प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज होने के बाद संपत्तियों के ध्वस्तीकरण पर दो साल की अंतरिम रोक लगाने के सवाल पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की दो जजों की पीठ ने एक विभाजित फैसला दिया है। हालांकि, अस्थायी रोक के विचार पर मतभेद के बावजूद दोनों जजों ने सर्वसम्मति से स्पष्ट किया कि राज्य प्रशासन को बुलडोजर या ध्वस्तीकरण की किसी भी कार्रवाई में कानून और तय प्रक्रिया का कड़ाई से पालन करना होगा। पीठ ने चेतावनी दी कि नियमानुसार कार्रवाई न करने पर संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई शुरू की जाएगी।
20 जुलाई को आया यह आदेश उत्तर प्रदेश में एक आपराधिक मामला दर्ज होने के बाद एक रिहायशी मकान को गिराने की आशंका और दो व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को सील किए जाने के खिलाफ दायर याचिका पर सुनाया गया।
दो साल की रोक के प्रस्ताव पर जजों में असहमति
पीठ में शामिल जजों के बीच मुख्य मतभेद प्राथमिकी दर्ज होने के बाद दो साल तक ध्वस्तीकरण टालने के प्रस्ताव पर रहा। जस्टिस अतुल श्रीधरन आरोपी व्यक्तियों से जुड़ी संपत्तियों के खिलाफ तत्काल कार्यकारी कार्रवाई रोकने के लिए दो साल की रोक लागू करने के पक्ष में थे। हालांकि, जस्टिस सिद्धार्थ नंदन ने इस प्रस्ताव से असहमति जताई, जिसके परिणामस्वरूप इस बिंदु पर खंडित निर्णय आया।
इसके बावजूद, दोनों जज इस बात पर सहमत थे कि मनमाने ढंग से की जाने वाली प्रशासनिक ध्वस्तीकरण कार्रवाई शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का उल्लंघन करती है और कानून के शासन को कमजोर करती है। जस्टिस श्रीधरन ने टिप्पणी की कि एक जीवंत लोकतंत्र में व्यक्तिगत अधिकारों की राज्य की शक्ति से रक्षा की जानी चाहिए। उन्होंने मशहूर उर्दू कवि बशीर बद्र की पंक्तियों “लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में” का उल्लेख करते हुए घर के निर्माण में लगने वाले परिश्रम और बस्तियों के बिना किसी पछतावे के उजाड़े जाने के दर्द को रेखांकित किया।
मामले की पृष्ठभूमि और पक्षों की दलीलें
कानूनी विवाद तब शुरू हुआ जब राज्य अधिकारियों ने ‘इंडियन लॉज’ और एक ‘सा मिल’ (आरा मशीन) को सील कर दिया और याचिकाकर्ताओं के एक रिहायशी मकान को गिराने की कथित धमकी दी। यह कार्रवाई याचिकाकर्ताओं के एक रिश्तेदार के खिलाफ बाल यौन अपराध संरक्षण (POCSO) अधिनियम और उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम के तहत दर्ज एफआईआर के बाद की गई थी।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ता शम्सुद्दीन खान ने हाईकोर्ट में तर्क दिया कि उनके मुवक्किल कानून का पालन करने वाले नागरिक हैं। वे न तो आरोपी के साथ रहते हैं और न ही उसके व्यावसायिक उद्यमों से उनका कोई लेना-देना है। उन्होंने कहा कि प्रशासनिक अधिकारियों ने बिना कोई पूर्व नोटिस दिए और वैधानिक प्रक्रियात्मक आवश्यकताओं की अनदेखी करते हुए परिसर को सील किया और ध्वस्तीकरण की धमकी दी, जो असंवैधानिक है।
इसके जवाब में राज्य सरकार का पक्ष रख रहे मुख्य स्थाई अधिवक्ता दिलीप कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि अधिकारियों ने केवल कारण बताओ नोटिस जारी किया है। उन्होंने दलील दी कि याचिकाकर्ताओं के पास संबंधित नगर निकाय के समक्ष अपना बचाव प्रस्तुत करने का पूरा अवसर है और यदि औपचारिक सुनवाई के बाद ध्वस्तीकरण का कोई प्रतिकूल आदेश पारित होता है, तो वे कानूनी राहत के लिए अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं।
‘छोटे आदमी’ के अधिकार और प्रशासनिक जवाबदेही
संपत्ति कानून प्रवर्तन के व्यापक संदर्भ पर बात करते हुए हाईकोर्ट ने जोर दिया कि संवैधानिक संरक्षण उन गरीब और वंचित लोगों को भी प्राप्त है जो सामाजिक या वित्तीय रूप से साधन संपन्न नहीं हैं। पीठ ने नगर निगम कानूनों के तहत आवासीय मकानों को गिराने के मामले में बेंथम के उपयोगितावादी दृष्टिकोण (जिसमें बहुसंख्यक वर्ग के लाभ के लिए कुछ लोगों को बेदखल करने को सही ठहराया जाता है) को भारतीय संदर्भ में पूरी तरह अनुपयुक्त करार दिया।
हाईकोर्ट ने कहा कि रिहायशी मकान रातों-रात नहीं बन जाते। अनधिकृत निर्माणों के पनपने का मुख्य कारण नगर निकायों की निष्क्रियता, राजनीतिक संरक्षण, नौकरशाही की बेईमानी या अधिकारियों की जानबूझकर की गई उपेक्षा है। राज्य को उसकी प्रशासनिक मशीनरी के माध्यम से इस अवैधता में समान रूप से भागीदार मानते हुए पीठ ने निर्णय सुनाया कि दशकों से रह रहे उन लोगों को भी, जिनके पास जमीन का स्पष्ट मालिकाना हक नहीं है, बेदखल करने से पहले पर्याप्त समय और दूसरी जगह बसने के लिए सरकारी सहायता दी जानी चाहिए।
कोर्ट ने संविधान के भाग IV (राज्य के नीति निदेशक तत्व) को मात्र सजावटी पाठ न मानकर राज्य की कार्रवाइयों को संचालित करने वाली आवश्यक ‘आत्मा’ बताया। प्रख्यात संविधानविद वी. सुधीश पाई के विचारों का संदर्भ देते हुए पीठ ने कहा कि निर्माण नियमों का उल्लंघन व्यापक स्तर पर हो रहा है, जिसमें विकास प्राधिकरणों द्वारा खुद बनाए गए ढांचे भी शामिल हैं। ऐसे में अदालतों को अधिकारियों की दंडात्मक शक्तियों पर अंकुश लगाना होगा और समकालीन वास्तविकताओं के अनुरूप कानून को ढालना होगा।
भ्रष्टाचार पर कड़ा रुख और मृत्युदंड का सुझाव
हाईकोर्ट ने अनियंत्रित प्रशासनिक दुरुपयोग को संस्थागत अखंडता के पतन से जोड़ा और राम मंदिर में दान चोरी के हालिया आरोपों का हवाला देते हुए इसे भ्रष्टाचार के प्रति समाज में फैली व्यापक उदासीनता का प्रतीक बताया। अदालत ने कहा कि जो जनता राम मंदिर में हुई चोरी से भी शर्मिंदा नहीं होती, उसके नैतिक पतन का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।
ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के 2025 करप्शन परसेप्शन इंडेक्स का उल्लेख करते हुए (जिसमें भारत 182 देशों में 91वें स्थान पर है) हाईकोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक निकायों में बेईमानी और निष्क्रियता के कारण ही अवैध ढांचों का निर्माण होता है। राज्य में भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए पीठ ने सुझाव दिया कि सरकार को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 में संशोधन करके दोषियों के लिए मृत्युदंड का प्रावधान करने पर विचार करना चाहिए, ताकि संस्थागत निष्ठा बहाल हो सके और कानून के शासन पर आधारित कल्याणकारी राज्य की स्थापना की जा सके।

