पहली डिलीवरी में जुड़वां बच्चे होने पर दूसरी बार मातृत्व अवकाश से इनकार नहीं किया जा सकता: तेलंगाना हाईकोर्ट

तेलंगाना हाईकोर्ट ने महिला कर्मचारियों के अधिकार में बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि पहली डिलीवरी में जुड़वां बच्चे पैदा होने के आधार पर किसी महिला को दूसरी गर्भावस्था के दौरान मातृत्व अवकाश से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि जुड़वां बच्चों का जन्म एक प्राकृतिक व जैविक घटना है, जो महिला के नियंत्रण में नहीं होती। ऐसे में नियम का यांत्रिक इस्तेमाल कर लाभ रोकने से संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले मौलिक अधिकारों का हनन होता है।

जस्टिस के. सरथ की एकल पीठ ने तेलंगाना सोशल वेलफेयर रेजिडेंशियल एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस सोसाइटी (TGSWREIS) में जूनियर अंग्रेजी लेक्चरर जाडी स्वरूपा रानी की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ता को 14 अप्रैल 2026 से 11 अक्टूबर 2026 तक की अवधि के लिए 180 दिनों का सवैतनिक मातृत्व अवकाश और सभी भत्ते प्रदान करें।

मामला और याचिकाकर्ता का पक्ष

जाडी स्वरूपा रानी को 27 सितंबर 2019 को सरकारी सेवा में नियुक्त किया गया था। 9 नवंबर 2023 को अपनी पहली डिलीवरी के दौरान उन्होंने जुड़वां बच्चों को जन्म दिया, जिसके लिए उन्हें 180 दिनों का स्वीकृत मातृत्व अवकाश मिला था और इसका इंदराज उनकी सर्विस बुक में किया गया था। इसके बाद जब वह दोबारा गर्भवती हुईं, तो उन्होंने 19 फरवरी 2026 को दूसरी गर्भावस्था के लिए मातृत्व अवकाश का आवेदन दिया। याचिका कोर्ट में लंबित रहने के दौरान ही उन्होंने अपने तीसरे बच्चे को जन्म दिया।

प्रशासन ने तेलंगाना फंडामेंटल रूल्स के नियम 101(ए) और 17 मई 2014 के सरकारी आदेश (जीओ एमएस नंबर 50) का हवाला देते हुए उनके आवेदन को खारिज कर दिया था। इन नियमों के तहत मातृत्व अवकाश केवल उन्हीं विवाहित महिला कर्मचारियों को दिया जा सकता है, जिनके दो से कम जीवित बच्चे हों। राज्य सरकार का तर्क था कि याचिकाकर्ता के पहले से ही दो जीवित बच्चे हैं, इसलिए उन्हें अवकाश देने से मौलिक नियमों का उल्लंघन होगा, जिससे ऑडिट आपत्तियां उठेंगी और अनियमित वेतन भुगतान का मामला बनेगा।

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याचिकाकर्ता के वकील गट्टू विनय कुमार ने अदालत में तर्क दिया कि अधिकारियों ने पहली गर्भावस्था में जुड़वां बच्चों के जन्म को दो अलग-अलग गर्भावस्थाओं के रूप में माना, जबकि यह एक ही जैविक घटना थी।

यांत्रिक व्याख्या को अदालत ने किया खारिज

15 जुलाई को सुनाए गए अपने फैसले में जस्टिस सरथ ने नियमों की इस शाब्दिक (literal) व्याख्या को अस्वीकार कर दिया। उन्होंने कहा कि विवाद ‘दो से कम जीवित बच्चे’ की शर्त के अस्तित्व को लेकर नहीं, बल्कि जुड़वां बच्चे होने की स्थिति में उसकी व्याख्या को लेकर है।

हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि नियमों का कठोर पालन मातृत्व कानून के मूल उद्देश्य को ही खत्म कर देता है, जिसका मकसद महिला के स्वास्थ्य की रक्षा करना और बच्चे के जन्म के बाद उसकी नौकरी को जारी रखने में सहायता प्रदान करना है। अदालत ने कहा कि कोई महिला एक बच्चे को जन्म देती है या जुड़वां बच्चों को, यह पूरी तरह से एक जैविक प्रक्रिया है और इसे आधार बनाकर मातृत्व लाभ रोकने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

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सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला

अपने निर्णय में तेलंगाना हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के दो प्रमुख फैसलों—’दीपिका सिंह बनाम सेंट्रल एडमिनिस्त्रातिव ट्रिब्यूनल’ और ‘के. उमादेवी बनाम तमिलनाडु सरकार’—का उल्लेख किया। सुप्रीम कोर्ट ने इन मामलों में स्पष्ट किया था कि मातृत्व अवकाश संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत गरिमा, निजता और प्रजनन स्वायत्तता का अनिवार्य हिस्सा है।

इसके अलावा हाईकोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के ‘जे. शर्मिला’ मामले का भी संदर्भ दिया, जिसमें कहा गया था कि मातृत्व अवकाश की पात्रता जीवित बच्चों की संख्या के बजाय प्रसव (डिलिवरी) की संख्या से जुड़ी होनी चाहिए। मद्रास हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद तमिलनाडु सरकार ने 2018 में अपने नियमों में संशोधन कर पहली डिलीवरी में जुड़वां बच्चे होने पर दूसरी डिलीवरी के लिए मातृत्व अवकाश का प्रावधान शामिल किया था।

हाईकोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि पड़ोसी राज्य आंध्र प्रदेश ने 5 मई 2025 को जारी एक सरकारी आदेश के जरिए दो बच्चों की सीमा की शर्त को पूरी तरह से समाप्त कर दिया है। जस्टिस सरथ ने कहा कि इन न्यायिक नज़ीरों और वैधानिक बदलावों के बावजूद तेलंगाना के अधिकारी दो बच्चों के नियम को यांत्रिक रूप से लागू कर रहे थे।

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