साल 2018 के एलगार परिषद-माओवादी संबंध मामले में आरोपी मानवाधिकार अधिवक्ता सुरेंद्र गाडलिंग की जमानत याचिका पर सुनवाई से सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस श्री चंद्रशेखर ने खुद को अलग कर लिया है। मंगलवार को यह मामला जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ के सामने सूचीबद्ध था। सुनवाई शुरू होते ही जस्टिस मिश्रा ने स्पष्ट किया कि उनके सहयोगी जज को व्यक्तिगत कठिनाई होने के कारण यह याचिका अब किसी अन्य पीठ के समक्ष भेजी जाएगी।
जस्टिस चंद्रशेखर से पहले जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस ए.एस. चांदुरकर भी गाडलिंग की जमानत याचिका पर सुनवाई से हट चुके हैं। इस तरह वह इस मामले से अलग होने वाले सुप्रीम कोर्ट के तीसरे जज बन गए हैं।
साढ़े सात साल की कैद और बार-बार सुनवाई टलने का मुद्दा
हाल ही में गाडलिंग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष मामले को रखा था और जल्द सुनवाई की मांग की थी। सिब्बल ने अदालत को बताया कि गाडलिंग पिछले साढ़े सात साल से जेल में बंद हैं। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी जमानत याचिका पर 2023 में नोटिस जारी किया था, लेकिन जजों के सुनवाई से अलग होने की वजह से मामले में लगातार देरी हो रही है।
इससे पहले 8 अगस्त 2025 को वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद ग्रोवर ने तत्कालीन CJI बी.आर. गवई के सामने गाडलिंग की लंबी हिरासत का हवाला देते हुए जल्द सुनवाई की गुहार लगाई थी। ग्रोवर ने अदालत को सूचित किया था कि सुप्रीम कोर्ट में उनकी जमानत याचिका अब तक 11 बार स्थगित की जा चुकी है।
पिछले साल 27 मार्च को शीर्ष अदालत ने गाडलिंग और सह-आरोपी कार्यकर्ता ज्योति जगताप की जमानत याचिकाओं पर सुनवाई टाल दी थी। उसी दिन अदालत ने नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) की उस याचिका पर भी सुनवाई टाली थी, जिसमें कार्यकर्ता महेश राउत को मिली जमानत को चुनौती दी गई है। महेश राउत को बॉम्बे हाईकोर्ट ने जमानत दे दी थी, लेकिन NIA द्वारा सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने के कारण उस आदेश पर रोक लगी हुई है।
गाडलिंग पर दर्ज मामले और अभियोजन के दावे
सुरेंद्र गाडलिंग पर भारतीय दंड संहिता (IPC) और गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप तय किए गए हैं। अभियोजन पक्ष का दावा है कि गाडलिंग ने भूमिगत माओवादी समूहों को सहायता प्रदान की और फरार आरोपियों सहित अन्य सह-आरोपियों के साथ मिलकर साजिश रची।
जांच एजेंसियों के अनुसार, गाडलिंग ने माओवादी विद्रोहियों को सरकारी गतिविधियों से जुड़ी गोपनीय जानकारियां और विशिष्ट क्षेत्रों के नक्शे मुहैया कराए। उन पर सुरजागढ़ खदानों के संचालन का विरोध करने के लिए माओवादियों को उकसाने और स्थानीय निवासियों को प्रतिबंधित संगठन में शामिल करने के लिए भड़काने का भी आरोप है।
एलगार परिषद सम्मेलन और हिंसा की पृष्ठभूमि
यह पूरा मामला 31 दिसंबर 2017 को पुणे शहर के ऐतिहासिक शनिवारवाड़ा किले में आयोजित एलगार परिषद सम्मेलन से जुड़ा है। पुलिस का कहना है कि सम्मेलन के दौरान दिए गए भड़काऊ भाषणों के कारण अगले दिन, 1 जनवरी 2018 को पुणे जिले के कोरेगांव-भीमा युद्ध स्मारक के पास बड़े पैमाने पर हिंसा भड़क गई थी।
इसी मामले से जुड़े अन्य घटनाक्रम में बॉम्बे हाईकोर्ट ने कार्यकर्ता ज्योति जगताप की उस अपील को खारिज कर दिया था, जिसमें उन्होंने विशेष अदालत के फरवरी 2022 के जमानत इनकार आदेश को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि जगताप कबीर कला मंच की एक सक्रिय सदस्य थीं, जिसने सम्मेलन में नाटक के दौरान बेहद आक्रामक और उकसाने वाले नारे लगाए थे। जांच एजेंसी NIA कबीर कला मंच को प्रतिबंधित संगठन कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) का मुखौटा संगठन मानती है।

