दिल्ली हाईकोर्ट की फटकार: DCPCR में नियुक्तियों में देरी पर जताई नाराजगी, कहा- ‘यह अधिकारियों की उदासीनता है’

दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को दिल्ली सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। मामला दिल्ली बाल अधिकार संरक्षण आयोग (DCPCR) में अध्यक्ष और सदस्यों के पदों को भरने में हो रही अत्यधिक देरी से जुड़ा है। हाईकोर्ट ने सरकार की इस कार्यप्रणाली को “उदासीनता” करार देते हुए कहा कि अधिकारी अपनी ही बातों और आश्वासनों का सम्मान नहीं कर रहे हैं।

DCPCR एक वैधानिक संस्था है जिसका गठन राजधानी में बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए किया गया है। पिछले तीन वर्षों से यह आयोग लगभग निष्क्रिय पड़ा है क्योंकि इसके प्रमुख पद रिक्त हैं। इससे पहले फरवरी में हुई सुनवाई के दौरान, दिल्ली सरकार ने एक हलफनामा दायर कर कोर्ट को भरोसा दिलाया था कि अप्रैल के दूसरे सप्ताह तक नियुक्तियों की प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी। हालांकि, समय सीमा बीत जाने के बाद भी नियुक्तियां न होने पर कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया।

चीफ जस्टिस डी.के. उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की बेंच ने सरकार के रवैये पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि DCPCR का गठन किसी अदालती आदेश से नहीं, बल्कि विधायी अधिनियम के माध्यम से हुआ था। इसके बावजूद प्रशासन कानून के आदेशों का पालन नहीं कर रहा है।

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बेंच ने टिप्पणी की, “इस तरह की उदासीनता हमें कहीं और देखने को नहीं मिलती। अगर यह जानबूझकर किया जा रहा है, तो यह और भी खतरनाक है। तीन साल से यह आयोग काम नहीं कर रहा है। इसके कार्यों की गंभीरता को समझिए।”

हाईकोर्ट ने कानून के कार्यान्वयन में विफलता पर भी सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा, “कानून बनाते समय तो आप खूब ढोल पीटते हैं। जुवेनाइल जस्टिस एक्ट कब बना था? ग्यारह साल हो गए और हम अभी भी इसे लागू करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। आप न तो बाल कल्याण समिति बनाएंगे और न ही चयन समिति।”

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दिल्ली सरकार के वकील ने स्वीकार किया कि इस देरी के लिए उनके पास “कोई बहाना नहीं” है। उन्होंने अदालत से नियुक्तियां पूरी करने के लिए छह सप्ताह का अतिरिक्त समय मांगा। वकील ने बताया कि अंतिम निर्णय के लिए फाइल “उच्चतम अधिकारी” के पास लंबित है और इस संबंध में समय विस्तार के लिए एक औपचारिक आवेदन भी दाखिल किया गया है।

हालांकि, हाईकोर्ट ने बार-बार समय मांगे जाने पर असंतोष व्यक्त किया। कोर्ट ने कहा, “हमारे द्वारा दिए गए आदेशों के बावजूद, अब इस देरी के लिए कौन जवाबदेह होगा? हम कठोर शब्दों का इस्तेमाल नहीं करना चाहते, लेकिन आपके पास कोई बचाव उपलब्ध नहीं है। आप अक्टूबर 2024 से समय मांग रहे हैं। हमें इस तरह दीवार की ओर मत धकेलें।”

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अधिकारियों द्वारा आयोग की कार्यक्षमता सुनिश्चित न कर पाने पर हाईकोर्ट ने अपनी नाराजगी व्यक्त की। कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई की तारीख को 3 जुलाई से घटाकर 22 मई कर दिया है। साथ ही, सरकार के वकील को निर्देश दिया है कि वह समय विस्तार के आवेदन को रिकॉर्ड पर लाने के लिए आवश्यक कदम उठाएं।

गौरतलब है कि 18 फरवरी को भी कोर्ट ने ढाई साल से अधिक की देरी को “न्यायोचित ठहराने” की कोशिश पर सरकार को चेतावनी दी थी और कहा था कि यदि अप्रैल के मध्य तक नियुक्तियां नहीं हुईं, तो मामले को बेहद गंभीरता से लिया जाएगा।

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