सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी रिश्ते के दौरान आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंधों को केवल इसलिए रेप नहीं माना जा सकता क्योंकि बाद में वह रिश्ता टूट गया। कोर्ट ने इस टिप्पणी के साथ केरल के रहने वाले संतोष कुमार एन. पी. को रेप और धोखाधड़ी के आरोपों से मुक्त कर दिया।
जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि शुरुआत से ही धोखे या जानबूझकर गलत जानकारी देकर प्राप्त की गई सहमति और रिश्ता समाप्त होने के बाद पूर्व में सहमति से बने संबंधों पर पछतावे के मामलों में अंतर करना जरूरी है।
कोर्ट ने कहा कि किसी रिश्ते के टूटने मात्र से पहले आपसी सहमति से हुए शारीरिक संबंधों को आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता।
पुरुष को भी रिश्ता समाप्त करने का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने असफल प्रेम संबंधों के बाद आपराधिक मुकदमे दर्ज कराने की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता जताई। पीठ ने कहा कि यदि किसी पुरुष को केवल इस डर से रिश्ते में बने रहने के लिए मजबूर होना पड़े कि संबंध समाप्त करने पर उसके खिलाफ रेप का आरोप लगाया जा सकता है, तो उससे रिश्ते से बाहर निकलने की उसकी स्वतंत्रता प्रभावित होगी।
कोर्ट ने सवाल उठाया कि क्या किसी पुरुष को रिश्ता समाप्त करने का अधिकार नहीं है और क्या उसके इस फैसले को धोखाधड़ी माना जा सकता है। पीठ ने स्पष्ट किया कि ऐसा नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, किसी रिश्ते के समाप्त होने के बाद निराशा या पछतावा होना अपने आप में पहले सहमति से बने शारीरिक संबंधों को अपराध में नहीं बदल सकता।
रेप के आरोपों की गंभीरता बनाए रखना जरूरी
पीठ ने कहा कि रेप एक गंभीर अपराध है और इससे जुड़े आपराधिक प्रावधानों का इस्तेमाल वास्तविक यौन हिंसा, जबरदस्ती या धोखे से सहमति प्राप्त करने वाले मामलों में होना चाहिए।
कोर्ट ने चेतावनी दी कि प्रत्येक असफल सहमति वाले रिश्ते को रेप का मामला बना देने से इस गंभीर अपराध की प्रकृति और गंभीरता कमजोर पड़ सकती है।
पीठ ने कहा कि अदालतों के सामने बार-बार ऐसे मामले आ रहे हैं, जिनमें व्यक्तिगत संबंध समाप्त होने के बाद आपराधिक आरोप लगाए जाते हैं।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह देखना आवश्यक है कि क्या शुरुआत से ही जानबूझकर धोखा देकर सहमति प्राप्त की गई थी या आरोप केवल इसलिए लगाए गए क्योंकि रिश्ता बाद में समाप्त हो गया।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला केरल निवासी संतोष कुमार एन. पी. के खिलाफ एक महिला की शिकायत से जुड़ा था। महिला का आरोप था कि संतोष ने अपनी पहली शादी की जानकारी छिपाकर उससे विवाह किया।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी ने पहली शादी कायम रहते हुए महिला से दूसरी शादी की और उसे विश्वास दिलाया कि उनका विवाह कानूनी रूप से वैध है।
महिला ने आरोप लगाया कि इसी विश्वास के आधार पर उसने शारीरिक संबंध बनाने की सहमति दी थी। उसका कहना था कि आरोपी ने धोखे से उसे वैध विवाह का भरोसा दिलाकर उसके साथ रहना शुरू किया।
महिला का पहले विवाह से तलाक हो चुका था। उसके अनुसार, दोनों ने मैसूर में शादी की थी और वर्ष 1996 से 2003 तक साथ रहे।
इसके बाद महिला ने आरोपी के खिलाफ रेप, धोखाधड़ी और विश्वासघात के आरोप लगाए।
हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने पर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे आरोपी
संतोष कुमार एन. पी. ने केरल हाईकोर्ट में आरोपों से मुक्त करने और आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग की थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने उनकी याचिकाएं खारिज कर दी थीं।
इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
सुप्रीम कोर्ट ने उनकी अपील स्वीकार करते हुए उन्हें रेप और धोखाधड़ी के आरोपों से मुक्त कर दिया।
पीठ ने दोहराया कि केवल किसी सहमति वाले रिश्ते के बिगड़ने या समाप्त होने के आधार पर आपराधिक जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती। ऐसे मामलों को उन परिस्थितियों से अलग देखना आवश्यक है, जहां शुरुआत से ही जानबूझकर धोखाधड़ी करके शारीरिक संबंधों के लिए सहमति प्राप्त की गई हो।
