दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस प्रतीक जालान ने एक दुष्कर्म मामले में सेशंस कोर्ट में चल रही कार्यवाही पर अंतरिम रोक लगा दी है। हाईकोर्ट ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि यदि कोई शिकायतकर्ता एक ही समयावधि के लिए दो अलग-अलग पुरुषों पर शादी के झूठे वादे के तहत शारीरिक संबंध बनाने का आरोप लगाती है, तो प्रथम दृष्टया यह संदेह पैदा होता है कि क्या वह वास्तव में शादी के वादे पर भरोसा कर रही थी। मामला दिल्ली के पहाड़गंज थाने में दर्ज भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 376 (दुष्कर्म), 313 (महिला की सहमति के बिना गर्भपात कराना) और 506 (आपराधिक धमकी) के तहत दर्ज एफआईआर से जुड़ा है।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर सेशंस कोर्ट में लंबित आपराधिक मामले की कार्यवाही पर अंतरिम रोक लगाने की मांग की थी। हाईकोर्ट ने मुख्य याचिका पर मार्च 2026 में ही नोटिस जारी कर दिया था, लेकिन जब सेशंस कोर्ट में आरोप तय करने (चार्ज) पर बहस का चरण शुरू हुआ, तो याचिकाकर्ता को तत्काल अंतरिम स्थगन के लिए आवेदन करना पड़ा।
अदालत में दी गई दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने तर्क दिया कि शिकायतकर्ता द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर दुर्भावना से प्रेरित है। उन्होंने एक तुलनात्मक तालिका प्रस्तुत करते हुए बताया कि शिकायतकर्ता ने वर्ष 2024 से 2025 के दौरान अलग-अलग व्यक्तियों के खिलाफ यौन उत्पीड़न से जुड़ी चार अलग-अलग शिकायतें दर्ज कराई थीं:
- पहला मामला (जयपुर): वर्ष 2019 से 2024 के दौरान नियोक्ता पर यौन शोषण का आरोप लगाया गया था, जिसमें पुलिस ने फरवरी 2024 में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी।
- दूसरा मामला (जयपुर): अगस्त 2024 में एक अन्य व्यक्ति पर वर्ष 2018 से 2024 के दौरान शादी का झांसा देकर दुष्कर्म करने और जबरन गर्भपात कराने का आरोप लगाया गया। इस मामले में अक्टूबर 2024 में पक्षों के बीच समझौता हो गया।
- तीसरा मामला (जयपुर): जनवरी 2025 में एक तीसरे व्यक्ति के खिलाफ वर्ष 2024 के दौरान शादी के झूठे वादे पर दुष्कर्म का आरोप लगाया गया, जिसमें पुलिस ने अगस्त 2025 में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की।
- चौथा/वर्तमान मामला (दिल्ली): अगस्त 2025 में याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज कराया गया, जिसमें वर्ष 2018 से 2023 के दौरान शादी के झूठे वादे पर दुष्कर्म और धारा 313 आईपीसी के तहत जबरन गर्भपात के आरोप लगाए गए।
वरिष्ठ अधिवक्ता ने जोर देकर कहा कि दो शिकायतों—एक जयपुर वाली और एक वर्तमान दिल्ली की—में वर्ष 2018 से 2023 की बिल्कुल समान समयावधि शामिल है। दोनों में शादी के झूठे वादे पर शारीरिक संबंध बनाने और जबरन गर्भपात कराने के समान आरोप हैं। यह अकल्पनीय है कि कोई शिकायतकर्ता एक ही समयावधि में दो अलग-अलग व्यक्तियों द्वारा दिए गए शादी के झूठे वादे से गुमराह हो सकती है।
इसके अलावा, यह भी बताया गया कि शिकायतकर्ता ने इससे पहले रेवाड़ी के महिला पुलिस थाने में भी याचिकाकर्ता के खिलाफ इसी तरह की शिकायत की थी, जो नवंबर 2023 में समझौते के साथ समाप्त हुई थी। उस समय शिकायतकर्ता ने अपने बयान में स्वीकार किया था कि याचिकाकर्ता के साथ उसका संबंध नवंबर 2022 में ही समाप्त हो गया था और उसने भविष्य में कोई शिकायत न करने का वचन दिया था। इसके बावजूद, लगभग दो साल बाद अगस्त 2025 में यह एफआईआर दर्ज कराई गई।
राज्य की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक और शिकायतकर्ता की ओर से उनके अधिवक्ताओं ने नोटिस स्वीकार किया।
कोर्ट का विश्लेषण और नजीरें
मामले के कानूनी पहलुओं का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों महेश दामू खरे बनाम महाराष्ट्र राज्य तथा समाधान बनाम महाराष्ट्र राज्य व अन्य का हवाला दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इन निर्णयों में स्पष्ट किया था कि शादी की संभावना पर आधारित हर रोमांटिक रिश्ता जो बाद में खराब हो जाता है, वह दुष्कर्म के अपराध की श्रेणी में नहीं आता।
इसके अलावा, हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक अन्य निर्णय पृथ्वीराजन बनाम राज्य (निरीक्षक द्वारा प्रतिनिधित्व) का उल्लेख किया, जिसमें शादी के वादे के आधार पर दुष्कर्म का अपराध बनने के लिए आवश्यक शर्तों की व्याख्या की गई थी:
“इस अदालत ने बार-बार यह दोहराया है कि केवल इसलिए कि शादी के वादे के आधार पर शारीरिक संबंध बनाए गए थे, यह दुष्कर्म का अपराध नहीं बन जाता। दुष्कर्म का अपराध सिद्ध होने के लिए निम्नलिखित शर्तों का पूरा होना आवश्यक है: पहला, आरोपी ने केवल यौन संबंध बनाने के लिए सहमति प्राप्त करने के उद्देश्य से शादी का वादा किया था और शुरू से ही उसका उस वादे को पूरा करने का कोई इरादा नहीं था; दूसरा, शिकायतकर्ता ने शादी के ऐसे झूठे वादे से सीधे प्रभावित होकर ही यौन संबंधों के लिए अपनी सहमति दी थी।”
“वर्तमान मामला याचिकाकर्ता और शिकायतकर्ता के बीच आपसी सहमति से बने संबंधों का है। रिकॉर्ड से ऐसा प्रतीत नहीं होता कि आरोपी द्वारा किया गया शादी का शुरुआती वादा शुरू से ही झूठा था। एफआईआर के अवलोकन से पता चलता है कि बीच में उत्पन्न परिस्थितियों के कारण शादी का वादा पूरा नहीं हो सका, जिसके परिणामस्वरूप रिश्ता खत्म हो गया और यह एफआईआर दर्ज कराई गई। ऐसी परिस्थितियों में, आरोपी को मुकदमे का सामना करने देना अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा, जिसकी अनुमति नहीं दी जा सकती।”
मामले के तथ्यों का मूल्यांकन करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“प्रथम दृष्टया, जहां दो अलग-अलग व्यक्तियों के खिलाफ एक ही समयावधि को कवर करने वाले यौन संबंधों के इस तरह के आरोप लगाए जाते हैं, वहां यह संदेह उत्पन्न होता है कि क्या शिकायतकर्ता दो अलग-अलग व्यक्तियों द्वारा किए गए शादी के वादे के आधार पर काम कर रही होगी।”
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि सेशंस कोर्ट के समक्ष चल रही कार्यवाही अगले आदेश तक स्थगित रहेगी। स्थगन आवेदन को मुख्य याचिका के साथ 5 अक्टूबर 2026 को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया है।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: रोहित सहरावत बनाम राज्य एनसीटी दिल्ली एवं अन्य
वाद संख्या: सीआरएल.एम.सी. 1977/2026 एवं सीआरएल.एम.ए. 20029/2026
पीठ: जस्टिस प्रतीक जालान
निर्णय की तिथि: 13.07.2026

