद इस जोखिम को उठाने पर सहमति दी थी। साथ ही, 23 जुलाई 2021 की बैठक में उन्होंने खुद माना था कि वह 7 दिनों के भीतर परफॉर्मेंस बैंक गारंटी जमा कर देंगे।
अदालत ने ‘एक समय पर सहमति देने और बाद में मुकर जाने’ (स्टॉपेल और एक्विसेंस) के कानूनी सिद्धांतों का हवाला देते हुए टिप्पणी की कि कोई भी व्यक्ति अपनी ही बातों से पलट नहीं सकता। पीठ ने बेहद कड़े शब्दों में कहा:
“अपीलकर्ता द्वारा अपनाया गया यह तरीका स्थापित योजना से पीछे हटने का एक अप्रत्यक्ष प्रयास था। यह पूरी तरह से एक सोची-समझी चाल थी। यह अच्छी तरह जानते हुए कि CoC द्वारा स्वीकृत प्लान से सीधे तौर पर पीछे नहीं हटा जा सकता, कुछ शर्तों का बहाना बनाकर अप्रत्यक्ष रूप से ठीकरा CoC के सिर पर फोड़ने की कोशिश की गई, ताकि अपनी अनिच्छा को छुपाया जा सके। नीचे की अदालतों ने इस चालाकी भरे पैंतरे को बिल्कुल सही तरीके से विफल किया है। अगर इस तरह की तरकीबों को सफल होने दिया गया, तो आईबीसी (IBC) का पूरा ढांचा ही ढह जाएगा और इस संहिता के जरिए हासिल किए जाने वाले सराहनीय उद्देश्य महज एक दूर का सपना बनकर रह जाएंगे।”
सुप्रीम कोर्ट ने एबिक्स सिंगापुर प्राइवेट लिमिटेड बनाम कमिटी ऑफ क्रेडिटर्स ऑफ एजुकंप सॉल्यूशंस लिमिटेड मामले के अपने ऐतिहासिक फैसले का हवाला देते हुए दोहराया कि CoC द्वारा स्वीकृत होने के बाद रेजोल्यूशन प्लान पूरी तरह बाध्यकारी और अपरिवर्तनीय हो जाता है। इसमें सफल आवेदक की मर्जी से किसी संशोधन या वापसी की कोई गुंजाइश नहीं बचती।
बयाना राशि जब्त करने के संबंध में कोर्ट ने माना कि चूंकि आवेदक तय समय सीमा में गारंटी राशि देने में विफल रहा, इसलिए RFRP की धारा 1.9.4 के तहत RP द्वारा 1 करोड़ रुपये जब्त करने का निर्णय पूरी तरह कानूनी था।
लिक्विडेशन के आदेश को चुनौती देने वाली दलील पर कोर्ट ने आईबीसी की धारा 33(2) और मनीष कुमार बनाम भारत संघ मामले का जिक्र करते हुए स्पष्ट किया कि CoC के पास प्लान की अंतिम मंजूरी से पहले किसी भी समय कंपनी को लिक्विडेशन में भेजने का वैधानिक अधिकार है। के. शशिधर बनाम इंडियन ओवरसीज बैंक मामले का हवाला देते हुए बेंच ने दोहराया कि 99.61% वोटिंग शेयर से लिया गया लिक्विडेशन का फैसला CoC की व्यावसायिक बुद्धिमत्ता (कमर्शियल विजडम) का हिस्सा है, जिसकी न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती।
कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने संजय दवे की अपीलों में कोई दम न पाते हुए उन्हें खारिज कर दिया और सभी अंतरिम आदेशों को रद्द कर दिया। शीर्ष अदालत ने लिक्विडेटर को निर्देश दिया कि वे मेसर्स ओरकल होम टेक्सटाइल्स लिमिटेड की बची हुई परिसमापन प्रक्रिया को कानून के अनुसार तेजी से आगे बढ़ाएं। इस मामले में किसी भी पक्ष पर कोई जुर्माना या अदालती खर्च नहीं लगाया गया है।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: संजय दवे बनाम आंध्र बैंक लिमिटेड एवं अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 12264-12266 / 2024
पीठ: जस्टिस के.वी. विश्वनाथन, जस्टिस विपुल एम. पंचोली
निर्णय की तिथि: 27 मई 2026

